अल-वला वल-बरा : इस्लामी शिक्षा के आलोक में मुसलमानों की कुछ सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ भी हैं

अल-वला वल-बरा : इस्लामी शिक्षा के आलोक में मुसलमानों की कुछ सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ भी हैं

अमूमन धार्मिक अवधारणाओं का मूल्यांकन केवल शाब्दिक अर्थ से किया जाता है और उसके व्यापक नैतिक व सामाजिक संदर्भों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसा होना बड़े परिप्रेक्ष्य में समाज को घाटा पहुंचाता है। इस्लाम की ऐसी ही एक महत्वपूर्ण अवधारणा है-‘‘अल-वला वल-बरा।’’ इस विषय पर इस्लामी विद्वानों के बीच विभिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं, किंतु सामान्य रूप से इसे आस्था, नैतिक निष्ठा और धार्मिक पहचान से जुड़ा सिद्धांत माना जाता है। दुर्भाग्य से आधुनिक समय में इसकी कुछ संकीर्ण और उग्र व्याख्याओं ने इसे विवाद का विषय भी बना दिया है। इसलिए इसकी चर्चा करते समय संतुलन, संदर्भ और इस्लाम की मूल शिक्षाओं को साथ लेकर चलना आवश्यक है।

इस मामले में इस्लामिक विद्वान तुफैल खान कादिरी साहब बताते हैं, ‘‘अरबी भाषा में ‘अल-वला’ का अर्थ है-प्रेम, निष्ठा, सहयोग और नैतिक प्रतिबद्धता; जबकि ‘अल-बरा’ का अर्थ है-अन्याय, बुराई, अत्याचार और नैतिक पतन से स्वयं को अलग रखना। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह सिद्धांत किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति अंध समर्थन अथवा घृणा का नहीं, बल्कि सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय तथा सदाचार और दुराचार के बीच विवेकपूर्ण चुनाव का संदेश देता है। एक मुसलमान की पहली निष्ठा अल्लाह, उसके रसूल और उन मूल्यों के प्रति होती है जिन्हें कुरान न्याय, दया, सत्यनिष्ठा और भलाई के रूप में प्रस्तुत करता है।’’

तुफैल साहब ने व्यक्तिगत बातचीत में बताया, ‘‘कुरान बार-बार यह शिक्षा देता है कि ईमान का अर्थ केवल उपासना तक सीमित नहीं है। वास्तविक ईमान वह है जो मनुष्य के व्यवहार, चरित्र और सामाजिक उत्तरदायित्व में दिखाई दे। इसलिए धार्मिक निष्ठा का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं कि कोई व्यक्ति क्या दावा करता है, बल्कि यह है कि वह अपने परिवार, समाज और जिस देश में रहता है उसके प्रति कितना ईमानदार, न्यायप्रिय और उत्तरदायी है।’’

अब तुफैल साहब की बात से ही यह साबित हो जाता है कि ‘‘अल-वला वल-बरा’’ का वास्तविक अर्थ क्या है। मतलब साफ है कि यदि कोई व्यक्ति इस सिद्धांत को केवल दूसरों से दूरी बनाने या घृणा का आधार बना ले, तो वह इस्लाम की उस व्यापक शिक्षा से दूर चला जाता है जिसमें न्याय, सद्भाव, करुणा और मानव गरिमा को सर्वाेच्च महत्व दिया गया है। कुरान स्पष्ट रूप से न्याय पर अडिग रहने की शिक्षा देता है, चाहे वह अपने ही विरुद्ध क्यों न हो और किसी समुदाय के प्रति द्वेष को भी अन्याय का कारण न बनने देने की चेतावनी देता है। यही इस अवधारणा की नैतिक कसौटी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि अल-वला का अर्थ केवल धार्मिक पहचान तक सीमित न समझा जाए, बल्कि उसे व्यापक संदर्भ में सत्य, ईमानदारी, विश्वसनीयता और लोककल्याण के प्रति निष्ठा के रूप में भी देखा जाए। उसी प्रकार अल-बरा का अर्थ केवल वैचारिक असहमति नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, हिंसा, अन्याय, छल, कट्टरता और समाज को नुकसान पहुँचाने वाली हर प्रवृत्ति से दूरी बनाना भी है। यदि इस सिद्धांत को इसी व्यापक संदर्भ में समझा जाए, तो यह समाज को विभाजित नहीं करता, बल्कि नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाता है।

