देवभूमि हिमालय : कुल्लू घाटी में देवताओं की जीवंत परंपरा

देवभूमि हिमालय : कुल्लू घाटी में देवताओं की जीवंत परंपरा

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कुल्लू का धार्मिक संसार अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। यहां परंपरागत रूप से लगभग हर गांव का अपना देवता है। वह देवता उस गांव के इतिहास, पहचान और सामूहिक स्मृति से गहराई से जुड़ा होता है। इन देवताओं का स्वरूप हमेशा पारंपरिक मानवाकार मूर्ति के रूप में ही हो, यह आवश्यक नहीं। कई स्थानों पर उनकी उपस्थिति पवित्र प्रतीकों, मुखौटों, धार्मिक वस्तुओं और अन्य पारंपरिक चिह्नों के माध्यम से व्यक्त होती है। इसलिए देवता की पवित्रता केवल किसी भौतिक प्रतिमा में नहीं, बल्कि उस विश्वास, अनुष्ठान और परंपरा में निहित होती है जिसके माध्यम से समुदाय उससे अपना संबंध स्थापित करता है।

इस परंपरा का सबसे अद्भुत पक्ष यह है कि स्थानीय विश्वास के अनुसार देवता किसी मनुष्य के माध्यम से भी अपनी उपस्थिति प्रकट कर सकते हैं। महत्वपूर्ण धार्मिक अवसरों और यात्राओं के दौरान एक चुने हुए व्यक्ति में देवता के अवतरित होने या उसके साथ दिव्य संवाद स्थापित होने की मान्यता है। ऐसे व्यक्ति को स्थानीय परंपरा में गुर कहा जाता है। गुर देवता के प्रवक्ता की भूमिका निभाता है। इस अवस्था में वह देवता की इच्छा समुदाय तक पहुंचाता हैकृदेवता कहां जाना चाहते हैं, किससे मिलना चाहते हैं और कौन-से अनुष्ठान या कार्य किए जाने चाहिए।

देवता की यात्रा स्वयं एक अद्भुत धार्मिक दृश्य होती है। देवता का पवित्र मुखौटा और अन्य प्रतीक सुसज्जित पालकी में स्थापित किए जाते हैं। फिर गांव के लोग उसे अपने कंधों पर उठाकर यात्रा करते हैं। स्थानीय विश्वास के अनुसार पालकी की दिशा केवल मनुष्य तय नहीं करते; देवता स्वयं अपनी इच्छा प्रकट करते हैं और पालकी को जिस दिशा में ले जाना है, उसका संकेत देते हैं। इस प्रकार यह यात्रा महज एक धार्मिक जुलूस नहीं रह जाती, बल्कि एक ऐसी दिव्य यात्रा का रूप ले लेती है जिसमें मनुष्य स्वयं को देवता की इच्छा का माध्यम मानते हैं।

देवता और गांव का संबंध किसी एक उत्सव या अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। स्थानीय परंपरा में गुर के माध्यम से देवता द्वारा समुदाय को समय-समय पर मार्गदर्शन देने की भी मान्यता है। यह मार्गदर्शन गांव की सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव, परंपराओं के पालन और सामुदायिक आचरण जैसे विषयों से जुड़ा हो सकता है। इस अर्थ में देवता किसी मंदिर में विराजमान कोई दूरस्थ अलौकिक सत्ता नहीं है। वह गांव के सामाजिक और नैतिक जीवन में सक्रिय उपस्थिति है।

कुल्लू घाटी के प्रत्येक देवता की अपनी कथा, अपनी परंपरा और अपनी ऐतिहासिक स्मृति है। जब मैंने इन परंपराओं के बारे में जानना शुरू किया, तो मुझे पता चला कि अनेक स्थानीय देवताओं के बारे में यह मान्यता है कि उनका मूल किसी दूरस्थ क्षेत्र में था और बाद में वे हिमालय की इन घाटियों में आकर प्रतिष्ठित हुए। इनकी कथाएं केवल धार्मिक अनुष्ठानों में ही सुरक्षित नहीं रहीं, बल्कि लोकगीतों, लोकगाथाओं, कथाओं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती मौखिक परंपराओं में भी जीवित हैं।

ये कथाएं केवल देवताओं की कहानियां नहीं हैं। इनके भीतर किसी समुदाय की अपनी उत्पत्ति, उसके भूगोल, उसके पूर्वजों और उस भूमि के साथ उसके संबंध की स्मृति भी सुरक्षित रहती है। इस दृष्टि से कुल्लू की देव-परंपरा एक जीवंत सांस्कृतिक अभिलेख की तरह दिखाई देती है।

