गौतम चौधरी
गत 19 जून को Royal College of Surgeons of Edinburgh के ऐतिहासिक परिसर में महर्षि Sushruta की कांस्य प्रतिमा की स्थापना केवल एक सांस्कृतिक या औपचारिक घटना नहीं है। यह विश्व चिकित्सा इतिहास के उस लंबे अध्याय की पुनर्स्मृति भी है, जिसे आधुनिक ज्ञान-विमर्श में अक्सर हाशिये पर रखा गया। शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुत के योगदान को मान्यता देते हुए एडिनबर्ग के इस प्रतिष्ठित संस्थान ने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार किया है कि विज्ञान और चिकित्सा का इतिहास केवल यूनान और यूरोप की कहानी नहीं है, बल्कि उसमें भारत सहित अनेक प्राचीन सभ्यताओं की भी केंद्रीय भूमिका रही है।
सुश्रुत को सामान्यतः ‘शल्य चिकित्सा का जनक’ कहा जाता है। उनकी रचना Sushruta Samhita विश्व की सबसे प्राचीन और व्यवस्थित शल्य चिकित्सा संबंधी कृतियों में गिनी जाती है। इसमें सैकड़ों शल्य प्रक्रियाओं और अनेक शल्य उपकरणों का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से नाक पुनर्निर्माण अर्थात राइनोप्लास्टी की वह तकनीक, जिसे बाद में यूरोप में ‘इंडियन मेथड’ के रूप में जाना गया, आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी के इतिहास में आज भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जाती है।
किन्तु इस सम्मान का महत्व केवल चिकित्सा विज्ञान तक सीमित नहीं है। यह ज्ञान की वैश्विक राजनीति पर भी प्रश्न उठाता है। औपनिवेशिक युग में इतिहास लेखन का एक बड़ा हिस्सा इस धारणा पर आधारित था कि वैज्ञानिक चेतना और तार्किक ज्ञान का विकास मुख्यतः यूरोप की देन है। भारत, चीन, अरब और अन्य एशियाई सभ्यताओं के योगदान को या तो गौण कर दिया गया या उन्हें लोकज्ञान और परंपरा की श्रेणी में सीमित कर दिया गया। परिणामस्वरूप आधुनिक शिक्षित समाज की स्मृति में विज्ञान का इतिहास अक्सर यूनान से शुरू होकर यूरोप में समाप्त हो जाता है।
सुश्रुत की प्रतिमा की स्थापना इस एकांगी दृष्टिकोण को चुनौती देती है। यह याद दिलाती है कि जब यूरोप मध्ययुगीन अंधकार के दौर से गुजर रहा था, तब भारत में शरीर रचना, शल्य चिकित्सा, औषध विज्ञान और चिकित्सा शिक्षा पर गंभीर कार्य हो रहा था। यह कोई भावनात्मक राष्ट्रवादी दावा नहीं, बल्कि चिकित्सा इतिहास के अनेक शोधों द्वारा समर्थित तथ्य है। फिर भी इस अवसर पर आत्ममुग्धता से बचना आवश्यक है।
भारत में प्राचीन उपलब्धियों का उल्लेख होते ही दो अतिवादी प्रवृत्तियाँ सामने आ जाती हैं। पहली प्रवृत्ति उन्हें पूरी तरह खारिज करने की है, मानो प्राचीन भारत में कोई वैज्ञानिक परंपरा थी ही नहीं। दूसरी प्रवृत्ति हर आधुनिक वैज्ञानिक उपलब्धि को हजारों वर्ष पहले भारत में खोज लिए जाने का दावा करने लगती है। दोनों दृष्टिकोण इतिहास और विज्ञान के साथ न्याय नहीं करते।
सुश्रुत का वास्तविक महत्व इस बात में नहीं है कि उन्हें आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का प्रत्यक्ष आविष्कारक सिद्ध किया जाए, बल्कि इस तथ्य में है कि उन्होंने अपने समय में व्यवस्थित अवलोकन, अनुभव और चिकित्सकीय अभ्यास के आधार पर ज्ञान का ऐसा ढाँचा निर्मित किया जो अपने युग से बहुत आगे था। विज्ञान का सम्मान इसी दृष्टि से होना चाहिएकृप्रमाण, तर्क और प्रयोग के आधार पर, न कि अतिशयोक्ति या मिथकीय दावों के माध्यम से।
इस प्रसंग का एक दूसरा पक्ष भी है, जिस पर भारत में अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। यदि पश्चिमी संस्थान आज सुश्रुत का सम्मान कर रहे हैं, तो क्या भारत स्वयं अपने वैज्ञानिक और बौद्धिक इतिहास के संरक्षण के प्रति उतना ही गंभीर है? हमारे विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और पाठ्यक्रमों में प्राचीन भारतीय विज्ञान पर गंभीर अनुसंधान की स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। अक्सर यह विषय या तो राष्ट्रवादी भावनाओं का उपकरण बन जाता है या फिर वैचारिक संकोच के कारण उपेक्षित रह जाता है।
वास्तविक आवश्यकता यह है कि सुश्रुत, आर्यभट, चरक और अन्य प्राचीन विद्वानों का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति के साथ किया जाए। उनके योगदान का मूल्यांकन न श्रद्धा के आधार पर हो और न पूर्वाग्रह के आधार पर। ज्ञान की परंपरा का सम्मान तभी सार्थक होगा जब वह नए अनुसंधान और नई जिज्ञासाओं को जन्म दे।
एडिनबर्ग में स्थापित यह प्रतिमा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं करती, बल्कि वैश्विक ज्ञान परंपरा की बहुलता को स्वीकार करती है। यह उस ऐतिहासिक सत्य की याद दिलाती है कि मानव सभ्यता की प्रगति किसी एक संस्कृति, एक भूभाग या एक राष्ट्र की देन नहीं है। विज्ञान का इतिहास अनेक सभ्यताओं के साझा योगदान से निर्मित हुआ है।
आज जब दुनिया सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत स्मृतियों को नए सिरे से देखने की कोशिश कर रही है, तब सुश्रुत की प्रतिमा हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती है-अतीत का सम्मान तभी सार्थक है जब वह वर्तमान को अधिक विवेकपूर्ण और भविष्य को अधिक समृद्ध बनाने की प्रेरणा दे।
एडिनबर्ग में सुश्रुत की प्रतिमा इसी प्रेरणा का प्रतीक है। यह केवल भारत के लिए गर्व का विषय नहीं, बल्कि विश्व समुदाय के लिए भी एक स्मरण है कि ज्ञान की कोई एक राजधानी नहीं होती; उसकी जड़ें मानव सभ्यता की अनेक धाराओं में फैली होती हैं।
