गौतम चौधरी
झारखंड की धरती पर नदियां केवल जल प्रवाहित नहीं करती। वह यहां की स्मृतियों, संघर्षों, आजीविका और लोकविश्वासों का हिस्सा हैं। किसी नदी के किनारे बसे गांव के लिए वह मां है, किसी के लिए जीवनरेखा और किसी के लिए पुरखों की स्मृति। आज मैं झारखंड की लोकगाथा लेकर अपाके समक्ष प्रस्तुत हूं। झारखंड में एक ऐसी लोककथा सुनाई जाती है, जिसमें नदी स्वयं प्रेम की स्मृति बन जाती है।
तो आइए कोयल और कारो की कहानी आपको सुनाता हूं!
डालटनगंज और आसपास के इलाकों में पीढ़ियों से सुनाई जाने वाली इस लोकगाथा के अनुसार कोयल एक मुंडा राजा की बेटी थी। जिस प्रकार प्रत्येक कहानियों में होता है। ठीक उसी प्रकार कोयल बेहद सुंदर थी। उस समय जंगल और पहाड़ों से घिरे इस भूभाग में नागों को लेकर तरह-तरह के लोकविश्वास प्रचलित थे। कोयल को नागों के प्रति विशेष आकर्षण था। वह मन ही मन नागों से प्रेम करने लगी। वह अपने पिता से छिपकर अक्सर जंगल की ओर चली जाती थी। घंटों जंगल में घुमती और अपने में खो जाती थी।
एक दिन जंगल में उसकी मुलाकात कारो से हुई। कारो सजीला युवक था। देखने में वह भी आकर्षक था। कारो वैसे तो लौकिक रूप में एक युवक था लेकिन वह नागों का देवता था। पहली मुलाकात धीरे-धीरे परिचय में बदली और परिचय प्रेम में। जंगल उनका मिलन-स्थल बन गया। दोनों प्रेमी आपसे में मिलने लगे। प्रेम परवान चढ़ने लगा।
कहानी का यह हिस्सा झारखंड की प्रकृति के साथ प्रेम के उस रिश्ते को सामने लाता है, जिसमें जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं है। वह रहस्यों, देवताओं, जीव-जंतुओं और मनुष्य के रिश्तों से भरा एक जीवंत संसार है।
कोयल और कारो अक्सर मिलने लगे लेकिन प्रेम की खबर हमेशा प्रेमियों तक सीमित नहीं रहती। यह रहस्य एक न एक दिन खुल ही जाता है। इस प्रेम कथा में भी ऐसा ही हुआ। एक दिन मुंडा राजा को अपनी बेटी के इस संबंध का पता चल गया। राजा को यह रिश्ता स्वीकार नहीं था। मुंडा राजा ने कोयल को जंगल जाने से रोक दिया और उसे उस संसार से दूर कर दिया, जहां वह कारो से मिलती थी।
यहीं से कहानी प्रेम से विरह की ओर मुड़ती है।
प्रेमी एक-दूसरे से अलग कर दिए गए लेकिन लोककथा की कल्पना में प्रेम इतना कमजोर नहीं होता था। अंततः ईश्वरीय शक्ति से कोयल नदी में बदल गई। वह बहती चली गई-जंगलों, पहाड़ियों और बस्तियों को पार करती हुई। और इस तरह कोयल की प्रेमकथा अमर हो गई। इधर कारो में नदी मन गया।
आज झारखंड में कोयल और कारो वास्तविक नदियां हैं। कारो नदी रांची क्षेत्र से निकलकर खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम के इलाकों से गुजरती हुई आगे कोयल नदी में मिलती है। उसके रास्ते में कई जलप्रपात और प्राकृतिक स्थल आते हैं। कारो और कोयल का संगम भी इस पूरे भूगोल को एक अलग पहचान देता है।
लोककथा का सबसे सुंदर अर्थ शायद यह नहीं है कि वास्तव में कोई राजकुमारी नदी बन गई। असली महत्व इस बात का है कि एक समाज ने अपने भूगोल को प्रेम की स्मृति में बदल दिया।
