गौतम चौधरी
भारतीय राजनीति में एक विचित्र विडम्बना लगातार गहराती जा रही है। एक ओर चुनावी मंचों पर “विश्वगुरु”, “पाँच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था” और “विकसित भारत” जैसे महत्वाकांक्षी नारों की गूंज सुनाई देती है, तों दूसरी ओर देश का मेहनतकश वर्ग अपने श्रम की न्यूनतम कीमत और बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष करने को विवश है। नोएडा, गुरुग्राम, मानेसर, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे औद्योगिक क्षेत्रों से समय-समय पर उठने वाली असंतोष की आवाज़ें केवल वेतन वृद्धि की मांग नहीं हैं; वे उस विकास मॉडल पर सवाल खड़े करती हैं जिसमें आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा ऊपर केंद्रित होता जाता है और श्रम करने वाला वर्ग असुरक्षा और अनिश्चितता में जीवन बिताने को मजबूर रहता है।
हाल के दिनों में विभिन्न राज्यों द्वारा न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की घोषणाओं को इसी पृष्ठभूमि में समझा जाना चाहिए। तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों के निर्णय केवल प्रशासनिक कदम नहीं हैं, बल्कि वे उस सामाजिक दबाव और आर्थिक यथार्थ की स्वीकारोक्ति भी हैं जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। भारत का औद्योगिक विस्तार बड़े पैमाने पर सस्ते श्रम पर आधारित रहा है। असंगठित क्षेत्र का विस्तार, ठेका प्रथा का बढ़ता प्रभाव और श्रम कानूनों के संरक्षण में आई कमी ने मजदूरों को उत्पादन प्रक्रिया का अनिवार्य, किंतु सबसे असुरक्षित घटक बना दिया है।
यह विडम्बना और भी गहरी है कि जिन हाथों ने शहरों की ऊँची इमारतें खड़ी कीं, मेट्रो रेल बिछाई, एक्सप्रेसवे बनाए और डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति दी, वही हाथ आज सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अधिकांश राज्यों में न्यूनतम मजदूरी की दरें महँगाई, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा की वास्तविक लागत से मेल नहीं खातीं। ऐसे में मजदूर आंदोलनों को केवल “अशांति”, “अव्यवस्था” या “राजनीतिक उकसावे” के रूप में प्रस्तुत करना मूल समस्याओं से ध्यान हटाने जैसा है।
हालाँकि, श्रमिक आंदोलनों के भीतर मौजूद चुनौतियों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत में मजदूर राजनीति कई बार वैचारिक अतियों का शिकार हो जाती है। कुछ समूह हर आर्थिक असमानता को “फ़ासीवाद” और हर प्रशासनिक कार्रवाई को “राज्य दमन” की संज्ञा दे देते हैं। इससे वास्तविक श्रमिक प्रश्नों की गंभीरता कभी-कभी नारेबाज़ी के शोर में दब जाती है। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन हर संस्थान को शत्रु और हर असहमत व्यक्ति को पूँजी का प्रतिनिधि मान लेना समाधान का रास्ता नहीं खोलता। भारत की सामाजिक वास्तविकता केवल वर्ग संघर्ष तक सीमित नहीं है; उसमें जाति, क्षेत्र, भाषा और सांस्कृतिक पहचान जैसे अनेक आयाम भी शामिल हैं। इसलिए किसी भी श्रमिक आंदोलन की सफलता व्यापक सामाजिक समर्थन और लोकतांत्रिक संवाद पर निर्भर करेगी, केवल वैचारिक कठोरता पर नहीं।
दूसरी ओर, राज्य सत्ता का रवैया भी गंभीर चिंता का विषय है। जब किसी आंदोलन के उत्तर में अत्यधिक दमन, व्यापक गिरफ्तारियाँ, पत्रकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई या कठोर कानूनी प्रावधानों का प्रयोग दिखाई देता है, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है, लेकिन असहमति को अपराध की तरह प्रस्तुत करना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संवाद, सहभागिता और विश्वास में निहित होती है, भय और दमन में नहीं।
भारत की अर्थव्यवस्था आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। एक ओर वैश्विक निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा है, तो दूसरी ओर श्रमिक अधिकारों और सामाजिक न्याय का प्रश्न है। यदि विकास का मूल्यांकन केवल कॉरपोरेट लाभ, शेयर बाज़ार की ऊँचाइयों और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि से किया जाएगा, तो सामाजिक असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। स्थायी और समावेशी औद्योगिक विकास का आधार सस्ता तथा असुरक्षित श्रम नहीं, बल्कि सम्मानजनक मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित कार्यस्थल और निर्णय प्रक्रिया में श्रमिकों की भागीदारी होना चाहिए।
मजदूर आंदोलनों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि आर्थिक विकास केवल आँकड़ों का खेल नहीं है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जानी चाहिए कि उसकी उत्पादन प्रक्रिया में सबसे नीचे खड़े व्यक्ति का जीवन कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और आशावान है। भारत यदि सचमुच एक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है, तो उसे अपने मेहनतकश नागरिकों को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के समान भागीदार के रूप में स्वीकार करना होगा। यही किसी भी आधुनिक और न्यायपूर्ण राष्ट्र की पहचान है।
