गौतम चौधरी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि उसमें चुनाव होते हैं, बल्कि यह है कि नागरिक बिना भय के अपनी असहमति व्यक्त कर सकें। अपनी बात रख सके। भारत का संविधान अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है। इसलिए जब राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और पुलिस के बीच हिंसक टकराव की खबरें सामने आती हैं, तो चिंता केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति की भी होती है।
20 जुलाई को जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसके बाद अनेक गंभीर दावे सामने आए हैं। लाठीचार्ज, आंसू गैस, गंभीर चोटें, शॉक बैटन और यहाँ तक कि पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोप भी लगाए गए हैं। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन के उपयोग से स्पष्ट इनकार किया है और कहा है कि ऐसे दावे निराधार हैं। इस विरोधाभास के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि किसका दावा अधिक जोरदार है, बल्कि यह है कि सत्य क्या है और उसे सामने कौन लाएगा?
लोकतांत्रिक राज्य में पुलिस की भूमिका कठिन होती है। उसे कानून-व्यवस्था बनाए रखनी होती है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करनी होती है और हिंसक स्थिति को नियंत्रित करना पड़ता है। यदि प्रदर्शन हिंसक हो जाए, तो पुलिस को बल प्रयोग का अधिकार भी है। लेकिन लोकतंत्र में यह अधिकार असीमित नहीं है। प्रत्येक बल प्रयोग आवश्यक, अनुपातिक और जवाबदेह होना चाहिए।
यदि प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, पत्थरबाजी की या पुलिस पर हमला किया, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन यदि पुलिस ने निर्धारित मानकों से अधिक बल प्रयोग किया, तो उसकी जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि कानून नागरिक और राज्य-दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
इस घटना ने एक और प्रश्न खड़ा किया है। क्या हमारे यहाँ भीड़ नियंत्रण के आधुनिक और मानवीय तरीकों पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है? दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में पुलिस बल को निरंतर प्रशिक्षित किया जाता है ताकि तनावपूर्ण परिस्थितियों में न्यूनतम बल का प्रयोग हो। भारत में भी यह बहस अब टाली नहीं जा सकती।
पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप विशेष रूप से गंभीर है। यदि यह आरोप गलत है, तो वैज्ञानिक और चिकित्सकीय साक्ष्यों के आधार पर उसे तत्काल खारिज किया जाना चाहिए। यदि इसमें कोई सच्चाई है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में अस्पष्टता लोकतंत्र के हित में नहीं है।
जंतर-मंतर की घटना केवल दिल्ली की घटना नहीं है। यह उस प्रश्न का प्रतीक है कि क्या भारत अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप असहमति का सम्मान करना सीख रहा है, या विरोध और व्यवस्था के बीच संवाद की जगह टकराव ले रहा है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे आवश्यक है कि किसी स्वतंत्र एजेंसी या न्यायिक निगरानी में निष्पक्ष जांच हो। अस्पतालों के अभिलेख, वीडियो फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, पुलिस के रिकॉर्ड और फॉरेंसिक साक्ष्यों की समग्र जांच ही सच्चाई को सामने ला सकती है। लोकतंत्र में सत्य का स्थान अफवाहों या आधिकारिक दावों से ऊपर होता है।
कुल मिलाकर किसी भी लोकतांत्रिक समाज की शक्ति उसकी पुलिस की लाठी में नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं की विश्वसनीयता में होती है। यदि नागरिकों को विश्वास हो कि हर घटना की निष्पक्ष जांच होगी और दोषी चाहे कोई भी हो, उससे जवाब माँगा जाएगा, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा। जंतर-मंतर की घटना इसी विश्वास की परीक्षा है। प्रश्न केवल यह नहीं कि उस दिन क्या हुआ; प्रश्न यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र सच जानने का साहस रखता है।
