सरदूल सिंह
दुनिया के महान दार्शनिक और वैज्ञानिक समाजवाद के निर्माताओं को जब याद किया जाता है तो महान लेनिन का नाम सबसे अग्रणी और सर्वाेच्च शिखर पर आता है। लेनिन जो एक शिक्षित परिवार में पैदा हुए जिन्होंने उच्च अध्ययन तथा वकालत के पेशे से जिम्मेवारी वाले जीवन को शुरू किया। पढ़ाई के दौरान ही तार्किक बुद्धि के होने के कारण वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए। पारिवारिक पृष्ठभूमि सामाजिक और क्रांतिकारी गतिविधियों वाली थी। क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने के कारण उनके भाई को मौत की सजा तत्कालीन राज्य सत्ता के द्वारा दी गई। लेकिन उनके बौद्धिक चिंतन और बौद्धिक गुणों ने उन्हें महानता के शिखर तक पहुंचाया।
उनका कल प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व की परिस्थितियों के बनने का काल था। उन्होंने 1905 में रूस में जारशाही के अंत तथा समाजवाद के निर्माण का प्रयास करने के लिए क्रांति की शुरुआत की लेकिन वह क्रांति असफल रही। लेकिन उनकी दार्शनिक और एक क्रांतिवेता के तौर पर जो महानता है वह अतुलनीय है।
अगर मानव सभ्यता के लिए उनके दार्शनिक योगदान को याद किया जाए तो वे कार्ल मार्क्स के पदार्थवाली दर्शन के सर्वाेच्च अध्ययन कर्ता तथा उसमें विकास कर व्यवहार में लागू करने वाले महान दार्शनिक स्थापित हुए। हम जानते हैं कि कार्ल मार्क्स अपने जमाने के जर्मन के महान दार्शनिक हुए। वे हेगेल के पदार्थवाद-अध्यात्मवादी दर्शन के शिष्य बने लेकिन तुरंत ही उनकी कुशाग्र बुद्धि ने हेगेल के दर्शन की कमियों को खोज लिया और उनके अध्यात्मवादी दर्शन जो सिर के बल अर्थात विचारों पर खड़ा था उसे पैरों के बाल अर्थात पदार्थवादी आधार देकर दर्शन में क्रांति कर दी और कहा कि ‘‘हीगल का दर्शन सर के बल खड़ा है अब उसको पैरों के बल कर दिया है अब वह दौड़ने लगेगा’’ अर्थात जीवन की परिस्थितियों पर लागू करते हुए इन परिस्थितियों को बदलने का काम करेगा।
लेनिन ने इसी पदार्थवादी दर्शन अर्थात मार्क्सवादी दर्शन का विकास करते हुए अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ष्अनुभव सिद्ध आलोचनाष् के आधार पर सिद्ध किया कि तमाम व्याख्या करने वाले परिस्थितियों की व्याख्या अपने-अपने अनुभव के आधार पर करते हैं, पदार्थवादी दर्शन के आधार पर नहीं। जब हम पदार्थवादी दर्शन के अनुसार परिस्थितियों की व्याख्या करते हैं तो इनको बदलने का पदार्थवादी आधार भी हम खोज लेते हैं और उसका उपयोग कर परिस्थितियों को बदलने का काम भी कर सकते हैं।
उनका दूसरा सबसे बड़ा योगदान पूंजीवाद की व्याख्या के आधार पर किया जा सकता है। तत्कालीन यूरोप में पूंजीवादी विकास को साम्राज्यवादी रूप के आधार पर जाना जाता था और तमाम अर्थशास्त्री और दार्शनिक इसके साम्राज्यवादी रूप की ही व्याख्या करते थे लेकिन लेनिन ने कहा कि 20वीं सदी के शुरु में पूंजीवाद का जो साम्राज्यवादी रूप है वह मरणासन्न पूंजीवाद का शिखर है और अब इसने गुणात्मक रूप बदल लिया है जो वित्तीय पूंजी पर आधारित है अर्थात 20वीं सदी के शुरु में ही पूंजी अब व्यापारिक तथा औद्योगिक के साथ-साथ वित्तीय रूप धारण कर सत्ता प्राप्त कर गई है। अब वह वित्तीय पूंजी के प्रवाह के आधार पर ही विभिन्न देशों की सरकारों को कर्ज देने की योजनाओं के आधार पर एक देश जो वित्तीय पूंजी के आधार पर विकसित हो चुका है वह वित्तीय पूंजी निर्यात कर तीसरी दुनिया या बराबर वाले देशों में वित्तीय पूंजी का निवेश कर्ज के जाल के माध्यम से अपना विकास सुनिश्चित करना चाहते हैं।
इसलिए उनकी यह व्याख्या आज भी प्रासंगिक है आज की दुनिया को जानने के लिए इस व्याख्या का आधार बहुत ही उपयोगी है। वर्तमान में दुनिया में जितने युद्ध या नीतियां थोपी जा रही हैं उनके पीछे वित्तीय पूंजी का संकट ही है जो उन देशों में वित्तीय पूंजी के विकास में आ रही रूकावटों को दूर करने के लिए कर्ज देने की नीतियां बनाने पर मजबूर करते हैं तथा विभिन्न देशों को को शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, जलदाय आदि नीतियों को निर्धारित करने को मजबूर करते हैं। पहले सार्वजनिक संस्थाओं का निजीकरण करते हैं । निजीकरण होने के कारण ज्यादा कर्ज लेकर वस्तुएं और सेवाएं खरीदनी पड़ती हैं।इसलिए जो लोग सार्वजनिक जीवन में इन सुविधाओं को छिनते हुए देखते हैं तथा महंगी सेवाएं प्राप्त करने पर छटपटाते हैं उन्हें लेनिन के इस सूत्र को याद रखना चाहिए कि वर्तमान में वित्तीय पूंजी की सत्ता है जो पूंजीपतियों को इस प्रकार के काम करने के लिए मजबूर करती हैं।