आधुनिक मनुष्य के लिए नदी एक भौगोलिक इकाई है। नक्शे पर एक नीली रेखा। सिंचाई के लिए जलस्रोत। कभी बांध और बिजली परियोजना का संसाधन लेकिन आदिवासी जीवन-दृष्टि में प्रकृति के साथ रिश्ता इससे कहीं अधिक गहरा है। जंगल, पहाड़, नदी और जमीन जीवन के अलग-अलग हिस्से नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े संसार हैं।
यही कारण है कि कोयल-कारो की लोककथा को केवल प्रेम कहानी की तरह पढ़ना शायद अधूरा होगा। यह उस मानसिक संसार की कहानी है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच की सीमा बहुत स्पष्ट नहीं है।
मनुष्य नदी बन सकता है। नदी स्मृति बन सकती है। पहाड़ किसी घटना के साक्षी हो सकते हैं और जंगल किसी प्रेमी का मिलन-स्थल। इसीलिए कोयल का नदी में बदलना इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
प्रेमियों को अलग किया गया लेकिन प्रेम को समाप्त नहीं किया जा सका। वह एक मनुष्य के शरीर से निकलकर पूरी धरती पर फैल गया।
आज जब कोई कारो नदी के किनारे खड़ा होकर उसकी धारा को देखता है तो वह केवल पानी को बहते हुए देखता है। लेकिन लोककथा की आंखों से देखें तो यह नदी किसी की प्रतीक्षा करती हुई प्रतीत होती है।
और यही इस कथा की खूबसूरती है। कोयल नदी बनकर बहती है और कारो से उसका संबंध प्रकृति में एक नया अर्थ ग्रहण करता है। उपलब्ध लोककथा के संस्करण में कोयल के नदी बनने की बात प्रमुख है; बाद की लोककल्पना में कोयल और कारो को प्रेमी-युगल के रूप में देखा जाता है। इस तरह उनका नाम केवल भूगोल में नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक स्मृति में भी साथ-साथ आता है।
यहां प्रेम का अंत मिलन में नहीं, प्रकृति में विलय में होता है। नदी आज भी बह रही है। इस कहानी का एक आधुनिक और मार्मिक पक्ष भी है। कारो नदी आज भी अनेक गांवों के जीवन का आधार है। वह खेतों, जंगलों और बस्तियों के बीच से गुजरती है और अंततः कोयल नदी में मिल जाती है। स्थानीय रिपोर्टों में कारो को तीन जिलों की जीवनधारा तक कहा गया है।
यानी लोककथा की प्रेमिका और उसका प्रेमी आज भी झारखंड के भूगोल में मौजूद हैं-कम से कम उन लोगों की स्मृति में, जो इस कहानी को सुनते और सुनाते आए हैं। नदी का पानी वही नहीं रहता। हर क्षण नया पानी उसमें शामिल होता है और पुराना आगे निकल जाता है। फिर भी नदी का नाम वही रहता है।
शायद प्रेम भी ऐसा ही होता है। लोग बदल जाते हैं, पीढ़ियां बदल जाती हैं, गांवों के नाम बदल जाते हैं लेकिन कोई कथा अगर समाज की स्मृति में उतर जाए तो वह अपना रूप बदलते हुए भी जीवित रहती है।
कोयल और कारो की कहानी को प्रमाणित इतिहास कहना उचित नहीं होगा। उपलब्ध स्रोत इसे स्थानीय लोककथा और लोकविश्वास के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसके पात्रों और घटनाओं की ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है लेकिन लोककथाओं का महत्व केवल उनकी ऐतिहासिक सत्यता से तय नहीं होता। वे यह बताती हैं कि किसी समाज ने अपने आसपास की दुनिया को किस तरह देखा।
कोयल-कारो की कथा बताती है कि झारखंड की लोककल्पना में प्रकृति निर्जीव वस्तु नहीं है। उसमें प्रेम है, स्मृति है, देवत्व है और मनुष्य के जीवन से गहरा संबंध है।
