मॉस्को का एंटी-फासिस्ट फ़ोरम 2026 : फासीवाद-विरोध का वैश्विक मंच या नई भू-राजनीतिक वैचारिकी?

मॉस्को का एंटी-फासिस्ट फ़ोरम 2026 : फासीवाद-विरोध का वैश्विक मंच या नई भू-राजनीतिक वैचारिकी?

मई 2026 में मॉस्को में आयोजित तृतीय अंतरराष्ट्रीय एंटी-फासिस्ट फ़ोरम केवल एक राजनीतिक सम्मेलन नहीं था। यह उस वैचारिक संघर्ष का प्रतीक था जो आज की दुनिया में ‘फासीवाद’, ‘लोकतंत्र’, ‘साम्राज्यवाद’ और ‘बहुध्रुवीयता’ जैसे शब्दों के अर्थ को लेकर चल रहा है। सम्मेलन में दुनिया भर के कम्युनिस्ट दलों, वामपंथी संगठनों, ट्रेड यूनियनों, साम्राज्यवाद-विरोधी मंचों और सामाजिक आंदोलनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस मंच के साथ उन चिंतनों ने अपनी सहभागिता दिखाई जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ हैं। रूस ने इसे नव-फासीवाद और युद्धोन्माद के विरुद्ध वैश्विक प्रतिरोध का मंच बताया, जबकि इसके आलोचकों ने इसे रूस की विदेश नीति के वैचारिक विस्तार के रूप में देखा। यही इस सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता भी है और सबसे बड़ा विवाद भी।

बीसवीं शताब्दी में फासीवाद का अर्थ अपेक्षाकृत स्पष्ट था-मुसोलिनी का इटली, हिटलर का जर्मनी, सैन्यवाद, नस्लवाद और अधिनायकवाद। किंतु इक्कीसवीं शताब्दी में यह शब्द राजनीतिक संघर्ष का हथियार बन गया है। मॉस्को सम्मेलन का तर्क है कि आज का फासीवाद केवल सैन्य वर्दी पहनकर नहीं आता; वह अतिराष्ट्रवाद, नस्लवाद, विदेशियों के प्रति घृणा, युद्धोन्माद, सांस्कृतिक वर्चस्व और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के रूप में भी प्रकट होता है।

रूस इसी तर्क के आधार पर यूक्रेन युद्ध को भी ‘नव-नाज़ीवाद के विरुद्ध संघर्ष’ के रूप में प्रस्तुत करता है लेकिन यहीं से विवाद शुरू होता है। पश्चिमी देशों और अनेक यूरोपीय बुद्धिजीवियों का आरोप है कि रूस फासीवाद-विरोध की ऐतिहासिक विरासत का उपयोग अपनी सामरिक नीतियों को वैधता देने के लिए कर रहा है। इस प्रकार प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि फासीवाद क्या है; प्रश्न यह बन जाता है कि उसकी परिभाषा तय करने का अधिकार किसके पास है?

सम्मेलन की राजनीतिक महत्ता उसके घोषणापत्र और अपीलों से समझी जा सकती है। इनमें फासीवाद को केवल एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक पूँजीवाद के संकट, साम्राज्यवाद, नव-उपनिवेशवाद, नस्लवाद और युद्धोन्मुख राजनीति की उपज के रूप में प्रस्तुत किया गया।

घोषणापत्र में फ़िलिस्तीन के साथ एकजुटता, नाटो की आलोचना, सैन्य गठबंधनों के विस्तार का विरोध, वैश्विक दक्षिण की भूमिका और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया गया। इस दृष्टि से सम्मेलन केवल फासीवाद-विरोधी नहीं था; वह एक वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परियोजना का भी संकेत देता है। यह एकपक्षीय विश्व के लिए बेहतर संकेत साबित हो सकता है।

