गौतम चौधरी
भारत में मानसून केवल एक मौसमीय घटना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, कृषि और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार भी है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में जब मौसम वैज्ञानिक अल नीनो की सक्रियता और मानसून की अनिश्चितता की चर्चा करते हैं, तो यह केवल मौसम विभाग की चिंता नहीं रह जाती, बल्कि खाद्य सुरक्षा, महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बन जाता है। इसे समझना और इसके आधार पर भविष्य की योजना बनाना जरूरी है।
पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन ने मौसम के पारंपरिक चक्र को प्रभावित किया है। कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे शुष्क दौर देखने को मिल रहे हैं। इस बार भी मौसम विशेषज्ञों ने अल नीनो के प्रभाव और मानसून की असमान प्रगति को लेकर चिंता व्यक्त की है। केंद्र सरकार ने कई जिलों के लिए आकस्मिक कृषि योजनाएँ तैयार की हैं, जो इस बात का संकेत है कि स्थिति पर गंभीर निगरानी रखी जा रही है।
अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि की वह प्रक्रिया है, जिसका प्रभाव पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। भारत में इसका संबंध अक्सर कमजोर मानसून से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष सूखे में नहीं बदलता लेकिन इसके कारण वर्षा की मात्रा और वितरण दोनों प्रभावित तो होती ही है। कई बार कुल वर्षा सामान्य दिखाई देती है लेकिन उसका भौगोलिक वितरण इतना असंतुलित होता है कि कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और कुछ में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
भारतीय कृषि की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अभी भी मानसून पर अत्यधिक निर्भर है। सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के बावजूद देश के विशाल हिस्से में किसान वर्षा आधारित खेती करते हैं। यदि मानसून कमजोर रहता है या समय पर नहीं आता, तो धान, दलहन, तिलहन और अन्य खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित होती है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है और खाद्यान्न उत्पादन घटने से बाजार में कीमतें बढ़ने लगती हैं।
कमजोर मानसून का प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर घटते हैं, उपभोग कम होता है और इसका असर समूची अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। कृषि क्षेत्र में मंदी का प्रभाव उद्योग और सेवा क्षेत्र तक पहुँचता है। यही कारण है कि मानसून की प्रगति पर सरकार, रिजर्व बैंक और बाजार सभी की नजर रहती है।
हाल के दिनों में जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में चरम मौसम घटनाएँ-जैसे अचानक अत्यधिक वर्षा, लंबे सूखे, हीटवेव और बाढ़ और अधिक सामान्य हो सकती हैं। इसका अर्थ है कि केवल मानसून की मात्रा नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा।
इस चुनौती से निपटने के लिए केवल मौसम की अनुकूलता पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सूखा-रोधी बीजों का विकास और फसल विविधीकरण जैसी नीतियाँ समय की आवश्यकता हैं। साथ ही कृषि बीमा और किसानों को समय पर मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारत ने हरित क्रांति के माध्यम से खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त की थी। अब जलवायु परिवर्तन के युग में देश को ‘जलवायु-स्मार्ट कृषि’ की दिशा में आगे बढ़ना होगा। मानसून की अनिश्चितता और अल नीनो के प्रभाव हमें यही चेतावनी दे रहे हैं कि कृषि को अधिक लचीला और टिकाऊ बनाने के बिना भविष्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
मानसून हर वर्ष आता है लेकिन अब वह पहले जैसा पूर्वानुमेय नहीं रहा। इसलिए प्रश्न केवल इस वर्ष की वर्षा का नहीं, बल्कि उस कृषि व्यवस्था का है जो आज भी बादलों की मेहरबानी पर निर्भर है। यदि समय रहते आवश्यक सुधार नहीं किए गए, तो अल नीनो और जलवायु परिवर्तन की संयुक्त चुनौती आने वाले वर्षों में कृषि संकट को और गहरा सकती है।
इससे निवटने के लिए सरकारें अपनी ओर से काम कर रही है लेकिन कुछ काम आम लोगों को भी करना चाहिए। एक तो किसान भाई उस प्रकार की फसलों का चयन करें जो कम पानी से उपजाया जा सके। दूसरा भारतीय स्वदेशी और पारंपरिक खेती भी इसके लिए उपयोगी हो सकता है। इस प्रकार की खेती के लिए जैविक और प्राकृतिक खेती बेहतर माना जाता है। इसमें पानी की बचत होती है और बढ़िया पैदाबार भी लिया जा सकता है।