उनका तीसरा सबसे बड़ा योगदान सिद्धांत को व्यवहार में लागू करते हुए अगर समाजवाद की स्थापना करनी है तो उसके लिए किस प्रकार के संगठन का होना जरूरी है तथा किस प्रकार के संगठन कर्ता होने चाहिए? उन्होंने पेशेवर क्रांतिकारी तथा जनवादी केन्द्रीयकरण का संकल्प प्रस्तुत किया । इस प्रकार से प्रकार से सैद्धांतिक रूप में परिपक्व संगठन की जरूरत बताई जिसके नेतृत्वकारी तत्कालीन समाज द्वारा सृजित ज्ञान से लैस हों तथा पदार्थवादी दर्शन के आधार पर समाज को वैज्ञानिक दिशा देने की योग्यता रखते हों।
उनकी चौथी सबसे बड़ी देन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक साम्यवादी मंच की आवश्यकता को उजागर करना तथा अपने नेतृत्व में कमेंटरन नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का गठन करना तथा प्रतिवर्ष इस की बैठक करवाना जिसके अनुसार साम्यवादी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए लगभग 70 देशों में साम्यवादी राजनीतिक दल बने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साम्यवादी उद्देश्य निर्धारित किए गए ।
उन्होंने नारा दिया कि अपने-अपने देश की परिस्थितियों के अनुसार साम्यवादी दलों का गठन करो जो पदार्थ वादी दर्शन पर आधारित हों। इसके अलावा उनकी ‘अप्रैल थीसिस’ नाम की रचना और व्यवहारिक कार्यनीति सामने आई जिसके अनुसार साम्यवादी उद्देश्य को प्राप्त करना और उसे लागू करना कैसे संभव हो और कैसे सफलता पाई जाए?
समग्र रूप में कहा जाए तो लेनिन वे महान दार्शनिक थे जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी मार्क्सवादी दर्शन का विकास किया तथा उस आधार पर दुनिया में पहली बार पहले विश्व युद्ध के दौरान ही इस अवसर का लाभ उठाते हुए युद्ध से अलगाव करते हुए देश में समाजवाद की स्थापना की, भूमि तथा बैंकों का राष्ट्रीयकरण करते हुए सारी सत्ता सोवियतों को सौंप कर पूरे देश में एक साथ काम के दिन को 8 घंटे तक सीमित कर, बेरोजगारी और भूख को खत्म कर, देश में उच्च तकनीक को लागू करने के लिए देश का बिजलीकरण किया विज्ञान और तकनीक में दुनिया को अचंभित करने वाले कारनामे किए।
युद्ध के संबंध में उन्होंने लिखा कि ‘पूंजीवाद कभी भी युद्ध की समस्या का हल नहीं कर सकता इसका समाधान केवल समाजवादी कर सकता है।’ वर्तमान में जब दुनिया को युद्ध में धकेला जा रहा है, मानवता पर अत्याचार किए जा रहे हैं, पूंजीवादी शोषण शिखर पर है। आर्थिक रूप में खाए बहुत चौड़ी हो चुकी है। प्रोलिटेरिएट वर्ग के सामने आर्थिक मांगे दीवार बनकर खड़ी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परोलेटेरिएट वर्ग शोषित और पीड़ित है। भारत में भी हालिया दिनों में वेतन, भत्तों,को बढ़ाने तथा काम के दिन के विस्तार के विरोध में मजदूर सड़कों पर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध भड़काए जा रहे हैं।
ऐसी दशा में लेनिन को उनके जन्मदिन पर याद करने का उद्देश्य तथा प्रासंगिकता यही है कि हमारी सामाजिक राजनीतिक समस्याओं का कारण पूंजीवाद और उसके वित्तीय पूंजी के शासन की सत्ता के रूप में जो फासीवादी रूप दुनिया भर में दिखाई देने लगे हैं उन सब का समाधान केवल समाजवादी व्यवस्था की स्थापना में ही संभव है। उनका यह संदेश कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने वर्तमान उपलब्ध मानवता के पास जो भी उपलब्ध ज्ञान है उसको सीखना, समझना, आत्मसात करना और उनके अनुसार सामाजिक व्यवस्था के बदलाव में उपयोग करना सबसे बड़ी जरूरत है। मानव समाज द्वारा रचित साहित्य और दर्शन को आत्मसात करते हुए पदार्थवादी दर्शन के व्यावहारिक रूप को विकसित करना और वर्तमान परिस्थितियों को बदलने के लिए उपयोग में लाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
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