सम्मेलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी व्यापक भागीदारी थी। आयोजकों के अनुसार इसमें 90 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इससे यह साबित होता है कि यह सम्मेलन केवल कम्युनिस्ट दलों का नहीं था। इससे यह भी साबित होता है कि अमेरिकी पूंजीवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ दुनिया में एक नए प्रकार से गोलबंदी प्रारंभ हो गयी है। हालांकि कुछ मामलों में चीन भी अमेरिकी विरोधी ध्रुव से फायदा उठाना चाहता है लेकिन इस सम्मेलन के आयोजन के बाद यह साबित हो गया है कि रूस दुनिया में एक नए प्रकार की रणनीति पर काम कर रहा है।

इसमें कम्युनिस्ट और श्रमिक दलों के साथ-साथ ट्रेड यूनियन संगठन, वामपंथी सामाजिक आंदोलन, उपनिवेशवाद-विरोधी मंच, फ़िलिस्तीन समर्थक समूह, साम्राज्यवाद-विरोधी नेटवर्क और एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के अनेक राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए। इस आधार पर इसकी व्यापकता और महत्व को समझा जा सकता है।

यह विविधता सम्मेलन की ताकत भी थी और उसकी सीमा भी। ताकत इसलिए कि उसने फासीवाद-विरोध को किसी एक विचारधारा की बपौती नहीं बनने दिया। सीमा इसलिए कि इतने विविध समूहों के बीच फासीवाद, लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता की एक समान समझ विकसित होने की दिशा में पहल प्रारंभ हो गया है।

सोवियत संघ के विघटन के बाद लंबे समय तक रूस वैश्विक वैचारिक नेतृत्व से दूर रहा लेकिन पिछले एक दशक में उसने इतिहास को अपनी कूटनीति का महत्वपूर्ण उपकरण बनाया है। द्वितीय विश्वयुद्ध में नाज़ीवाद पर सोवियत विजय रूस की राष्ट्रीय पहचान का केंद्रीय तत्व बन चुकी है। मॉस्को का एंटी-फासिस्ट फ़ोरम इसी ऐतिहासिक स्मृति को अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जोड़ता है। सम्मेलन के माध्यम से रूस स्वयं को केवल एक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि फासीवाद-विरोधी वैश्विक परंपरा के उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत करना प्रारंभ कर दिया है।

इस दृष्टि से यह सम्मेलन विचारधारा का मंच होने के साथ-साथ रूस की सॉफ्ट पावर का भी महत्वपूर्ण उपकरण है। रूस और चीन के मीडिया ने सम्मेलन को सकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया। चीन ने इसे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, वैश्विक दक्षिण की भूमिका और द्वितीय विश्वयुद्ध की ऐतिहासिक स्मृति के संदर्भ में देखा। इसके विपरीत अमेरिकी और अधिकांश पश्चिमी मीडिया ने इसे संदेह की दृष्टि से देखा। उनके अनुसार रूस फासीवाद-विरोध की भाषा का उपयोग यूक्रेन युद्ध और अपनी भू-राजनीतिक परियोजनाओं को वैधता देने के लिए कर रहा है।

यूरोप में प्रतिक्रियाएँ सबसे अधिक विभाजित थीं। कुछ वामपंथी और युद्ध-विरोधी समूहों ने सम्मेलन का स्वागत किया, जबकि अन्य ने इसे रूस-केंद्रित राजनीतिक मंच मानते हुए दूरी बनाए रखी। अरब जगत में विशेष रूप से फ़िलिस्तीन समर्थक और राष्ट्रवादी हलकों ने सम्मेलन को अपेक्षाकृत सकारात्मक दृष्टि से देखा। वहीं लैटिन अमेरिका के अनेक वामपंथी संगठनों ने इसे साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों की निरंतरता के रूप में प्रस्तुत किया।

