सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता का पैमाना अब नामांकन नहीं, सीखने के परिणाम हों

सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता का पैमाना अब नामांकन नहीं, सीखने के परिणाम हों

भारत में स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में पिछले दो दशकों में बड़ा बदलाव आया है। कभी चुनौती बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की थी, लेकिन अब तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है। आज देश के सामने बड़ा सवाल यह है कि जो बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं, वे वास्तव में कितना सीख पा रहे हैं। किसी स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ जाना, भवन बन जाना, स्मार्ट क्लास लग जाना या किताबें और यूनिफॉर्म उपलब्ध करा देना शिक्षा की गुणवत्ता का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। शिक्षा की असली कसौटी यह है कि बच्चा अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़, लिख और गणित कर पा रहा है या नहीं।

भारत में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्कूल देश की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार हैं। यूडाइस प्लस 2024-25 के अनुसार देश में लगभग 14.71 लाख स्कूल हैं, जिनमें करीब 10.13 लाख सरकारी स्कूल हैं। यानी कुल स्कूलों का लगभग 69 प्रतिशत सरकारी क्षेत्र में है। इसी वर्ष देश के 24.69 करोड़ विद्यार्थियों में करीब 12.16 करोड़ विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे थे। सरकारी स्कूलों में लगभग 51.5 लाख शिक्षक कार्यरत थे।

ये आंकड़े बताते हैं कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता केवल शिक्षा विभाग का विषय नहीं है, बल्कि देश के मानव संसाधन और भविष्य की अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ा प्रश्न है। हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (एएसईआर) 2024 के आंकड़े बताते हैं कि सरकारी स्कूलों के बच्चों के बुनियादी पढ़ने और गणित के स्तर में 2022 के मुकाबले उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

ग्रामीण भारत में कक्षा तीसरी के सरकारी स्कूलों के बच्चों में कक्षा दूसरी के स्तर का पाठ पढ़ पाने वाले बच्चों का अनुपात 2022 में 16.3 प्रतिशत था, जो 2024 में बढ़कर 23.4 प्रतिशत हो गया। इसी तरह कक्षा पांचवीं में यह अनुपात 38.5 प्रतिशत से बढ़कर 44.8 प्रतिशत हुआ।

गणित में भी सुधार दिखाई देता है। कक्षा तीसरी के सरकारी स्कूलों के बच्चों में कम से कम दो अंकों की घटाव की समस्या हल कर पाने वालों का अनुपात 2022 में 20.2 प्रतिशत था, जो 2024 में बढ़कर 27.6 प्रतिशत हो गया। कक्षा पांचवीं में तीन अंकों को एक अंक से भाग देने की क्षमता रखने वाले बच्चों के प्रदर्शन में भी सुधार हुआ है। एएसईआर के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर बुनियादी अंकगणित का प्रदर्शन एक दशक से अधिक समय में अपने ऊंचे स्तरों में पहुंचा है।

इन आंकड़ों को सकारात्मक बदलाव का संकेत माना जा सकता है, लेकिन इनके भीतर एक गंभीर संदेश भी छिपा है। यदि कक्षा पांचवीं के सरकारी स्कूल के लगभग 55 प्रतिशत बच्चे कक्षा दूसरी के स्तर का पाठ सहजता से नहीं पढ़ पा रहे हैं तो केवल स्कूल में उनका नामांकन होना पर्याप्त उपलब्धि नहीं माना जा सकता। यह अंतर बताता है कि अब शिक्षा व्यवस्था को ‘स्कूल पहुंचाने’ से आगे बढ़कर ‘सीखने की क्षमता’ पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

इसी सोच के कारण नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखा गया है। निपुण भारत मिशन का उद्देश्य शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को पढ़ने-समझने और गणित की बुनियादी क्षमताएं हासिल कराना है। सरकार ने कक्षा तीन तक प्रत्येक बच्चे को इन बुनियादी क्षमताओं से लैस करने का लक्ष्य रखा है।

