गौतम चौधरी
हाल ही में जेडी वेंस की पाकिस्तान यात्रा के दौरान आयोजित “इस्लामाबाद वार्ता” एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रयास के रूप में देखी जा रही थी, जिसका उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करना था, लेकिन वह बेनतीजा समाप्त हो गया। दोनों पक्षों के कूटनीज्ञों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाया और अंत में पाकिस्तानी पहल की सराहना की। लगभग 21 घंटे चली चर्चाओं के बावजूद दोनों पक्ष किसी ठोस समझौते पर नहीं पहुँच सके। वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने अपनी “रेड लाइन” सामने रख दी हैं, लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। इस वार्ता के बाद ईरानी पक्ष ने भी अमेरिका पर कई प्रकार के गंभीर आरोप लगाए हैं।
इस वार्ता में सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सामने आया। अमेरिका ने यह मांग दोहराई कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न करने की स्पष्ट और ठोस गारंटी दे। दूसरी ओर, ईरान ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि वह पहले से ही इस बात पर कायम है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।
ईरान का यह भी कहना था कि वार्ता में प्रगति तभी संभव है जब अमेरिका “अच्छे विश्वास” का प्रदर्शन करे, जिसमें आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संसाधनों तक उसकी पहुँच बहाल करना शामिल है। ईरानी पक्ष के अनुसार, अमेरिकी शर्तें अत्यधिक कठोर और हस्तक्षेपकारी हैं, जो समझौते की राह में बाधा बन रही हैं।
यह गतिरोध पूरी तरह अप्रत्याशित भी नहीं कहा जा सकता है। बता दें कि 2015 में ईरान परमाणु समझौता 2015 (JCPOA) तक पहुँचने में लगभग दो वर्षों की लंबी और जटिल प्रक्रिया पूरी करनी पड़ी थी। तब जाकर ईरान समझौते के लिए माना था। उस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध स्वीकार किए थे और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों की अनुमति दी थी, बदले में उसे आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिली थी।
ईरान परमाणु अप्रसार संधि ( NPT) का हस्ताक्षरकर्ता भी है, जो उसे शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक के उपयोग की अनुमति देता है, बशर्ते वह परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता निभाए और निरीक्षणों को स्वीकार करे। ईरान बार-बार यह दावा करता रहा है कि वह उस समझौते का पालन कर रहा है।
वार्ता में केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और सामरिक मुद्दे भी प्रमुख रहे। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और उसकी रणनीतिक भूमिका को लेकर मतभेद उभरकर सामने आए। यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस पर किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रभाव डालता रहा है।
इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की मेजबानी की दोनों पक्षों ने सराहना की। यह इस बात का संकेत देता है कि भले ही वार्ता में ठोस परिणाम न निकला हो, लेकिन संवाद का मंच बनाए रखना भी कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
वर्तमान परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद गहरे और बहुस्तरीय हैं। परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा चिंताएँ, ये सभी कारक किसी भी त्वरित समझौते को कठिन और जटिल बनाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की वार्ताएँ अक्सर लंबी प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं, जहाँ प्रारंभिक दौर में गतिरोध सामान्य बात है। यदि दोनों पक्ष संवाद बनाए रखते हैं और चरणबद्ध तरीके से विश्वास बहाली के उपाय अपनाते हैं, तो भविष्य में किसी समझौते की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस बैठक के बाद ईरानी कूटनीतिकों ने भारत, चीन और रूस को भी इस दिशा में पहल करने को कहा है। ईरानी नेताओं के इस बयान के बाद कूटनीतिक परिदृश्य में बदलाव के साफ संकेत दिखने लगे हैं। ईरान ने किसी यूरोपीय देश के बारे में अभी तक कोई बयान नहीं दिया है लेकिन ब्रिक्स देशों की चर्चा दुनिया के बदल रहे शक्ति संतुलन के संकेत हैं। हालांकि इस मामले में उक्त तीनों ब्रिक्स देशों ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है लेकिन आने वाले समय में इन तीनों देशों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
इस्लामाबाद वार्ता का निष्कर्ष भले ही निराशाजनक रहा हो, लेकिन यह अमेरिका-ईरान संबंधों में जारी जटिलताओं और कूटनीतिक चुनौतियों को रेखांकित करता है। इतिहास यह बताता है कि ऐसे विवादों का समाधान त्वरित नहीं होता, बल्कि धैर्य, निरंतर संवाद और पारस्परिक समझ के माध्यम से ही संभव हो पाता है।