इस्लाम मुसलमानों को समाज से अलग-थलग रहने की नहीं, बल्कि उसके भीतर सकारात्मक भूमिका निभाने की प्रेरणा देता है। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जीवन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने मदीना में ऐसा सामाजिक अनुबंध स्थापित किया जिसमें विभिन्न धर्मों और कबीलों के लोग न्याय और पारस्परिक दायित्वों के आधार पर साथ रहते थे। यह अनुभव बताता है कि धार्मिक निष्ठा और सामाजिक सह-अस्तित्व परस्पर विरोधी नहीं हैं।

इसी संदर्भ में नागरिक जिम्मेदारियाँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती हैं। किसी भी देश में रहने वाला मुसलमान उस समाज का उत्तरदायी नागरिक होता है। कानून का सम्मान करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, ईमानदारी से कर और नागरिक दायित्व निभाना, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, व्यापार और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में योगदान देना, ये सब केवल नागरिक कर्तव्य ही नहीं, बल्कि इस्लामिक दुनिया की नैतिक जिम्मेदारियाँ भी हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने समाज के लिए उपयोगी बनता है, तो वह अपने धर्म की प्रतिष्ठा भी बढ़ाता है।

यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि इस्लाम में राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व और धार्मिक आस्था को अनिवार्य रूप से परस्पर विरोधी नहीं माना गया है। जहाँ कानून न्याय, शांति और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करते हैं, वहाँ उनका सम्मान करना सामाजिक अनुशासन का हिस्सा है। यही कारण है कि अनेक इस्लामी विद्वान बहुलतावादी समाजों में रहने वाले मुसलमानों से अपेक्षा करते हैं कि वे अपने धार्मिक मूल्यों के साथ-साथ अपने नागरिक दायित्वों का भी पूरी निष्ठा से पालन करें।

दुर्भाग्य से आधुनिक समय में कुछ अतिवादी समूहों ने ‘‘अल-वला वल-बरा’’ की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की है जिसमें समाज के प्रति अविश्वास, अलगाव और टकराव को बढ़ावा मिलने लगा है। यह दृष्टिकोण इस्लाम की व्यापक नैतिक शिक्षा से मेल नहीं खाता, साथ ही स्वयं मुस्लिम समाज के लिए भी हानिकारक है। घृणा, हिंसा और सामाजिक विभाजन किसी भी धर्म के स्थायी उद्देश्य नहीं हो सकते। इस्लाम का मूल आग्रह सुधार, न्याय और मानव कल्याण पर आधारित है।

आज जब दुनिया धार्मिक, सामाजिक और वैचारिक तनावों से गुजर रही है, तब मुसलमानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने आचरण से इस्लाम की वास्तविक छवि प्रस्तुत करने की है। शिक्षा, अनुसंधान, चिकित्सा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्यम, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान ही वह माध्यम है जिसके द्वारा इस्लामी नैतिकता का सकारात्मक परिचय दिया जा सकता है। किसी भी विचारधारा की विश्वसनीयता उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके अनुयायियों के चरित्र और कर्म से स्थापित होती है। हालांकि इस दिशा में व्यापक प्रयास चल रहा है। उसके परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं।

अल-वला वल-बरा को यदि उसके व्यापक नैतिक संदर्भ में समझा जाए, तो यह घृणा का नहीं, बल्कि विवेक का सिद्धांत है; टकराव का नहीं, चरित्र निर्माण का मार्ग है। यह मुसलमानों को अपनी आस्था के प्रति निष्ठावान रहने के साथ-साथ न्याय, करुणा, सत्यनिष्ठा और लोककल्याण के प्रति भी प्रतिबद्ध रहने की प्रेरणा देता है। यही वह दृष्टि है जो एक सच्चे मुसलमान को अपने धर्म का भी आदर्श प्रतिनिधि बनाती है और अपने समाज तथा राष्ट्र का भी जिम्मेदार नागरिक।

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