रजनी चौधरी
भारतीय लोकसंस्कृति की असली ताक़त उसकी जड़ों में बसती है, गाँवों की मिट्टी, लोकभाषाओं की मिठास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं में। ऐसे ही समृद्ध सांस्कृतिक परिवेश से उभरीं बिहार की महान लोकगायिका विंध्यवासिनी देवी, जिन्हें सम्मानपूर्वक “बिहार की कोकिला” कहा जाता है। उनका जीवन और कृतित्व इस बात का प्रमाण है कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की आत्मा होती है।
दरभंगा ज़िले के सिनुआरा गाँव में जन्मी (कुछ स्रोत उन्हें मुजफ्फरपुर से भी जोड़ते हैं) विंध्यवासिनी देवी का आरंभिक जीवन ही लोकधुनों के बीच बीता। मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत ने उनके स्वर को वह गहराई दी, जो आगे चलकर लाखों श्रोताओं के दिलों तक पहुँची। यह वही दौर था जब लोकसंगीत घर-आँगन, खेत-खलिहान और पारिवारिक अनुष्ठानों का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था।
विंध्यवासिनी देवी ने मैथिली, भोजपुरी और मगही लोकगीतों को न केवल गाया, बल्कि उन्हें नई पहचान भी दिलाई। विवाह के अवसरों पर गाए जाने वाले सोहर, समदाउन, कजरी और झूमर जैसे गीतों को उन्होंने अपनी सादगीपूर्ण और भावपूर्ण आवाज़ से जन-जन तक पहुँचाया। उनके गायन में कृत्रिमता नहीं, बल्कि जीवन की सहजता और लोकजीवन की सच्चाई झलकती थी।
उनकी लोकप्रियता का एक बड़ा माध्यम बना आकाशवाणी। उस समय जब संचार के साधन सीमित थे, आकाशवाणी ने लोककलाकारों को मंच दिया और विंध्यवासिनी देवी ने इस मंच का उपयोग लोकसंगीत को घर-घर पहुँचाने के लिए किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि अवसर मिले तो लोकभाषाएँ और लोकधुनें भी राष्ट्रीय पहचान बना सकती हैं।
उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। लेकिन किसी भी पुरस्कार से कहीं अधिक बड़ा सम्मान उन्हें जनता के प्रेम और स्वीकृति के रूप में मिला। आज भी उनके गीत ग्रामीण परिवेश में गूंजते हैं और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हैं।
आज जब वैश्वीकरण और बाज़ारवाद के दौर में लोकसंस्कृति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, विंध्यवासिनी देवी का जीवन हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है, अपनी जड़ों से जुड़ाव ही हमारी असली पहचान है। आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना आवश्यक है, लेकिन अपनी लोकपरंपराओं को भुलाकर नहीं।
यह समय है कि हम ऐसे कलाकारों के योगदान को केवल स्मरण न करें, बल्कि उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास भी करें। लोकसंगीत को शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अधिक स्थान देकर ही हम अपनी विरासत को जीवित रख सकते हैं। विंध्यवासिनी देवी की विरासत हमें यह सिखाती है कि सच्ची कला वही है, जो समाज के दिल से निकलकर समाज तक पहुँचेकृऔर वहीं अमर हो जाए।
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