सुभाष शिरढोनकर
शानदार रेड कार्पेट लुक, ग्लैमरस अंदाज और अपनी खूबसूरती के लिए पहचानी जाने वाली पूजा हेगड़े दक्षिण भारतीय सिनेमा के साथ-साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी अपनी पहचान बना चुकी हैं। हालांकि, एक अभिनेत्री के रूप में उन्हें वह मुकाम अभी तक हासिल नहीं हो सका, जिसकी उम्मीद उनके शुरुआती हिंदी सफर को देखकर की गई थी। बड़े सितारों के साथ काम करने के बावजूद हिंदी सिनेमा में उनकी कोई ऐसी फिल्म नहीं आई, जो उनके करियर की निर्णायक पहचान बन सके।
पूजा हेगड़े का जन्म मुंबई में मंजूनाथ और लता हेगड़े के घर हुआ। उनका परिवार मूल रूप से कर्नाटक के उडुपी जिले से संबंध रखता है। उनके पिता पेशे से वकील और भाई डॉक्टर हैं। पूजा ने मुंबई विश्वविद्यालय से कॉमर्स में स्नातक की पढ़ाई की। वह प्रशिक्षित शास्त्रीय नृत्यांगना भी हैं। कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने मॉडलिंग शुरू कर दी थी और कई विज्ञापन अभियानों का हिस्सा बनीं।
रणबीर कपूर के साथ ‘हीरो मैस्ट्रो’ के विज्ञापन में नजर आने के बाद उन्हें मॉडलिंग की दुनिया में अच्छी पहचान मिली। खूबसूरती, आत्मविश्वास और कैमरे के सामने सहज उपस्थिति ने उन्हें जल्द ही विज्ञापन जगत का लोकप्रिय चेहरा बना दिया।
पूजा ने 2009 में ‘मिस इंडिया’ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, लेकिन शुरुआती दौर में ही बाहर हो गईं। उन्होंने हार नहीं मानी और अगले वर्ष फिर प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। 2010 में वह ‘मिस इंडिया’ की सेकंड रनर-अप रहीं। इसी दौरान उन्होंने ‘मिस इंडिया साउथ’ और अन्य सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भी सफलता हासिल की। मॉडलिंग और ब्यूटी पेजेंट्स से मिली पहचान ने उनके लिए फिल्मों का रास्ता खोल दिया।

दक्षिण से मिली मजबूत पहचान
पूजा हेगड़े ने 2012 में तमिल फिल्म ‘मुगामूडी’ से अभिनय की शुरुआत की। इसके बाद 2014 में उनकी पहली तेलुगू फिल्म ‘ओका लैला कोसम’ आई, जिसमें वह नागा चैतन्य के साथ नजर आईं।
इसके बाद उनका करियर तेजी से आगे बढ़ा। महेश बाबू के साथ ‘महर्षि’, अल्लू अर्जुन के साथ ‘अला वैकुंठपुरमुलू’ और विजय के साथ ‘बीस्ट’ जैसी फिल्मों ने उन्हें दक्षिण भारतीय सिनेमा में एक लोकप्रिय अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया। दक्षिण में उन्होंने राम चरण, प्रभास और अन्य बड़े सितारों के साथ भी काम किया।
खास तौर पर ‘अला वैकुंठपुरमुलू’ की सफलता ने पूजा हेगड़े को दक्षिण भारतीय दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया। यहां वह सिर्फ ग्लैमरस अभिनेत्री के रूप में नहीं, बल्कि व्यावसायिक फिल्मों की सफल नायिका के रूप में भी अपनी जगह बनाने में कामयाब रहीं।

