यूपीआई भुगतान पर टैक्स अव्यावहारिक : लागू न करना ही समाधान

यूपीआई भुगतान पर टैक्स अव्यावहारिक : लागू न करना ही समाधान

पिछले दस वर्षों से मुफ्त में यूपीआई से भुगतान करने की आदत हम सबको हो गई थी। चाय वाले से लेकर हवाई जहाज के टिकट तक, एक क्यूआर से देश में लेनदेन आसानी से चल रहा था। और अब अचानक से खबर आई कि दो हजार रुपये से ज्यादा के मोबाइल से भुगतान करने पर टैक्स लगेगा। सरकार का कहना है कि भुगतान जिस व्यापारी को किया गया है उससे टैक्स वसूला जाएगा। प्रचार किया जा रहा है कि टैक्स आम आदमी से नहीं लिया जाएगा बल्कि सामने वाला व्यापारी भरेगा। ये कौन सा तर्क है? सामने वाला व्यापारी क्या इस देश का नहीं है? वह भी तो देश का ही नागरिक है। क्या उसकी जेब काटना देशभक्ति हो गया? और व्यापारी को जो टैक्स देना है, उसका नाम भी कितना छलावा भरा है – एमडीआर। मर्चेंट डिस्काउंट रेट।

अब इसमें डिस्काउंट अर्थात कटौती क्या है? नाम डिस्काउंट है और वसूल रहे हैं टैक्स। वैसे ही जैसे हर बार आदमी की जेब काटने से पहले नए शब्दों को गढ़ा जाता है। जैसे देश भर में आम आदमी के टैक्स से बनने वाली सड़क पर जबरन के टोल नाकों पर भी टोल टैक्स का नाम यूजर फी है, महंगाई का नया नाम विकास है और अब यूपीआई पर वसूलने वाला टैक्स, डिस्काउंट अर्थात कटौती हो गया है। आदेश जारी हो गया है जो आगामी पंद्रह अक्तूबर से प्रभावशील है और दो हजार रूपये तक के भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगेगा मगर दो हजार रुपये से ज्यादा के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत अधिकतम तीन सौ रुपये टैक्स व्यापारी से लिया जायेगा जिसको ग्राहक ने भुगतान किया है।

डिजिटल भुगतान तो देश में आने और छा जाने वाली क्रांति थी तो क्रांति पर टैक्स कब से लगने लगा मित्रों । सरकार और कॉर्पाेरेट जियो कंपनी में अब कोई अंतर नहीं रह गया है। पहले आदत डालो, नशे जैसी, अफीम जैसी और फिर कीमत वसूल करना चालू कर दो। जब जियो क्रांति आई तो कई महीनों तक जियो ने मुफ्त का डाटा और गजब की स्पीड दी और पूरा इंडिया सिर्फ जियो का दीवाना हो गया। बाकी टेलीकॉम कंपनियां लगभग बंद हो गयी तो कुछ ने एकीकरण कर लिया।

फिर जब जियो का एकाधिकार हो गया तो फिर जियो ने रंग दिखाया और डाटा की कीमत वसूलना आरम्भ कर दी। आज सबसे ज्यादा महंगा डाटा जियो का है पर मजबूरी है कि अब और कोई कंपनी टक्कर में नहीं है। घर घर डिलीवरी करने वाली कंपनियों का भी यही मॉडल रहा है। सरकार ने भी यही किया। वर्ष 2020 में खुद ही जीरो शुल्क किया था ताकि लोग डिजिटल अपनाएं। अब जब एक सेकंड में सात हजार से ज्यादा मोबाइल से भुगतान होने लगे और सबको लत सी लग गई तो ले आये टैक्स।

मीडिया की भी जितनी तारीफ की जाये, कम है। प्रचार कर रहा है कि सिर्फ चार-पांच प्रतिशत को ही टैक्स लगेगा, बाकी छियानवे प्रतिशत मुक्त रहेंगे। अरे ये बाकी छियानवे ही तो इन चार को भुगतान करेंगे तो टैक्स तो खूब मिलेगा न। और जब छियानवे प्रतिशत से नहीं ले रहे तो इन चार को भी छोड़ दीजिये न। काहे देश भर में हल्ला मचवा रहे। भारत में कौन सा व्यापारी अपनी जेब से टैक्स देने का आदी है? आज भी कार्ड से भुगतान करो तो अधिकतर व्यापारी दो प्रतिशत अतिरिक्त जबरन ले लेते हैं या फिर नगद ही लेते हैं। सरकार कागज पर लिख देगी कि व्यापारी ग्राहक पर बोझ नहीं डालेगा, पर जमीन पर कौन रोकेगा? फिर वही काला धन, वही कैश का खेल शुरू।

फिर देश के सभी बैंक तो भारी मुनाफे में हैं। स्टेट बैंक ने पिछले साल साठ हजार करोड़ का मुनाफा दिखाया। ये और टैक्स किस बात का ले रहे हैं? साइबर सिक्योरिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर। तो क्या अब तक यूपीआई असुरक्षित चल रहा था? अगर असुरक्षित था तो इतना प्रचार क्यों किया? और अगर सुरक्षित था तो अब नया खर्चा कौन सा आ गया?

ये सही है कि पहले की सरकारें मनीआर्डर, ड्राफ्ट या और वित्तीय सेवाओं पर अतिरिक्त राशि लेती रहीं हैं और इसीलिए तो देश ने उनसे मुक्ति पाई और आपको सिंहासन दिया। अगर सरकार डिजिटल को बढ़ावा देना चाहती है तो उस पर इनाम दे, सजा नहीं। आज यूपीआई दुनिया के लिए एक मॉडल है. उसी मॉडल को क्यों ध्वस्त किया जा रहा है द्य यूपीआई से भुगतान पर टैक्स का विरोध देश भर में आरम्भ हो गया है और व्यापारी यूपीआई से भुगतान लेना विरोध स्वरूप बंद कर रहे हैं तो पेट्रोल पम्प वाले दो हजार से ज्यादा का पेट्रोल या डीजल यूपीआई से नहीं लेने का ऐलान कर रहे हैं द्य इस अव्यावहारिक शुल्क या टैक्स को वापस लेना ही जनहित में समाधान होगा।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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