जेरूसलम : इतिहास, मिथक, आस्था और राजनीति के बीच उलझा सच

जेरूसलम : इतिहास, मिथक, आस्था और राजनीति के बीच उलझा सच

जेरूसलम केवल एक शहर नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और राजनीतिक आकांक्षाओं का ऐसा संगम है, जिसने सदियों से मानव सभ्यता को प्रभावित किया है। आज जब यहूदी–मुस्लिम टकराव के संदर्भ में जेरूसलम की चर्चा होती है, तो अक्सर इसे हजारों वर्षों पुराने धार्मिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और बहुस्तरीय है।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि यहूदियों का जेरूसलम से संबंध केवल मिथकीय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक आधारों पर भी स्थापित है। बेबीलोन निर्वासन (Babylonian Exile) और प्राचीन यहूदी मंदिरों के प्रमाण इस संबंध को पुष्ट करते हैं। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि लगभग दो सहस्राब्दियों तक इस क्षेत्र पर यहूदी राजनीतिक सत्ता नहीं रही। इस दौरान जेरूसलम विभिन्न इस्लामी और ईसाई शासनों, विशेषकर ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire), के अधीन रहा।

यहीं से एक बुनियादी प्रश्न उभरता है—क्या प्राचीन ऐतिहासिक संबंध आधुनिक राष्ट्र-राज्य के दावे का आधार बन सकते हैं? यदि इस तर्क को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार कर लिया जाए, तो विश्व के अनेक क्षेत्रों में अनंत संघर्षों का द्वार खुल सकता है।

19वीं सदी के उत्तरार्ध में उभरा ज़ायोनिज़्म (Zionism) इसी ऐतिहासिक स्मृति को राजनीतिक रूप देने का प्रयास था। यूरोप में बढ़ते यहूदी-विरोध, रूस के पोग्रोम और अंततः होलोकॉस्ट (Holocaust) जैसी भयावह घटनाओं ने इस विचार को नैतिक वैधता भी प्रदान की। यहूदियों के लिए एक सुरक्षित राष्ट्रीय घर की आवश्यकता को नकारना न तो न्यायसंगत है और न ही मानवीय।

लेकिन इस प्रश्न का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या एक समुदाय की सुरक्षा दूसरे समुदाय के विस्थापन की कीमत पर सुनिश्चित की जा सकती है?

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बालफोर घोषणा (Balfour Declaration) ने इस जटिलता को और गहरा कर दिया। ब्रिटेन ने एक ही भूभाग पर दो समुदायों से परस्पर विरोधी वादे किए, जिससे भविष्य के संघर्ष की नींव पड़ गई। इसके बाद 1930 के दशक में यहूदी प्रवास (आलिया) और अरब असंतोष के बीच बढ़ती हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह केवल धार्मिक विवाद नहीं, बल्कि भूमि, संसाधनों और राजनीतिक अधिकारों का संघर्ष है। पील आयोग (Peel Commission) द्वारा प्रस्तावित विभाजन इस असफल सह-अस्तित्व की स्वीकृति थी।

इस पूरे विमर्श में यह भी आवश्यक है कि इतिहास को समझने के लिए अतिवादी और घृणास्पद विचारों का सहारा न लिया जाए। एडोल्फ हिटलर जैसे व्यक्तियों के कथन इस जटिल प्रश्न को समझने में कोई सहायता नहीं करते; वे केवल पूर्वाग्रह और विनाशकारी सोच के प्रतीक हैं।

आज का जेरूसलम विवाद इस बात का प्रतीक है कि जब इतिहास, धर्म और राजनीति एक-दूसरे में उलझ जाते हैं, तो सत्य धुंधला पड़ जाता है। एक ओर यहूदी समुदाय अपने प्राचीन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अधिकारों की बात करता है, वहीं दूसरी ओर फ़िलिस्तीनी अरब अपने सतत निवास और अस्तित्व के अधिकार को सामने रखते हैं।

वास्तविकता यह है कि दोनों ही दावे अपने-अपने संदर्भ में वैध हैं—यहूदियों का ऐतिहासिक संबंध भी वास्तविक है और फ़िलिस्तीनियों का वर्तमान एवं निरंतर निवास भी उतना ही सशक्त सत्य है। आधुनिक संघर्ष मुख्यतः 20वीं सदी की औपनिवेशिक नीतियों और राष्ट्रवादी आंदोलनों का परिणाम है, न कि केवल प्राचीन धार्मिक विरोध का।

इसलिए समाधान अतीत की व्याख्याओं में उलझने के बजाय वर्तमान की व्यावहारिकता में खोजा जाना चाहिए। न्यायपूर्ण संतुलन, पारस्परिक स्वीकृति और सह-अस्तित्व की राजनीतिक इच्छाशक्ति ही इस लंबे संघर्ष का एकमात्र व्यवहारिक मार्ग हो सकते हैं।

जेरूसलम का प्रश्न “कौन सही है” से अधिक “कैसे साथ रहा जाए” का प्रश्न है। इतिहास को हथियार बनाकर संघर्ष को लंबा खींचा जा सकता है, लेकिन स्थायी शांति तभी संभव है जब इतिहास को समझते हुए उससे आगे बढ़ने का साहस दिखाया जाए।

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