तो मानव संसाधन विकास के नए मॉडल की ओर बढ़ रहा है झारखंड?

तो मानव संसाधन विकास के नए मॉडल की ओर बढ़ रहा है झारखंड?

झारखंड की राजनीति पर चर्चा होती है तो आमतौर पर खनिज संपदा, आदिवासी प्रश्न, कानून-व्यवस्था या राजनीतिक उठापटक जैसे विषय केंद्र में रहते हैं। लेकिन हाल के महीनों में राज्य सरकार की कुछ ऐसी पहलें सामने आई हैं जो तत्काल राजनीतिक सुर्खियाँ भले न बनें, परंतु दीर्घकाल में झारखंड के सामाजिक और आर्थिक विकास की दिशा तय कर सकती हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं-शिक्षा और स्वास्थ्य।

विकास का सबसे स्थायी आधार सड़क, पुल और भवन नहीं, बल्कि मनुष्य होता है। जिस राज्य की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होती है, उसकी आर्थिक प्रगति भी अपेक्षाकृत स्थायी होती है। इसी दृष्टि से झारखंड में हो रही कुछ पहलों को समझना आवश्यक है।

हाल ही में झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (JEPC) ने एक एजुकेशन पॉलिसी लैब स्थापित करने के लिए समझौता किया है। इसका उद्देश्य शिक्षा क्षेत्र में शोध, डेटा विश्लेषण और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देना है। यह केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि शिक्षा को अनुभव और आंकड़ों के आधार पर सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। नीति प्रयोगशाला पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति, मूल्यांकन, शिक्षक प्रशिक्षण और विद्यार्थियों के कल्याण जैसे विषयों पर कार्य करेगी। विशेष रूप से आदिवासी, ग्रामीण और वंचित समुदायों के बच्चों की शिक्षा संबंधी चुनौतियों पर भी ध्यान दिया जाएगा।

शिक्षा के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण पहल मुख्यमंत्री स्कूल ऑफ एक्सीलेंस योजना का विस्तार है। सरकार ने गुणवत्ता-युक्त विद्यालयी शिक्षा को पंचायत स्तर तक पहुँचाने के उद्देश्य से इन विद्यालयों की संख्या बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इसके पीछे विचार यह है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल शहरों तक सीमित न रहे, बल्कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को भी बेहतर अवसर मिलें।

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी राज्य सरकार की प्राथमिकताएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। झारखंड में चार सदर अस्पतालोंकृखूंटी, जामताड़ा, गिरिडीह और धनबादकृको मेडिकल कॉलेजों में विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। यदि यह योजना सफल होती है, तो राज्य में मेडिकल कॉलेजों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ेगी और स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ चिकित्सा शिक्षा को भी मजबूती मिलेगी।

इसी क्रम में राज्य सरकार ने मेडिकल शिक्षा के विस्तार के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (छडब्) से अतिरिक्त सीटों की स्वीकृति भी मांगी है। इसका उद्देश्य डॉक्टरों की कमी को दूर करना और स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित चिकित्सा मानव संसाधन तैयार करना है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में बजटीय प्राथमिकता भी दिखाई देती है। हाल के वित्तीय प्रावधानों में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के लिए अतिरिक्त संसाधनों का प्रावधान किया गया है। यह संकेत है कि सरकार स्वास्थ्य अवसंरचना को केवल भवन निर्माण तक सीमित न रखकर संस्थागत क्षमता निर्माण की दिशा में भी सोच रही है।

इन पहलों को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखने के बजाय एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। झारखंड लंबे समय तक प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विकास मॉडल के लिए जाना जाता रहा है। कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिज राज्य की पहचान रहे हैं। लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था में केवल प्राकृतिक संसाधन पर्याप्त नहीं होते। आज प्रतिस्पर्धा उन समाजों के बीच है जिनके पास प्रशिक्षित, स्वस्थ और शिक्षित मानव संसाधन हैं।

यही कारण है कि दुनिया भर में शिक्षा और स्वास्थ्य को खर्च नहीं, बल्कि निवेश माना जाता है। यदि कोई राज्य अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और युवाओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करा पाता है, तो उसका लाभ आने वाले दशकों तक मिलता है। उत्पादकता बढ़ती है, रोजगार क्षमता बढ़ती है और सामाजिक असमानताएँ कम होती हैं।

बेशक, केवल योजनाओं की घोषणा से परिवर्तन नहीं आता। झारखंड के सामने अभी भी शिक्षक रिक्तियों, विद्यालयी गुणवत्ता, डॉक्टरों की कमी, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं और संस्थागत क्षमता जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं। किसी भी योजना की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि विकास की दिशा क्या है।

यदि हाल की पहलों को संकेत माना जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि झारखंड धीरे-धीरे खनिज-आधारित विकास की पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर मानव संसाधन विकास को अपनी रणनीति के केंद्र में लाने का प्रयास कर रहा है। यह प्रक्रिया लंबी है, परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देंगे, लेकिन यदि निरंतरता बनी रही तो आने वाले वर्षों में यही निवेश राज्य की सबसे बड़ी पूंजी सिद्ध हो सकता है।

किसी भी समाज की वास्तविक समृद्धि उसकी खदानों में नहीं, उसके विद्यालयों और अस्पतालों में छिपी होती है। झारखंड की वर्तमान पहलों को इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

नोट : यह आलेख विभिन्न समाचार माध्यमों के इंटरनेट संस्करणों में प्रकाशित खबरों के आधार पर तैयार किया गया है।

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