इस धार्मिक विविधता का सबसे प्रभावशाली रूप कुल्लू घाटी में दिखाई देता है, जहां तीन सौ से अधिक ग्राम देवताओं की परंपरा बताई जाती है। इन सभी की अपनी-अपनी पहचान और क्षेत्रीय परंपराएं हैं, लेकिन वर्ष में एक बार कुल्लू दशहरा उन्हें एक विशाल धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन में एक साथ ले आता है।

कुल्लू दशहरा के अवसर पर आसपास के गांवों और घाटियों के देवता अपनी-अपनी पालकियों में यात्रा करते हुए कुल्लू पहुंचते हैं। उनके साथ उनके श्रद्धालु और वाद्ययंत्रों से सुसज्जित पारंपरिक दल होते हैं। विभिन्न दिशाओं से आती ये देव यात्राएं अंततः उस विशाल धार्मिक समागम का हिस्सा बनती हैं, जिसका केंद्र भगवान रघुनाथ जी हैं। ऐसा लगता है मानो पूरी घाटी के देवता अपने-अपने गांवों से निकलकर एक साझा आध्यात्मिक केंद्र की ओर बढ़ रहे हों।

कुल्लू दशहरा की यही विशेषता इसे केवल एक धार्मिक उत्सव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। यहां मिथक और आस्था किसी पुस्तक या मंदिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जीवंत सामाजिक अनुभव में बदल जाते हैं। देवताओं को लोग अपने कंधों पर उठाते हैं, उनके साथ यात्रा करते हैं, उनका स्वागत करते हैं और उनकी उपस्थिति को अपने सामुदायिक जीवन का हिस्सा मानते हैं।

इस परंपरा में भूगोल भी धार्मिक अर्थ ग्रहण कर लेता है। पर्वत, जंगल, नदियां, गांव और प्राचीन मार्ग केवल भौगोलिक इकाइयां नहीं रह जाते; वे एक पवित्र सांस्कृतिक संसार के अंग बन जाते हैं। किसी पहाड़ी रास्ते से गुजरती देवता की पालकी उस रास्ते को केवल आवागमन का मार्ग नहीं रहने देती, बल्कि उसे स्मृति और आस्था से जोड़ देती है।

कुल्लू घाटी की देव-परंपरा यह दिखाती है कि हिमालयी समाजों ने सदियों से अपनी विशिष्ट धार्मिक अभिव्यक्तियों को किस तरह जीवित रखा है। यहां देवत्व एक साथ आध्यात्मिक भी है, सामाजिक भी, भौगोलिक भी और सामुदायिक भी। देवता गांव के हैं, लेकिन गांव भी स्वयं को देवता का मानता है। यह संबंध पूजा से जितना बनता है, उतना ही स्मृति, परंपरा, लोककथा और सामूहिक सहभागिता से भी।

मेरे लिए हिमालय का आकर्षण इसी कारण केवल उसके ऊंचे शिखरों या प्राचीन मंदिरों तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक आध्यात्मिकता मुझे उन घाटियों में दिखाई देती है, जहां आज भी देवताओं की कथाएं सुनाई जाती हैं; उन गांवों में, जहां ढोल-नगाड़ों के साथ देवता की पालकी निकलती है; उन पहाड़ी रास्तों पर, जहां श्रद्धालु अपने देवता को कंधों पर लेकर चलते हैं; और उस विश्वास में, जिसके अनुसार देवता आज भी अपने लोगों के बीच आते-जाते हैं।

इस अर्थ में कुल्लू केवल किसी धार्मिक परंपरा की झलक नहीं देता, बल्कि एक जीवंत पवित्र भू-दृश्य से हमारा परिचय कराता है। दशहरा के अवसर पर सैकड़ों देवताओं का एक स्थान पर एकत्र होना इस बात का अद्भुत स्मरण है कि हिमालयी लोकविश्वास में देवत्व हमेशा दूर, अमूर्त या निष्क्रिय नहीं है। वह उपस्थित है, गतिशील है, सामुदायिक है और भूमि से गहराई से जुड़ा हुआ है।

शायद इसी कारण हिमालय के लिए प्रचलित प्राचीन अभिव्यक्ति ‘देवभूमि’कृदेवताओं की भूमि इतनी सार्थक लगती है। यहां पर्वत केवल वे स्थान नहीं हैं जहां मनुष्य देवताओं की पूजा करता है। यहां ऐसी सांस्कृतिक चेतना भी जीवित है जिसमें स्वयं देवता इन पर्वतों में निवास करते हैं, यात्रा करते हैं, बोलते हैं और अपने लोगों के जीवन में सहभागी होते हैं।

यही जीवंत विश्वास हिमालय को केवल एक भौगोलिक प्रदेश नहीं रहने देता। वह उसे एक ऐसे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संसार में बदल देता है, जहां मनुष्य, प्रकृति और देवत्व के बीच की दूरी बहुत कम हो जाती है।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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