गौतम चौधरी
विगत दिनों देहरादून प्रवास के दौरान “रीच” के संस्थापक और “विरासत” नामक सांस्कृत आयोजन के प्रमुख संचालक राजीव कुमार सिंह (अपनों के बीच ‘आर.के.’) से हुई लंबी बातचीत औपचारिक शुरुआत के बाद शीघ्र ही आत्मीय संवाद में बदल गई। सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े राजीव जी इन दिनों अपना समय चार हिस्सों में बाँटते हैं, परिवार, पैतृक गाँव बेलसंडी, ससुराल मंझौल, देहरादून-दिल्ली और विविध सांस्कृतिक गतिविधियाँ। संस्कृति, राष्ट्र, कला और ‘विरासत’ की यात्रा पर उनसे हुई यह सारगर्भित प्रश्नोत्तरी प्रस्तुत है।
आप ‘विरासत’ क्यों करते हैं?
अब तो यह मेरे जीवन की लत बन चुकी है, इसे छोड़ना संभव नहीं। व्यक्ति जन्म लेता है और मर जाता है-हम इसी अंतराल को जीवन मान लेते हैं। लेकिन वास्तविक जीवन वह है, जो जन्म और मृत्यु के बीच आपके द्वारा किया गया वह काम है, जिसका प्रभाव हमारे चारोतरफ के वातावरण पर पड़ता है।
मानव सभ्यता का मूल तत्व आनंद है। बसंत में प्रकृति का उल्लास इसका प्रमाण है। कला, संगीत और साहित्य इसी आनंद की अभिव्यक्ति हैं-और यही सभ्यता का सार है। विज्ञान जीवन को आसान बनाता है, पर कला और संस्कृति जीवन को अर्थ देती हैं, जीने की संरचना देती हैं। मैं ‘विरासत’ इसलिए नहीं छोड़ सकता क्योंकि मुझे जीवन को आनंदपूर्वक जीना है-और उस आनंद को बाँटना है।
‘विरासत’ में आप कला के गंभीर पक्ष को ही प्रमुखता देते हैं। ऐसा क्यों?
यही भारतीयता है। भारत का अर्थ ही है-‘जो ज्ञान में रत रहे’। हमारा राष्ट्रवाद पश्चिमी अवधारणा से भिन्न है। हमारी संस्कृति में शास्त्रीयता, मर्यादा और सौंदर्य है। फूहरपन और अश्लीलता हमारी पहचान नहीं है।
मैं एक ऐसी पारिवारिक परंपरा से आता हूँ जहाँ धर्म, संस्कृति और कला के संरक्षण को दायित्व माना गया। हमारे पूर्वजों ने ज्ञान और परंपरा को बचाने का कार्य किया। वही हमारी जातीय जिम्मेदारी है। इसलिए ‘विरासत’ के मंच पर हम सतही या सस्ती चीजें प्रस्तुत नहीं करते। कठिनाइयाँ आती हैं, पर मूल्यों से समझौता नहीं होगा।
भारतीय कला को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
राष्ट्र केवल भू-भाग नहीं है; वह अनादि काल से विकसित होती चेतना है। सिंधू घाटी की सभ्यता से अब तक जो सांस्कृतिक निरंतरता हमें मिली है, भारतीय कला उसी की अभिव्यक्ति है। यह कला आत्मा को परम तत्व तक विस्तार देती है और मुक्ति का मार्ग दिखाती है।
ज्ञान की रक्षा कठिन परिस्थितियों में भी की गई-चाहे संसाधन कम रहे हों। हम भी अपने हिस्से के भारत को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। संस्कृति का संरक्षण केवल हस्तांतरण से नहीं, बल्कि आमजन की स्वीकार्यता से संभव है। मेरा प्रयास भारतीय संस्कृति के आवश्यक स्वरूप को समाज के बीच प्रतिष्ठित करना है।
‘विरासत’ की यात्रा कैसे शुरू हुई?
