सुशोभित
हाँ, मेरे विचार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए। परंतु इसके पीछे कारण राजनीतिक नहीं, नैतिक होने चाहिए। यह निर्णय किसी समुदाय को नीचा दिखाने, किसी के पाखंड को उजागर करने या नैरेटिव की लड़ाई जीतने के लिए नहीं, बल्कि जीव-दया, पर्यावरण-संरक्षण और मानवीय संवेदना के आधार पर लिया जाना चाहिए।
नेपाल में गाय राष्ट्रीय पशु है। भारत में भी एक समय कांग्रेस का चुनाव-चिह्न ‘गाय-बछड़ा’ हुआ करता था, जो इस बात का संकेत है कि गाय लंबे समय तक भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि प्रतीक रही है। किंतु आज जब गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग विभिन्न पक्षों से उठ रही है, तब यह प्रश्न भी उठता है कि इस माँग के पीछे प्रेरणा क्या हैकृनैतिकता, राजनीति, या दोनों का मिश्रण?
महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज्य में गोरक्षा के प्रश्न पर गंभीर विचार व्यक्त किए थे। वे स्वयं गाय को श्रद्धा का विषय मानते थे और मुसलमानों से आग्रह करते थे कि वे हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करें। गांधी का विश्वास था कि संवाद, विनम्रता और पारस्परिक सम्मान के माध्यम से सामाजिक सौहार्द स्थापित किया जा सकता है। उनके लिए गोरक्षा केवल धार्मिक प्रश्न नहीं, बल्कि करुणा और आत्मसंयम का प्रश्न था।
गाय के प्रश्न पर भारत में लंबे समय से वैचारिक, धार्मिक और कानूनी बहस चलती रही है। 1961 के अब्दुल हकीम कुरैशी बनाम बिहार राज्य मामले में सर्वाेच्च न्यायालय ने यह कहा था कि गोवध-प्रतिबंध से मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता का अनिवार्य उल्लंघन सिद्ध नहीं होता। इस विषय पर विद्वानों और धार्मिक व्याख्याकारों के बीच अलग-अलग मत रहे हैं, और यह बहस आज भी जारी है। लेकिन इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष कहीं और है।
यदि हम गाय को माता कहते हैं, उसकी पूजा करते हैं, तो हमें अपने व्यवहार का भी परीक्षण करना चाहिए। क्या हम वास्तव में गाय के प्रति वैसी ही करुणा और उत्तरदायित्व दिखाते हैं, जैसा हम सार्वजनिक रूप से दावा करते हैं?
भारतीय समाज में अनेक विरोधाभास दिखाई देते हैं। हम नदियों को पवित्र मानते हैं, पर उन्हें प्रदूषित भी करते हैं। हम विश्व-बंधुत्व की बात करते हैं, पर सामाजिक भेदभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं। हम नारी को देवी कहते हैं, परंतु व्यवहार में समानता का आदर्श अभी भी अधूरा है। उसी प्रकार, गाय को माता कहने और उसके वास्तविक संरक्षण के बीच भी एक बड़ा अंतर दिखाई देता है।
हम देखते हैं कि अनेक स्थानों पर बूढ़ी गायों को परित्यक्त कर दिया जाता है, बछड़ों की उपेक्षा होती है, पशुओं को सड़कों पर छोड़ दिया जाता है, और डेयरी उद्योग में पशु-कल्याण के प्रश्नों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया जाता। यदि गाय के प्रति सम्मान केवल प्रतीकात्मक है और उसके जीवन की गरिमा की रक्षा नहीं करता, तो वह अधूरा सम्मान है।
इसीलिए यदि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए, तो उसके साथ कुछ ठोस कदम भी उठाए जाने चाहिए-गोवंश संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था। पशु-कल्याण कानूनों का कड़ाई से पालन। डेयरी उद्योग में मानवीय और वैज्ञानिक मानकों का अनुपालन। परित्यक्त पशुओं के लिए संरक्षित आश्रय। पर्यावरण, जैव-विविधता और जीव-दया पर आधारित व्यापक नीति। सभी पशुओं के प्रति करुणा और उत्तरदायित्व की संस्कृति का विकास।
मेरे विचार से वर्तमान युग का धर्म तीन आधारों पर खड़ा होना चाहिए, प्रकृति-साहचर्य, पर्यावरण-संरक्षण और जीव-दया। यदि ये तीनों अनुपस्थित हैं, तो धार्मिकता केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। महात्मा गांधी ने यंग इंडिया (6 अक्टूबर 1921) में लिखा था-‘गाय का अर्थ मैं मनुष्य के नीचे की सारी गूँगी दुनिया करता हूँ। इसमें गाय के बहाने मनुष्य को सम्पूर्ण चेतन-सृष्टि के साथ आत्मीयता का अनुभव कराने का प्रयत्न है। गाय दयाधर्म की मूर्तिमंत कविता है।’
गांधी के इस कथन में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि संपूर्ण प्राणी-जगत के प्रति करुणा का प्रतीक बन जाती है। वह हमें स्मरण कराती है कि मनुष्य का नैतिक दायित्व केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है; वह समस्त जीव-जगत तक विस्तृत है।
इसी दृष्टि से मैं मानता हूँ कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का प्रश्न केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न नहीं है। यह उस मूल्य-व्यवस्था का प्रश्न है जिसे हम अपने समाज के केंद्र में स्थापित करना चाहते हैं।
बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है और उसके संरक्षण का अपना महत्व है। किंतु यदि किसी प्राणी को भारतीय सभ्यता की करुणा, सहिष्णुता, धैर्य, सेवा और सहअस्तित्व की भावना का प्रतिनिधि माना जाए, तो गाय का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
अंततः प्रश्न गाय का नहीं, करुणा का है; प्रश्न प्रतीक का नहीं, उसके अनुरूप आचरण का है। यदि भारत वास्तव में जीव-दया और प्रकृति-सम्मत विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो गाय सहित समस्त प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता उसके सार्वजनिक जीवन का अभिन्न अंग बननी चाहिए। यह संस्करण मूल विचारों को बनाए रखते हुए भाषा को अधिक संयत, शोधपरक और प्रकाशन-योग्य बनाता है।
यह निजी विचार वाला आलेख मैंने सुशोभित के फेसबुक पेज से लिया है। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