इस दृष्टिकोण में शिक्षा की सफलता को देखने का नजरिया बदलता है। पहले स्कूलों की संख्या, नामांकन, परीक्षा परिणाम और बुनियादी सुविधाओं को सफलता के प्रमुख पैमाने माना जाता था। अब सवाल होना चाहिए कि बच्चा वास्तव में क्या कर सकता है। क्या वह अपनी किताब को समझकर पढ़ सकता है? क्या वह किसी समस्या को अपने शब्दों में समझा सकता है? क्या वह सामान्य गणितीय गणना कर सकता है? क्या वह रटने के बजाय अवधारणा को समझता है? क्या वह सीखी हुई बात को रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल कर सकता है? यही सीखने के परिणाम की वास्तविक अवधारणा है।

इस दिशा में परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024 भी महत्वपूर्ण है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार दिसंबर 2024 में हुए इस राष्ट्रीय सर्वेक्षण में 87,619 स्कूलों और लगभग 22.94 लाख विद्यार्थियों को शामिल किया गया। कक्षा तीसरी के स्तर पर भाषा में राष्ट्रीय स्तर पर सही उत्तर देने का प्रदर्शन 2021 के 62 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 64 प्रतिशत और गणित में 57 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हुआ। इससे संकेत मिलता है कि सुधार हो रहा है, लेकिन उसकी गति और गुणवत्ता दोनों पर लगातार नजर रखना आवश्यक है।

सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने की पहली शर्त है कि शिक्षक को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला कर्मचारी न माना जाए, बल्कि उसे सीखने की प्रक्रिया का केंद्र बनाया जाए। शिक्षक के सामने अत्यधिक गैर-शैक्षणिक कार्य, प्रशासनिक जिम्मेदारियां और कागजी औपचारिकताएं होंगी तो कक्षा में प्रत्येक बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान देना कठिन होगा। इसलिए शिक्षक प्रशिक्षण के साथ ऐसा वातावरण भी जरूरी है, जिसमें शिक्षक प्रयोग कर सके और बच्चों की अलग-अलग सीखने की गति के अनुरूप पढ़ा सके।

हर बच्चा एक ही गति से नहीं सीखता। इसलिए कक्षा में केवल औसत विद्यार्थी को ध्यान में रखकर पढ़ाने की व्यवस्था कमजोर बच्चों को पीछे छोड़ सकती है। यहीं ‘रीमेडियल टीचिंग’ यानी सीखने में पीछे रह गए बच्चों के लिए अतिरिक्त और लक्षित शिक्षण महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि कक्षा पांच में पहुंच चुका बच्चा कक्षा दूसरी के स्तर का पाठ पढ़ने में कठिनाई महसूस करता है तो केवल कक्षा पांच का पाठ पढ़ाते रहना समाधान नहीं है। पहले उसके वास्तविक सीखने के स्तर की पहचान करनी होगी और फिर उसी स्तर से उसे आगे बढ़ाना होगा।

मूल्यांकन की पद्धति में बदलाव भी जरूरी है। परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना और वास्तविक ज्ञान होना हमेशा एक ही बात नहीं है। बच्चों को उत्तर याद कराने के बजाय ऐसी परीक्षा प्रणाली विकसित करनी होगी, जो उनकी समझ, तर्क, समस्या समाधान और भाषा क्षमता को माप सके। लगातार मूल्यांकन का उद्देश्य बच्चों को डराना नहीं, बल्कि यह पता लगाना होना चाहिए कि किस बच्चे को किस विषय में मदद की जरूरत है।

अभिभावकों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी केवल सरकार और शिक्षक की नहीं हो सकती। माता-पिता यदि रोज कुछ समय बच्चों से पढ़ने, लिखने और गणित के सामान्य सवालों पर बातचीत करें तो इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके लिए अभिभावकों का उच्च शिक्षित होना भी जरूरी नहीं है। बच्चे से अखबार की कोई छोटी खबर पढ़वाना, बाजार के सामान का हिसाब करवाना या किसी कहानी को अपने शब्दों में सुनाने के लिए कहना भी सीखने का हिस्सा हो सकता है।