भारतीय संदर्भ में यह सम्मेलन एक अलग तरह का प्रश्न खड़ा करता है। भारत के लगभग सभी प्रमुख वामपंथी दल हिंदुत्व और दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद की आलोचना करते हुए ‘फासीवादी प्रवृत्तियों’ की बात करते हैं। लेकिन मॉस्को सम्मेलन के प्रश्न पर वे एकमत नहीं दिखाई देते। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) परंपरागत रूप से रूस और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट नेटवर्कों के साथ निकट संबंध बनाए रखने के पक्ष में रही है। इसलिए ऐसे मंचों के प्रति उसके भीतर अपेक्षाकृत अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण दिखाई देता है।

दूसरी ओर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) CPI (M), अपेक्षाकृत सावधानीपूर्ण रुख अपनाती है। वह रूस-विरोधी पश्चिमी विमर्श से सहमत नहीं है लेकिन रूस की विदेश नीति को बिना आलोचना स्वीकार करने को भी तैयार नहीं दिखती। सबसे रोचक स्थिति CPI (ML) लिबरेशन और स्वतंत्र वामपंथी बुद्धिजीवियों की है। उनके लिए फासीवाद-विरोध का अर्थ केवल पश्चिम-विरोध नहीं हो सकता। वे यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या किसी भी राज्य की नीतियों की आलोचना को साम्राज्यवाद-विरोध या फासीवाद-विरोध के नाम पर टाला जा सकता है? उनके अनुसार लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और जन-अधिकारों के प्रश्नों को भू-राजनीतिक निष्ठाओं के अधीन नहीं किया जा सकता।

इस प्रकार मॉस्को सम्मेलन ने केवल वैश्विक राजनीति में ही नहीं, भारतीय वामपंथ के भीतर भी एक वैचारिक बहस को उजागर किया है।

सम्मेलन ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखा – BRICS का यह कोई वैचारिक गठबंधन नहीं है। रूस इसे फासीवाद-विरोधी वैश्विक मोर्चे के रूप में देखता है। चीन इसे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के संदर्भ में समझता है। भारत रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है। ब्राज़ील के भीतर इस विषय पर गहरे मतभेद हैं और दक्षिण अफ्रीका इसे अपने उपनिवेशवाद-विरोधी अनुभवों की रोशनी में देखता है।

इसलिए BRICS देशों में पश्चिमी प्रभुत्व के प्रति असंतोष तो साझा है लेकिन उसके विकल्प की वैचारिक रूपरेखा साझा नहीं है। कुल मिलाकर मॉस्को का एंटी-फासिस्ट फ़ोरम 2026 अंततः हमें एक सत्य के सामने खड़ा करता है। आज दुनिया में संघर्ष केवल सेनाओं, सीमाओं और अर्थव्यवस्थाओं का नहीं है; संघर्ष शब्दों का भी है। ‘फासीवाद’, ‘लोकतंत्र’, ‘मानवाधिकार’, ‘साम्राज्यवाद’ और ‘स्वतंत्रता’ जैसे शब्द अब सार्वभौमिक सहमति के विषय नहीं रहे। हर शक्ति उन्हें अपने इतिहास, अनुभव और हितों के अनुसार परिभाषित कर रही है।

यही कारण है कि मॉस्को का यह सम्मेलन कुछ लोगों के लिए मानवता के साझा फासीवाद-विरोधी संघर्ष का मंच है, तो कुछ के लिए रूस की वैचारिक कूटनीति का उपकरण। परंतु इस विवाद से परे एक तथ्य निर्विवाद है। यह सम्मेलन हमें याद दिलाता है कि फासीवाद पर बहस केवल अतीत की स्मृति नहीं है; वह वर्तमान विश्व व्यवस्था और भविष्य की राजनीति को लेकर चल रहे संघर्ष का हिस्सा भी है। इसलिए मॉस्को का एंटी-फासिस्ट फ़ोरम केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि उस प्रश्न का दर्पण है जिससे पूरी दुनिया जूझ रही है-क्या बहुध्रुवीय दुनिया अधिक न्यायपूर्ण होगी, या केवल शक्ति-संतुलन के नए रूपों को जन्म देगी?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »