गौतम चौधरी
अमेरिकी सांसद Ilhan Omar का हालिया बयान भारत में एक नई बहस को जन्म दे गया है। उनका दावा है कि विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार भारत अब ‘नरसंहार के आठवें चरण’ में प्रवेश कर चुका है। यह कथन केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, यह भारत जैसे लोकतांत्रिक और बहुधार्मिक समाज पर लगाया गया अत्यंत गंभीर आरोप है। इसलिए इस पर प्रतिक्रिया भावनाओं से नहीं, तथ्यों और विवेक से होनी चाहिए।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ‘नरसंहार के दस चरण’ कोई अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा स्वीकृत कानूनी मानक नहीं हैं। यह अमेरिकी विद्वान Gregory Stanton द्वारा विकसित एक विश्लेषणात्मक मॉडल है, जिसका उद्देश्य संभावित सामाजिक खतरों की पहचान करना है। अर्थात किसी देश को “आठवें चरण” में बताना स्वयं में यह सिद्ध नहीं करता कि वहाँ नरसंहार हो रहा है या होने वाला है। यह एक राजनीतिक-शैक्षणिक व्याख्या है, अंतिम सत्य नहीं।
फिर भी इस तरह के आरोपों को केवल विदेशी हस्तक्षेप कहकर खारिज कर देना भी पर्याप्त नहीं होगा। भारत में पिछले एक दशक के दौरान सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, घृणास्पद भाषण, भीड़ हिंसा और धार्मिक पहचान की राजनीति को लेकर अनेक चिंताएँ व्यक्त की गई हैं। देश के भीतर भी अनेक बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक संगठन इन प्रश्नों को उठा रहे हैं। लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि वह असहज प्रश्नों से भागता नहीं, उनका सामना करता है।
इसी बिंदु पर इल्हान उमर की विश्वसनीयता का प्रश्न भी सामने आता है। भारत के बारे में उनकी टिप्पणियाँ कोई नई बात नहीं हैं। कश्मीर, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों के मुद्दों पर वे लंबे समय से भारत सरकार की आलोचक रही हैं। 2022 में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की उनकी यात्रा ने भारत और अमेरिका के संबंधों में अनावश्यक विवाद खड़ा किया था। भारत सरकार ने उस समय उनके रुख को पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया था।
उनके आलोचक एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं। यदि मानवाधिकार ही उनका केंद्रीय सरोकार है, तो पाकिस्तान में हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों की स्थिति, जबरन धर्मांतरण, ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग या अहमदिया समुदाय पर होने वाले दमन के प्रश्नों पर उनकी आवाज़ उतनी मुखर क्यों नहीं दिखाई देती? चीन में उइगर मुसलमानों की स्थिति या पश्चिम एशिया के अनेक देशों में धार्मिक स्वतंत्रता के संकट पर भी उनका सक्रिय हस्तक्षेप अपेक्षाकृत सीमित रहा है। यही कारण है कि उन पर ‘चयनात्मक मानवाधिकारवाद’ का आरोप लगता रहा है।
यह प्रश्न केवल इल्हान उमर तक सीमित नहीं है। आधुनिक वैश्विक राजनीति में मानवाधिकारों का विमर्श अक्सर भू-राजनीतिक हितों से प्रभावित दिखाई देता है। पश्चिमी देशों द्वारा लोकतंत्र और मानवाधिकार की भाषा का उपयोग कई बार नैतिक आग्रह जितना ही राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी रहा है। ऐसे में किसी भी बाहरी आलोचना को बिना जांचे-परखे स्वीकार कर लेना उतना ही अनुचित है जितना उसे बिना सुने खारिज कर देना।
भारत के संदर्भ में एक और तथ्य महत्वपूर्ण है। यदि वास्तव में भारत ‘नरसंहार के आठवें चरण’ में होता, तो क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नियमित चुनावों, स्वतंत्र न्यायपालिका, सक्रिय मीडिया, बहुदलीय राजनीति और जीवंत नागरिक समाज के साथ उसी प्रकार कार्य कर पाता जैसा आज कर रहा है? यह प्रश्न आलोचकों को भी जवाब देना होगा।
दूसरी ओर, भारत को यह मान लेने का भी अधिकार नहीं है कि केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं का अस्तित्व ही पर्याप्त प्रमाण है कि सब कुछ ठीक है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; वह नागरिकों के विश्वास से चलता है। यदि किसी भी समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा होती है, तो उसे गंभीरता से सुनना लोकतांत्रिक राज्य का दायित्व है।
यहीं भारतीय अनुभव पश्चिमी विश्लेषणों से भिन्न हो जाता है। भारत कोई एकरंगी समाज नहीं है। यहाँ धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और वर्ग की अनेक परतें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। भारतीय राजनीति में संघर्ष हैं, तनाव हैं, सांप्रदायिक हिंसा के उदाहरण भी हैं, लेकिन साथ ही करोड़ों लोग प्रतिदिन एक-दूसरे के साथ काम करते हैं, व्यापार करते हैं, त्योहार मनाते हैं और साझा सामाजिक जीवन जीते हैं। भारत की वास्तविकता को केवल संघर्ष या केवल सह-अस्तित्व की कहानी में समेटना संभव नहीं है।
इसलिए इल्हान उमर का बयान एक उपयोगी चेतावनी हो सकता है, लेकिन उसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि भारत के समर्थक हर आलोचना को ‘भारत-विरोध’ कहकर खारिज करने की प्रवृत्ति से बचें। लोकतंत्र की परिपक्वता आलोचना को दबाने में नहीं, बल्कि तथ्यों और तर्कों के आधार पर उसका उत्तर देने में होती है।
प्रश्न यह नहीं है कि इल्हान उमर क्या कहती हैं। प्रश्न यह है कि भारत अपने संविधान में निहित समानता, धर्मनिरपेक्षता और नागरिक अधिकारों के आदर्शों को कितनी मजबूती से लागू कर पा रहा है। यदि भारत इस कसौटी पर खरा उतरता है, तो किसी विदेशी सांसद का आरोप केवल एक राजनीतिक वक्तव्य बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि समाज में विभाजन और अविश्वास बढ़ता है, तो ऐसी आलोचनाएँ अधिक प्रभावशाली होती जाएँगी।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी छवि बचाना नहीं, बल्कि अपने लोकतांत्रिक चरित्र को मजबूत बनाए रखना है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके बारे में दिए गए विदेशी प्रमाणपत्रों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के अनुभवों से तय होती है।
