गौतम चौधरी
31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में जो कुछ हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय है। अगले कुछ दिनों तक राजधानी में सिख समुदाय के विरुद्ध जिस तरह हिंसा, लूटपाट और हत्याओं का सिलसिला चला, उसने भारतीय राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियों, राजनीतिक दलों की भूमिका और सामाजिक संगठनों की नैतिक प्रतिबद्धताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए। यह केवल सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी, बल्कि शासन-व्यवस्था की विफलता और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों से जुड़ी ऐसी त्रासदी थी, जिसके घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे हैं।
इस घटना की चर्चा प्रायः कांग्रेस की भूमिका तक सीमित रहती है। इसमें संदेह नहीं कि तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका जांच में सामने आई। न्यायमूर्ति जीटी नानावती आयोग ने 2005 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में कहा था कि उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि कुछ स्थानीय कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सिखों पर हमले के लिए भीड़ को उकसाया अथवा उनकी सहायता की। आयोग ने हिंसा के संगठित स्वरूप और पुलिस-प्रशासन की गंभीर विफलताओं की ओर भी संकेत किया। दिल्ली में आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2,733 सिखों की हत्या हुई थी।
हालांकि आयोग ने राजीव गांधी अथवा कांग्रेस के किसी अन्य शीर्ष राष्ट्रीय नेता द्वारा नरसंहार आयोजित कराने का प्रमाण नहीं पाया। इस अंतर को समझना आवश्यक है। स्थानीय नेताओं की भूमिका के प्रमाण और शीर्ष नेतृत्व की प्रत्यक्ष संलिप्तता के प्रमाण दो अलग-अलग प्रश्न हैं। इसके बावजूद तत्कालीन सरकार और प्रशासन की जवाबदेही से इनकार नहीं किया जा सकता। पुलिस की निष्क्रियता, प्रशासनिक विफलता और हिंसा पर समय रहते नियंत्रण नहीं कर पाने की घटनाओं ने इस त्रासदी को और भयावह बनाया।
1984 की त्रासदी का एक कम चर्चित पहलू राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कांग्रेस के बीच उस समय विकसित हुई राजनीतिक निकटता है। सामान्य राजनीतिक विमर्श में संघ और कांग्रेस को परस्पर विरोधी विचारधाराओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके बावजूद 1984 का घटनाक्रम बताता है कि राजनीतिक परिस्थितियों में दोनों के बीच संवाद और सहयोग के रास्ते खुले हुए थे।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। दिसंबर 1984 में लोकसभा चुनाव हुए। उस समय भाजपा की स्थापना हो चुकी थी और वह अपने राजनीतिक विस्तार की शुरुआती अवस्था में थी। इसके बावजूद संघ नेतृत्व का एक हिस्सा राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के प्रति सकारात्मक रुख अपनाए हुए था। राजीव गांधी और संघ नेतृत्व के बीच संपर्क तथा मुलाकातों का उल्लेख विभिन्न पत्रकारिता संबंधी रिपोर्टों में मिलता है। इन संपर्कों में बालासाहेब देवरस के छोटे भाई भाऊराव देवरस की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। कुछ रिपोर्टों में 1984 के चुनाव में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा कांग्रेस को समर्थन दिए जाने का भी उल्लेख है।
इस राजनीतिक निकटता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण संघ के वरिष्ठ विचारक नानाजी देशमुख का लेख है। 25 नवंबर 1984 को जॉर्ज फर्नांडिस द्वारा संपादित साप्ताहिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ में प्रकाशित उनके लेख ‘Moments of Soul Searching’ में इंदिरा गांधी की प्रशंसा की गई थी। नानाजी देशमुख ने राजीव गांधी को सहयोग और समर्थन देने की अपील भी की थी। इंदिरा गांधी को महान शहीद बताते हुए उन्होंने उनके नेतृत्व की प्रशंसा की थी।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। जिस समय दिल्ली में सिख समुदाय के विरुद्ध हिंसा हुई, उसके कुछ ही सप्ताह बाद संघ के वरिष्ठ विचारक कांग्रेस और राजीव गांधी के प्रति सहयोग का सार्वजनिक संदेश क्यों दे रहे थे? क्या यह राष्ट्रीय स्थिरता के समर्थन में लिया गया राजनीतिक निर्णय था अथवा तत्कालीन परिस्थितियों में संघ की व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था? इन प्रश्नों का उत्तर उपलब्ध दस्तावेजों और घटनाक्रम के निष्पक्ष विश्लेषण से ही खोजा जाना चाहिए।
इस संदर्भ में संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक नरेंद्र कुमार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मौखिक साक्ष्य भी उल्लेखनीय है। वर्ष 2005 में उनके पैतृक गांव एकसार, जिला सारण (बिहार) में उनसे हुई व्यक्तिगत बातचीत के दौरान 1984 के राजनीतिक घटनाक्रम पर चर्चा हुई थी। इसी क्रम में उन्होंने बताया था कि तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने संघ के सभी प्रांतीय कार्यालयों को साइक्लोस्टाइल के माध्यम से एक संदेश भेजा था। उनके अनुसार, उस संदेश में तत्कालीन परिस्थितियों में कांग्रेस को ही राजनीतिक विकल्प बताया गया था।