मैं Oil and Natural Gas Corporation (ओएनजीसी) में पदाधिकारी था और एक सांस्कृतिक संस्था से जुड़ा हुआ था, पर मुझे हर वक्त कुछ नया करने की इच्छा हो रही थी। जो करना चाहता था, वह संभव नहीं हो पा रहा था। तब कुछ मित्रों के साथ मिलकर रूलर इंटरप्रेनियोरशिप फॉर आर्ट्स एंड हेरिटेज ‘रीच’ की स्थापना की और ‘विरासत’ का शुभारंभ किया।
भारतीय शास्त्रीय और लोक कलाओं को मंच देना हमारी प्राथमिकता रही है। बिना आर्थिक गारंटी के, तीन दशकों से निरंतर चलने वाला यह आयोजन अपने आप में अनूठा है। ‘विरासत’ के मंच पर देश-विदेश के अनेक श्रेष्ठ कलाकारों ने प्रस्तुति दी है-शास्त्रीय संगीत, लोक कला, शिल्प, चित्रकला, साहित्य, सिनेमा, नाटक, लोकनृत्यु और संगीत-सभी को समग्रता से स्थान मिला है। सीमित संसाधनों में भी हमने प्रयोग किए हैं, जिनका सांस्कृतिक महत्व व्यापक है।
आर्थिक चुनौतियों का समाधान कैसे निकालते हैं?
यह हमारी सबसे बड़ी चुनौती है। शुरुआत से ही हमलोग आर्थिक संकट से जूझते रहे हैं। सरकारी, खास कर ओएनजीसी का अनुदान हमारा आधार रहा है, पर वह भी लगातार कम हो रहा है। सांस्कृतिक आयोजनों में प्रत्यक्ष मुनाफा नहीं होता, इसलिए निजी क्षेत्र की कंपनियाँ आगे नहीं आतीं। लेकिन निजी सहयोग के बिना दीर्घकालिक निरंतरता संभव नहीं है। सांस्कृतिक आयोजनों में निजी क्षेत्र का निवेश जरूरी है। दरअसल, इसे महज सांस्कृतिक आयोजन नहीं समझा जाना चाहिए। यह विश्व शांति का आधार है। इस प्रकार के आयोजन सांस्कृतिक सेतु का काम करते हैं। इसमें किया गया निवेश दीर्घकालिक है। इसलिए निजी क्षेत्रों के उद्योजकों को हमारे साथ मिलकर काम करना चाहिए। मुझे ईश्वर पर विश्वास है। विश्वास है कि यह संकट भी दूर होगा।
आगे की आपकी क्या योजना है?
पहला लक्ष्य आर्थिक आत्मनिर्भरता है। उसके बाद इस आयोजन को वैश्विक स्वरूप देना है।
यदि कॉरपोरेट जगत और सरकार सकारात्मक सहयोग करें, तो हम इसे विश्वस्तरीय सांस्कृतिक संगम बना सकते हैं। हमारे पास कला का वह ज्ञान है, जो हमें ‘विश्व गुरु’ के पद पर प्रतिष्ठित कर सकता है लेकिन उसके लिए हमें अपने व्याप को बड़ा करना होगा और कसौटी की संकीर्णता समाप्त करनी होगी। विश्व गुरु बनने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है। सांस्कृतिक आयोजन उसका अहम पक्ष है। हम अपने हिस्से का प्रयास कर रहे हैं। इस प्रयास में हर को अपनी आहुति देनी चाहिए।
इतने बड़े आयोजन का प्रबंधन कैसे करते हैं?
(हँसते हुए)
आप भूल रहे हैं कि मैं ओएनजीसी जैसे विशाल उपक्रम के प्रबंधन से जुड़ा रहा हूँ। हम ‘क्रिएटिविटी’ का प्रबंधन करते हैं-इसे आप ‘सकारात्मक रुचि का व्यापार’ भी कह सकते हैं।
हमने अपने आयोजन की एक विशिष्ट कार्य-संस्कृति विकसित की है-जहाँ परंपरा और प्रयोग का समन्वय है। आधुनिकता और पुरातन का संतुलित योग ही ‘विरासत’ की पहचान है।
हमारी कार्यशैली पर शोध भी किया जा सकता है।
अंत में क्या कहना चाहेंगे?
हमारा उद्देश्य है-ईश्वरीय आनंद की अनुभूति से आमजन को परिचित कराना।
इसके लिए समाज का सहयोग आवश्यक है।
आप सबका आभार।
यह संवाद केवल एक सांस्कृतिक आयोजन की कहानी नहीं, बल्कि भारतीयता की उस चेतना का दस्तावेज है जो आनंद, शास्त्रीयता और मूल्यों के संरक्षण में विश्वास रखती है।
