वसुधा पर विकास का योग-वितान : स्वास्थ्य, सौहार्द और समष्टि का शाश्वत सूत्र

दुर्गेश्वर राय अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आज केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना का ऐसा उत्सव बन चुका है जो स्वास्थ्य, संतुलन और मानवीय

आरोप, आशंका और यथार्थ : क्या भारत सचमुच ‘नरसंहार के आठवें चरण’ में है?

गौतम चौधरी अमेरिकी सांसद Ilhan Omar का हालिया बयान भारत में एक नई बहस को जन्म दे गया है। उनका दावा है कि विभिन्न रिपोर्टों

न्यूनतम मजदूरी : मेहनतकशों की आवाज़ और सत्ता का भय

गौतम चौधरी भारतीय राजनीति में एक विचित्र विडम्बना लगातार गहराती जा रही है। एक ओर चुनावी मंचों पर “विश्वगुरु”, “पाँच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था” और “विकसित भारत”

उग्रवाद की चुनौती एवं समाधान का एक मात्र रास्ता है शांतिपूर्ण व लचीले समाज का निर्माण

गौतम चौधरी तेजी से बदलती दुनिया में उग्रवाद केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक स्थिरता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय एकता

समावेशी शासन की प्राथमिकता को हमें समझना होगा

शशांक मणि त्रिपाठी लोकतांत्रिक शासकीय प्रणाली में “अधिकतम सहभागिता“ के सिद्धांत की सरकार होती है। इस शासकीय व्यवस्था में, “सबका साथ, सबका विकास एवं सबका

सारिपुत्र से नालंदा तक : भारत की वह ज्ञान-परंपरा जिसे हमें याद रखना होगा

गौतम चौधरी बिहार के नालंदा के खंडहरों में घूमते हुए अधिकांश लोग ईंट-पत्थरों, स्तूपों और टूटी हुई दीवारों को देखते हैं। कुछ लोग वहाँ प्राचीन

भारतीय सिनेमा में ‘वैनिटी वैन कल्‍चर’

सुभाष शिरढोनकर 1980 के दशक के उत्तरार्ध में भारतीय सिनेमा में वैनिटी वैन कल्‍चर का आगमन मनोरंजन उद्योग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित

सूचना आयुक्त की नियुक्ति : लोकतंत्र की पारदर्शिता का प्रहरी या राजनीतिक उपकार का माध्यम?

अशोक कुमार झा लोकतंत्र केवल चुनावों से संचालित होने वाली व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की भागीदारी, शासन की पारदर्शिता, प्रशासन की

तो मानव संसाधन विकास के नए मॉडल की ओर बढ़ रहा है झारखंड?

गौतम चौधरी झारखंड की राजनीति पर चर्चा होती है तो आमतौर पर खनिज संपदा, आदिवासी प्रश्न, कानून-व्यवस्था या राजनीतिक उठापटक जैसे विषय केंद्र में रहते

संस्कृति और संस्कार : समाज या व्यक्ति का स्वरूप ही नहीं संसाधन व पूंजी भी है

गौतम चौधरी हमारे समय की एक बड़ी विडंबना यह है कि संस्कृति पर चर्चा तो बहुत होती है लेकिन संस्कृति को समझने का प्रयास कम

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