नरेंद्र कुमार बाद में उत्तर बिहार के प्रांत प्रचारक नियुक्त हुए। इसके पश्चात उन्होंने अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद में संगठन महामंत्री का दायित्व संभाला और इतिहास संकलन योजना में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। संघ के संगठनात्मक जीवन से उनके लंबे जुड़ाव को देखते हुए उनके इस कथन को मौखिक ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में महत्व दिया जाना चाहिए।
हालांकि इस कथित परिपत्र की मूल प्रति अथवा स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे प्रमाणित दस्तावेज के बजाय एक वरिष्ठ प्रचारक से प्राप्त व्यक्तिगत मौखिक साक्ष्य के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित होगा। फिर भी यह जानकारी 1984 में संघ की राजनीतिक रणनीति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण शोध-सूत्र उपलब्ध कराती है। यदि कभी इस परिपत्र की मूल प्रति सामने आती है तो वह उस समय के संघ-कांग्रेस संबंधों के इतिहास में महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित हो सकती है।
यहां एक सावधानी भी आवश्यक है। संघ द्वारा दिसंबर 1984 के चुनाव में कांग्रेस को समर्थन देने का अर्थ यह नहीं है कि संघ सिख-विरोधी हिंसा में सहभागी था। दोनों घटनाओं के बीच सीधा संबंध स्थापित करने वाला प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसी तरह केवल राजनीतिक समर्थन के आधार पर संघ को नरसंहार का आयोजक बताना भी ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
फिर भी संघ की भूमिका का एक दूसरा पक्ष है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। क्या उस समय संघ ने सिख समुदाय के साथ खड़े होने और हिंसा के विरुद्ध व्यापक सामाजिक प्रतिरोध खड़ा करने की वैसी पहल की थी, जैसी एक बड़े सामाजिक संगठन से अपेक्षित थी? क्या संघ के तत्कालीन वैचारिक विमर्श में सिख समुदाय की पीड़ा और उसके विरुद्ध हुई हिंसा को पर्याप्त संवेदनशीलता के साथ समझा गया था?
नानाजी देशमुख का नवंबर 1984 का लेख इस संदर्भ में विशेष अध्ययन की मांग करता है। उसमें इंदिरा गांधी के नेतृत्व की प्रशंसा और राजीव गांधी को सहयोग देने की अपील तो दिखाई देती है, लेकिन सिख समुदाय पर हुए हमलों के प्रति वैसी स्पष्ट नैतिक प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती जिसकी अपेक्षा एक बड़े सामाजिक संगठन के वरिष्ठ विचारक से की जा सकती है। यह आलोचना किसी संगठन की कानूनी जिम्मेदारी निर्धारित करने का विकल्प नहीं है, बल्कि उसके सार्वजनिक नैतिक व्यवहार का मूल्यांकन है।
1984 में कांग्रेस के साथ संघ की राजनीतिक निकटता यह भी बताती है कि भारतीय राजनीति में विचारधारात्मक विरोध हमेशा स्थायी राजनीतिक दूरी में नहीं बदलता। सत्ता, राष्ट्रीय स्थिरता, सामाजिक समीकरण और चुनावी परिस्थितियां कई बार वैचारिक सीमाओं को पीछे छोड़ देती हैं। संघ और कांग्रेस के बीच उस समय बने समीकरण इसी राजनीतिक व्यवहार का एक उदाहरण हैं।
1984 के सिख नरसंहार का मूल्यांकन करते समय कांग्रेस की राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही सबसे पहले सामने आती है। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और दिल्ली का प्रशासन भी केंद्र के अधीन था। नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी थी। स्थानीय कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका पर जांच आयोग के निष्कर्ष इस जवाबदेही को और गंभीर बनाते हैं।
दूसरी ओर, संघ जैसे व्यापक सामाजिक संगठन की भूमिका का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने किस चुनाव में किस दल का समर्थन किया। यह भी देखा जाना चाहिए कि संकट की घड़ी में उसने पीड़ित समुदाय की सुरक्षा, न्याय और सामाजिक विश्वास की बहाली के लिए क्या किया। किसी संगठन की नैतिक विश्वसनीयता केवल उसके वैचारिक दावों से नहीं, बल्कि संकट के समय उसके व्यवहार से भी निर्धारित होती है।
1984 का इतिहास भारतीय राजनीति के दोहरे मानदंडों पर विचार करने का अवसर देता है। जब राजनीतिक सुविधा हो तो वैचारिक विरोधियों के साथ भी सहयोग संभव है, लेकिन जब किसी समुदाय के अधिकारों और सुरक्षा का प्रश्न आता है तो वही राजनीतिक संगठन कितनी स्पष्टता और दृढ़ता दिखाते हैं?
इस त्रासदी को किसी दल या संगठन के पक्ष में राजनीतिक तर्क जुटाने का साधन बनाने के बजाय सत्ता, संगठन और प्रशासन की जवाबदेही की कसौटी पर परखना चाहिए। कांग्रेस की भूमिका की आलोचनात्मक पड़ताल जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी संघ सहित दूसरे सामाजिक संगठनों के तत्कालीन आचरण का निष्पक्ष मूल्यांकन भी है।
1984 के सिख नरसंहार का न्यायपूर्ण इतिहास तभी लिखा जा सकेगा, जब राजनीतिक सुविधा के लिए तथ्यों को छांटा नहीं जाएगा और किसी भी संगठन को उसके वास्तविक आचरण से परे नैतिक छूट नहीं दी जाएगी। लोकतंत्र में विचारधारा से अधिक महत्वपूर्ण नागरिकों का जीवन, उनकी गरिमा और उनकी सुरक्षा है। इतिहास की यही सबसे बड़ी सीख है।
