दुर्गेश्वर राय
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आज केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना का ऐसा उत्सव बन चुका है जो स्वास्थ्य, संतुलन और मानवीय एकता के साझा मूल्यों को अभिव्यक्ति देता है। 21 जून को दुनिया के अनेक देशों में करोड़ों लोग योगाभ्यास के माध्यम से एक ऐसे विचार से जुड़ते हैं जिसकी जड़ें भारत की प्राचीन परंपरा में हैं, लेकिन जिसका संदेश सम्पूर्ण मानवता के लिए समान रूप से प्रासंगिक है। मानसिक तनाव, जीवनशैली जनित रोगों और बढ़ती सामाजिक-राजनीतिक अस्थिरताओं के दौर में योग एक ऐसे मार्ग के रूप में उभरा है जो व्यक्ति को स्वयं से, समाज को समुदाय से और मानवता को प्रकृति से जोड़ने का प्रयास करता है।
योग की वैश्विक स्वीकृति अपने आप में एक उल्लेखनीय घटना है। कभी आश्रमों और साधना केंद्रों तक सीमित मानी जाने वाली यह परंपरा आज विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, सैन्य प्रतिष्ठानों और कॉरपोरेट संस्थानों तक पहुँच चुकी है। दुनिया के अनेक देशों में योग को स्वास्थ्य संवर्धन और मानसिक संतुलन के प्रभावी माध्यम के रूप में अपनाया जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे किसी धर्म, जाति या राष्ट्रीय सीमा के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। योग का मूल संदेश मानव कल्याण है और यही इसकी सार्वभौमिक स्वीकार्यता का आधार बना है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की स्थापना भी भारत की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मानी जाती है। वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन मिला और अल्प समय में ही 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया गया। यह केवल किसी सांस्कृतिक परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने की घटना नहीं थी, बल्कि इस बात की भी स्वीकारोक्ति थी कि आधुनिक विश्व को स्वास्थ्य और संतुलन के ऐसे वैकल्पिक दृष्टिकोणों की आवश्यकता है जो मनुष्य को समग्र रूप से संबोधित करते हों।
पिछले एक दशक में योग दिवस का विस्तार निरंतर बढ़ा है। विभिन्न देशों में आयोजित कार्यक्रमों में करोड़ों लोगों की भागीदारी यह दर्शाती है कि योग अब वैश्विक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। इसकी लोकप्रियता का कारण केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि वह व्यापक जीवन-दर्शन है जो संतुलन, अनुशासन, आत्मसंयम और सामंजस्य की शिक्षा देता है। योग का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ बनाना नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और चेतना को भी परिष्कृत करना है।
भारत के लिए योग किसी आयातित विचार या आधुनिक प्रवृत्ति का नाम नहीं है। इसकी जड़ें भारतीय सभ्यता की प्राचीन स्मृतियों में गहराई तक समाई हुई हैं। वेदों, उपनिषदों, भगवद्गीता और महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों में योग के विविध आयामों का विस्तार से वर्णन मिलता है। भारतीय चिंतन में योग को जीवन के बाहरी और भीतरी आयामों के बीच संतुलन स्थापित करने वाली साधना माना गया है। यही कारण है कि योग केवल आसनों तक सीमित नहीं है; यह आत्म-अनुशासन, आत्म-बोध और व्यापक सामाजिक चेतना का भी मार्ग है।
आधुनिक युग में स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद, स्वामी शिवानंद, बी.के.एस. अयंगर और अनेक अन्य योगाचार्यों ने योग को विश्व मंच तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों ने यह स्पष्ट किया कि योग केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि मानव जीवन को अधिक संतुलित और सार्थक बनाने की एक व्यावहारिक पद्धति भी है। आज विभिन्न वैज्ञानिक संस्थान और चिकित्सा शोध केंद्र योग के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं, जिससे इसकी विश्वसनीयता और स्वीकार्यता लगातार बढ़ी है।
समकालीन जीवन की चुनौतियों को देखते हुए योग का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। तनाव, अवसाद, अनिद्रा, चिंता और अस्वस्थ जीवनशैली आज वैश्विक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुके हैं। ऐसे समय में प्राणायाम, ध्यान और योगाभ्यास व्यक्ति को मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और आत्मविश्वास प्रदान करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। योग हमें केवल स्वस्थ रहना नहीं सिखाता, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी संतुलित बने रहने की क्षमता प्रदान करता है।
योग का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी है। भारतीय दर्शन में मनुष्य और प्रकृति को परस्पर जुड़ा हुआ माना गया है। योग इसी एकात्म दृष्टि को विकसित करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन और परिवेश के प्रति अधिक उत्तरदायी बनता है। आज जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं, तब योग का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस ने भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति और वैश्विक प्रतिष्ठा को भी नई ऊँचाई प्रदान की है। योग के माध्यम से भारत ने दुनिया को ऐसा विचार दिया है जो किसी प्रभुत्व या प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि सहयोग, संतुलन और कल्याण का संदेश देता है। यही भारत की उस सांस्कृतिक शक्ति का परिचायक है जो संवाद और साझेदारी के माध्यम से विश्व समुदाय को जोड़ने का प्रयास करती है।
योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, समाज को सौहार्दपूर्ण और विश्व को अधिक शांतिपूर्ण बनाने का एक व्यापक दृष्टिकोण है। यदि मानवता को तनाव, संघर्ष और विभाजन से ऊपर उठकर एक साझा भविष्य का निर्माण करना है, तो योग उसके लिए एक महत्वपूर्ण सेतु बन सकता है। इसी अर्थ में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उस वैश्विक आकांक्षा का प्रतीक है जिसमें स्वास्थ्य, समरसता और मानवीय एकता को विकास का आधार माना जाता है।
लेखक शैक्षिक संवाद मंच के संयोजक हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