हिंदी सिनेमा में बड़ी शुरुआत, लेकिन परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं
पूजा हेगड़े ने 2016 में आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘मोहनजोदड़ो’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। फिल्म में उन्हें ऋतिक रोशन के साथ मुख्य भूमिका मिली। किसी नई अभिनेत्री के लिए इससे बेहतर लॉन्च की कल्पना मुश्किल थी। फिल्म भले ही अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी, लेकिन पूजा की खूबसूरती और स्क्रीन प्रेजेंस की चर्चा जरूर हुई।
इसके बाद उन्हें हिंदी में लगातार बड़े सितारों के साथ काम करने के अवसर मिले। ‘हाउसफुल 4’ में अक्षय कुमार के साथ और ‘सर्कस’ में रणवीर सिंह के साथ वह नजर आईं। सलमान खान के साथ ‘किसी का भाई किसी की जान’ में उन्हें मुख्य महिला किरदार मिला। दक्षिण के सुपरस्टार प्रभास के साथ ‘राधे श्याम’ में भी वह पैन-इंडिया स्तर पर दिखाई दीं।
लेकिन समस्या यह रही कि इन फिल्मों में से कोई भी पूजा हेगड़े के लिए वैसी सफलता या पहचान लेकर नहीं आई, जिसकी उन्हें तलाश थी।
‘राधे श्याम’ बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी। ‘सर्कस’ भी दर्शकों को प्रभावित करने में नाकाम रही। ‘किसी का भाई किसी की जान’ ने अपेक्षाकृत बेहतर कारोबार जरूर किया, लेकिन फिल्म की सफलता का श्रेय पूजा के खाते में नहीं गया। इसी तरह उनके हालिया प्रोजेक्ट्स भी उनके करियर को वह निर्णायक गति नहीं दे सके, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।

समस्या सिर्फ किस्मत की नहीं
पूजा हेगड़े के हिंदी करियर को केवल ‘किस्मत ने साथ नहीं दिया’ कहकर समझना शायद पर्याप्त नहीं होगा। इसमें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बदलती नायिका-केंद्रित भूमिकाओं, फिल्मों के चयन और उन्हें दिए गए किरदारों की प्रकृति—तीनों का योगदान है।
उनकी कई हिंदी फिल्मों में वह बड़े सितारों के साथ दिखाई दीं, लेकिन कहानी का केंद्र अक्सर नायक ही रहा। ऐसे में अभिनेत्री के लिए अपनी अभिनय क्षमता का प्रभाव छोड़ने की गुंजाइश सीमित हो जाती है। खूबसूरत और ग्लैमरस अभिनेत्री की उनकी छवि मजबूत हुई, लेकिन एक ऐसी अभिनेत्री की छवि अपेक्षाकृत कमजोर रही, जो किसी फिल्म को अपने कंधों पर लेकर चल सकती है।
यही उनके करियर की सबसे बड़ी विडंबना है। दक्षिण भारतीय सिनेमा ने उन्हें सफल व्यावसायिक फिल्मों की नायिका के रूप में स्वीकार किया, जबकि हिंदी सिनेमा में उन्हें अब तक लगातार अपनी जगह तलाशनी पड़ी है।

अभी कहानी खत्म नहीं हुई है
पूजा हेगड़े के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि उनके पास लंबा अनुभव, दक्षिण भारतीय बाजार में मजबूत लोकप्रियता, अच्छी स्क्रीन प्रेजेंस और बड़े सितारों के साथ काम करने का अनुभव है। उनकी असफल फिल्मों को उनके अभिनय करियर का अंतिम फैसला मानना जल्दबाजी होगी।
दरअसल, उन्हें अब ऐसी भूमिका की जरूरत है, जिसमें उनकी खूबसूरती से अधिक उनकी अभिनय क्षमता सामने आए। यदि उन्हें किसी मजबूत कहानी और प्रभावशाली महिला किरदार वाली फिल्म मिलती है, तो हिंदी सिनेमा में उनकी दूसरी पारी पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकती है।
पूजा हेगड़े ने दक्षिण में अपनी जगह बनाई है और हिंदी में भी उन्हें अवसरों की कमी नहीं रही। कमी रही तो उस एक फिल्म और उस एक भूमिका की, जो उनके करियर को नई दिशा दे सके।
इसलिए पूजा हेगड़े की कहानी को असफलता की कहानी कहना शायद सही नहीं होगा। यह फिलहाल उस अभिनेत्री की कहानी है, जिसने कई बड़े दरवाजे खटखटाए हैं लेकिन हिंदी सिनेमा में अपना स्थायी दरवाजा अभी खोलना बाकी है।