डिजिटल तकनीक इस प्रक्रिया को गति दे सकती है, लेकिन उसे शिक्षक का विकल्प मानना उचित नहीं होगा। ‘दीक्षा’ जैसे डिजिटल मंचों पर बड़ी मात्रा में शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध है और अनेक भारतीय भाषाओं में संसाधन तैयार किए गए हैं। हालांकि डिजिटल सामग्री तभी प्रभावी होगी, जब बच्चे के पास उपकरण, इंटरनेट और उसके सही उपयोग में मदद करने वाला शिक्षक या अभिभावक भी हो।

सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने के लिए बुनियादी सुविधाओं की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साफ-सुथरे और सुरक्षित भवन, बिजली, पेयजल, शौचालय, पुस्तकालय, प्रयोगशाला और खेल की सुविधाएं बच्चों के लिए आवश्यक हैं। मगर इन सुविधाओं को शिक्षा की अंतिम उपलब्धि मान लेना भी गलत होगा। किसी स्कूल में शानदार भवन हो सकता है, लेकिन यदि बच्चे पढ़ नहीं पा रहे हैं तो गुणवत्ता का सवाल फिर भी बना रहेगा।

इसलिए भविष्य में सरकारी स्कूलों की निगरानी का मॉडल बदलने की जरूरत है। स्कूल में कितने कमरे हैं, कितने बच्चों का नामांकन है और कितने कार्यक्रम आयोजित हुए, इसके साथ यह भी नियमित रूप से देखा जाना चाहिए कि कक्षा तीन का बच्चा क्या पढ़ सकता है, कक्षा पांच का बच्चा कौन-सा गणित कर सकता है और कक्षा आठ का विद्यार्थी किसी पाठ को समझकर अपनी बात लिख सकता है या नहीं।

यहां एक और सावधानी जरूरी है। सीखने के परिणामों की तुलना करते समय सरकारी और निजी स्कूलों को केवल एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा करना समस्या का पूरा समाधान नहीं है। दोनों में पढ़ने वाले बच्चों की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि अलग हो सकती है। इसलिए लक्ष्य किसी एक स्कूल प्रणाली को श्रेष्ठ घोषित करना नहीं, बल्कि हर बच्चे के सीखने के स्तर को ऊपर उठाना होना चाहिए।

भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती शायद स्कूलों तक पहुंच नहीं, बल्कि स्कूल में मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता है। नामांकन के क्षेत्र में देश ने बड़ी प्रगति की है। अब अगला चरण सीखने के अधिकार को वास्तविक अर्थ देना है।

एक बच्चा स्कूल में पांच साल बिताने के बाद यदि सरल पाठ पढ़ने में कठिनाई महसूस करता है या सामान्य गणितीय समस्या हल नहीं कर पाता तो हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि वह क्यों नहीं सीख पाया। हमें यह भी पूछना चाहिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने उसे सीखने के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं दिए।

सरकारी स्कूल भारत के करोड़ों परिवारों के बच्चों के सपनों का आधार हैं। इसलिए इन स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार का अर्थ केवल शिक्षा विभाग का प्रदर्शन सुधारना नहीं, बल्कि देश के भविष्य की गुणवत्ता सुधारना है। अब समय आ गया है कि स्कूलों की सफलता का पैमाना केवल यह न हो कि कितने बच्चे स्कूल पहुंचे, बल्कि यह हो कि स्कूल में रहते हुए कितने बच्चे वास्तव में सीख पाए।

“नामांकन शिक्षा की शुरुआत है, मंजिल नहीं। असली मंजिल है—हर बच्चे का सीखना।“

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