गौतम चौधरी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसे सबसे अधिक क्षति उसके घोषित शत्रुओं से नहीं, बल्कि उसके घोषित रक्षकों से भी पहुँच सकती है। हर सरकार स्वयं को संविधान की संरक्षक, कानून के शासन की समर्थक और राष्ट्रहित की प्रतिनिधि बताती है। किंतु लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब वही सरकार असहमति, आलोचना और विरोध के प्रति अपने आचरण से यह सिद्ध करे कि राज्य किसी दल का नहीं, बल्कि संविधान का है।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर अभद्र भाषा, आपत्तिजनक टिप्पणियों और राजनीतिक व्यंग्य को लेकर दर्ज हो रही प्राथमिकी और पुलिस कार्रवाइयों ने एक बार फिर एक पुराने प्रश्न को जीवित कर दिया है। प्रश्न यह नहीं है कि अभद्र भाषा उचित है या नहीं। सभ्य लोकतांत्रिक विमर्श में शालीनता का स्थान सदैव रहेगा। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या कानून की दृष्टि सभी नागरिकों के लिए समान है?
यदि किसी छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार या विपक्षी समर्थक के विरुद्ध अपमानजनक भाषा के आधार पर कार्रवाई होती है, तो क्या वही कसौटी सत्ता पक्ष के नेताओं, प्रभावशाली व्यक्तियों और उनके समर्थकों पर भी लागू होती है? यदि उत्तर श्हाँश् है, तो लोकतंत्र आश्वस्त हो सकता है। यदि उत्तर श्नहींश् है, तो समस्या केवल एक प्राथमिकी की नहीं, बल्कि कानून की विश्वसनीयता की है।
लोकतंत्र में पुलिस केवल अपराध की जाँच करने वाली संस्था नहीं होती; वह राज्य की निष्पक्षता का सबसे दृश्यमान चेहरा भी होती है। नागरिक अदालत का निर्णय वर्षों बाद देखता है, लेकिन पुलिस का व्यवहार उसी दिन देख लेता है। इसलिए पुलिस की निष्पक्षता पर उठने वाला संदेह अंततः पूरे शासन-तंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
इतिहास बार-बार यह सिखाता है कि राज्य द्वारा निर्मित हर असाधारण शक्ति भविष्य की किसी दूसरी सरकार की भी शक्ति बन जाती है। आज जो कानूनी औज़ार सत्ता में बैठे लोगों को सुविधाजनक प्रतीत होते हैं, वही कल किसी अन्य राजनीतिक दल के हाथ में होंगे। इसलिए लोकतांत्रिक समाजों में बुद्धिमत्ता का अर्थ केवल वर्तमान का लाभ नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का भी विवेकपूर्ण आकलन है।
भारत स्वयं इसका साक्षी रहा है। आपातकाल का अनुभव केवल एक राजनीतिक प्रसंग नहीं, बल्कि संस्थागत स्मृति है। उस दौर में जिन शक्तियों का प्रयोग हुआ, उनकी आलोचना बाद में व्यापक रूप से हुई। लेकिन उससे भी बड़ा सबक यह था कि लोकतंत्र की संस्थाएँ किसी व्यक्ति या दल की स्थायी संपत्ति नहीं होतीं। सत्ता बदलती है, पर संस्थागत परंपराएँ बनी रहती हैं। इसलिए जो मिसाल एक सरकार स्थापित करती है, उसी का सामना भविष्य में उसे स्वयं भी करना पड़ सकता है।
इसी संदर्भ में एक और परिवर्तन पर ध्यान देना आवश्यक है। आज राज्य की शक्ति केवल प्रशासन, पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। सूचना के प्रवाह, डिजिटल मंचों, एल्गोरिद्मिक दृश्यता और सामाजिक माध्यमों ने सत्ता तथा समाज के संबंधों को नया स्वरूप दिया है। यदि इन साधनों का उपयोग असहमति को नियंत्रित करने या भय का वातावरण बनाने की धारणा उत्पन्न करता है, तो लोकतांत्रिक विश्वास धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।
यहाँ एक और पक्ष भी है, जिस पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। आधुनिक अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योग, प्रौद्योगिकी कंपनियाँ और वैश्विक निवेशक प्रायः राजनीतिक स्थिरता को महत्व देते हैं। यह स्वाभाविक भी है। किंतु यदि स्थिरता के नाम पर संस्थागत संतुलन कमजोर होने लगे, तो दीर्घकाल में वही आर्थिक वातावरण भी अस्थिर हो सकता है। निवेश केवल कर-छूट से नहीं आता; वह न्यायिक विश्वसनीयता, नियमों की पूर्वानुमेयता और संस्थागत निष्पक्षता पर भी निर्भर करता है। इतिहास में अनेक देशों ने यह अनुभव किया है कि जब कानून व्यक्ति-केन्द्रित होने लगता है, तो अंततः बाज़ार भी अनिश्चितता का शिकार होता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य कानून लागू न करे। अभद्रता, हिंसा के लिए उकसाना, धमकी देना या घृणा फैलानाकृइन सबके विरुद्ध कार्रवाई आवश्यक है। लेकिन कार्रवाई का नैतिक और संवैधानिक औचित्य तभी स्वीकार्य होता है जब वह समान मानदंडों पर आधारित हो। यदि कानून केवल विरोधियों के लिए कठोर और समर्थकों के लिए उदार दिखाई देने लगे, तो नागरिकों का विश्वास न्याय से अधिक शक्ति में होने लगता है। लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी विफलता कोई नहीं।
इसीलिए विधि के शासन (Rule of Law) और व्यक्ति के शासन (Rule by Men) में अंतर समझना आवश्यक है। विधि का शासन कहता है कि व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, कानून उसके ऊपर है। व्यक्ति का शासन कहता है कि कानून का व्यवहार व्यक्ति की पहचान देखकर बदल सकता है। लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह इनमें से किस मार्ग को चुनता है।
आज जो लोग सत्ता में हैं, वे कल विपक्ष में हो सकते हैं। जो आज विपक्ष में हैं, वे कल सरकार चला सकते हैं। लेकिन पुलिस, न्यायपालिका, प्रशासन और संविधानकृइनकी स्थिरता ही राष्ट्र की स्थिरता है। इन्हें तात्कालिक राजनीतिक लाभ का साधन बना देना किसी एक दल की नहीं, पूरे लोकतंत्र की पराजय होगी।
लोकतंत्र का वास्तविक सौंदर्य यह नहीं कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है। उसका सौंदर्य इस बात में है कि सत्ता कितनी संयमित है। संविधान सरकार को अधिकार देता है, लेकिन उन्हीं अधिकारों की सीमाएँ भी निर्धारित करता है। वही सीमाएँ नागरिक की स्वतंत्रता की अंतिम सुरक्षा हैं।
राजनीति में विजय और पराजय अस्थायी होती है। चुनाव पाँच वर्ष में बदल जाते हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं। लेकिन यदि संस्थाओं की निष्पक्षता क्षीण हो जाए, तो उसकी भरपाई पीढ़ियों तक नहीं हो पाती।
शायद इसी कारण लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंत्र किसी दल का नारा नहीं, बल्कि एक सरल सिद्धांत है – कानून का भय सबके लिए समान हो और कानून का संरक्षण भी सबको समान रूप से प्राप्त हो। जब तक यह संतुलन बना रहेगा, तब तक लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास से भी जीवित रहेगा।
