अक्षपाद् गौतम
झारखंड का निर्माण केवल एक नए राज्य के गठन की प्रशासनिक घटना नहीं था, उसके पीछे लगभग एक सदी का संघर्ष था। यह संघर्ष था पहचान का, संसाधनों पर अधिकार का और विकास की वैकल्पिक अवधारणा का। यही कारण है कि झारखंड की हर सरकार से यह अपेक्षा की जाती रही है कि वह केवल शासन न करे, बल्कि उस ऐतिहासिक आकांक्षा का भी प्रतिनिधित्व करे जिसने इस राज्य को जन्म दिया।
हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार ने अपने राजनीतिक विमर्श के केंद्र में एक बार फिर वही पुराना सूत्र रखा-जल, जंगल, जमीन। इसके साथ स्थानीय भाषा, आदिवासी संस्कृति, वनाधिकार और क्षेत्रीय अस्मिता को भी नीति-निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बनाने का प्रयास किया गया। राजनीतिक दृष्टि से यह सफल रणनीति रही है। इसने हेमंत सरकार को एक विशिष्ट पहचान दी है, जो राष्ट्रीय दलों के विकास-विमर्श से अलग दिखाई देती है। लेकिन किसी भी राजनीतिक दर्शन की अंतिम परीक्षा उसके नारों से नहीं, अपितु उसके परिणामों से होती है।
इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि हेमंत सोरेन सरकार ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में स्थापित कर दिया है। स्थानीय भाषाओं को सम्मान देने, आदिवासी पर्व-परंपराओं को सरकारी मान्यता दिलाने, विस्थापन और भूमि-अधिकार के प्रश्नों को प्रमुखता देने तथा महिलाओं और ग्रामीण समुदायों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ चलाने के प्रयास हुए। इससे लंबे समय से उपेक्षित समुदायों में यह विश्वास अवश्य पैदा हुआ कि राज्य उनकी सांस्कृतिक अस्मिता को स्वीकार कर रहा है। किन्तु यहीं से दूसरा और अधिक जटिल प्रश्न प्रारंभ होता है।
क्या केवल पहचान-आधारित राजनीति से झारखंड की मूल समस्याओं का समाधान संभव है? यह प्रश्न हेमंत के लिए ही नहीं, उस पूरे आदिवासी स्मिता की राजनीति करने वालों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आज भी राज्य की बड़ी आबादी गरीबी, बेरोज़गारी, कुपोषण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव से जूझ रही है। खनिज संपदा से समृद्ध होने के बावजूद झारखंड के अनेक जिले विकास के बुनियादी मानकों पर पीछे हैं। यदि जल, जंगल और जमीन की राजनीति आर्थिक परिवर्तन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, औद्योगिक निवेश, कृषि उत्पादकता और रोजगार सृजन से नहीं जुड़ती, तो वह अंततः केवल भावनात्मक राजनीति बनकर रह जाएगी।
यहीं हेमंत सरकार की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है। झारखंड की राजनीति लंबे समय से दो ध्रुवों के बीच झूलती रही है। एक ओर प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र दोहन पर आधारित विकास मॉडल है, दूसरी ओर संसाधनों की रक्षा और स्थानीय अधिकारों पर आधारित मॉडल। वास्तविक समाधान इन दोनों के बीच संतुलन में है। यदि निवेश नहीं आएगा तो रोजगार नहीं बढ़ेगा, और यदि स्थानीय समुदायों की सहमति तथा पर्यावरणीय संतुलन की उपेक्षा होगी तो विकास सामाजिक संघर्ष में बदल जाएगा।
सरकार की उपलब्धि यह है कि उसने इस बहस को पुनः जीवित किया। लेकिन अब उससे अपेक्षा केवल बहस की नहीं, बल्कि नीति-आधारित समाधान की है। वनाधिकार केवल भूमि का पट्टा देने तक सीमित नहीं रह सकता। उसे स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना होगा। लघु वनोपज, बाँस, लाख, तसर, औषधीय पौधों और सामुदायिक वन प्रबंधन को ग्रामीण आय का मजबूत आधार बनाना होगा। स्थानीय भाषाओं को सम्मान देना महत्वपूर्ण है, पर उतना ही महत्वपूर्ण है कि उन्हीं भाषाओं के विद्यार्थियों को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने वाली शिक्षा भी मिले।
झारखंड की युवा पीढ़ी केवल सांस्कृतिक पहचान नहीं चाहती; वह सम्मानजनक रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुरक्षित भविष्य भी चाहती है। यदि राज्य की राजनीति केवल अस्मिता तक सीमित रह जाएगी, तो यह नई पीढ़ी स्वयं को अधूरा महसूस करेगी।
हेमंत सोरेन सरकार की एक विशेषता यह रही है कि उसने आदिवासी प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श में पुनः प्रमुखता से स्थापित किया। यह उसका महत्वपूर्ण राजनीतिक योगदान है। लेकिन अब अगला चरण अधिक कठिन है। पहचान की राजनीति को विकास की राजनीति में रूपांतरित करना होगा। जल, जंगल और जमीन को केवल संघर्ष का प्रतीक नहीं, बल्कि समृद्धि का आधार बनाना होगा।
झारखंड के भविष्य का प्रश्न यह नहीं है कि उसकी पहचान क्या है; यह प्रश्न तो इतिहास पहले ही तय कर चुका है। असली प्रश्न यह है कि क्या यह पहचान राज्य के प्रत्येक नागरिक के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकेगी?
यदि जल, जंगल और जमीन की अवधारणा स्थानीय स्वशासन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, हरित उद्योग, पर्यावरणीय न्याय, आदिवासी अधिकार और आधुनिक आर्थिक अवसरों को एक सूत्र में बाँधने में सफल होती है, तो झारखंड वास्तव में भारत के लिए एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत कर सकता है लेकिन यदि यह विमर्श केवल चुनावी नारों तक सीमित रह गया, तो इतिहास इसे एक अधूरी संभावना के रूप में याद करेगा।
झारखंड को आज केवल अपनी पहचान की रक्षा नहीं करनी है; उसे यह भी सिद्ध करना है कि आदिवासी जीवन-दर्शन पर आधारित शासन व्यवस्था आधुनिक विकास, सामाजिक न्याय और आर्थिक समृद्धिकृतीनों का सफल समन्वय कर सकती है। यही हेमंत सोरेन सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा है, और यही झारखंड की सबसे बड़ी आशा भी।
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