गौतम चौधरी
बिहार के भागलपुर में गंगा पर बना विक्रमशिला सेतु केवल कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं था, यह उत्तर और पूर्वी बिहार की जीवनरेखा था। कोसी-सीमांचल को दक्षिण बिहार से जोड़ने वाला यह पुल वर्षों तक विकास, संपर्क और राज्य की आर्थिक धड़कन का प्रतीक बना रहा। लेकिन आज वही पुल दरारों, टूटे स्लैबों और प्रशासनिक लापरवाही की कहानी बन चुका है।
विडंबना यह है कि जो राजनीतिक दल आज इसकी दुर्दशा पर वर्तमान सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, वे स्वयं भी इस इतिहास से पूरी तरह अलग नहीं हैं। क्योंकि विक्रमशिला सेतु केवल एक पुल नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति और प्रशासनिक संस्कृति की सामूहिक विफलता का स्मारक बन गया है।
1990 के दशक में जब इस परियोजना की नींव रखी गई, तब केंद्र में बदलती गठबंधन सरकारों का दौर था। उस समय केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय की देखरेख में यह राष्ट्रीय महत्व की परियोजना आगे बढ़ी। निर्माण का दायित्व उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम को सौंपा गया। 2001 में इसका उद्घाटन हुआ और इसे बिहार की बड़ी उपलब्धियों में गिना गया।
लेकिन प्रश्न यह है कि मात्र लगभग पच्चीस वर्षों में ही एक इतना महत्वपूर्ण पुल गंभीर संरचनात्मक संकट में कैसे पहुंच गया? क्या समस्या केवल वर्तमान सरकार की है? या यह दशकों की राजनीति, भ्रष्ट ठेका संस्कृति और “चलता है” प्रशासनिक मानसिकता का परिणाम है?
सच यह है कि भारत में बड़ी परियोजनाएं अक्सर उद्घाटन तक ही राजनीतिक प्राथमिकता रहती हैं। उसके बाद रखरखाव, तकनीकी निरीक्षण और दीर्घकालिक सुरक्षा राजनीतिक विमर्श से गायब हो जाते हैं। विक्रमशिला सेतु इसका जीवंत उदाहरण है। वर्षों तक क्षमता से अधिक भारी वाहनों का दबाव पड़ता रहा। समय-समय पर विशेषज्ञों ने चेतावनियां दीं। मरम्मत की जरूरत बताई गई। लेकिन सरकारें बदलती रहीं और पुल पर भार बढ़ता रहा।
आज विपक्ष वर्तमान सरकार पर हमला कर रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि रखरखाव में लापरवाही हुई, समय रहते मरम्मत नहीं कराई गई और जनता की सुरक्षा से खिलवाड़ हुआ। इन आरोपों में तथ्य भी हैं। यदि किसी पुल का स्लैब टूटने लगे, यातायात रोकना पड़े और विशेषज्ञों की आपात टीम बुलानी पड़े, तो यह केवल “प्राकृतिक क्षरण” नहीं कहलाता। यह प्रशासनिक विफलता है।
परंतु दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि जिन दलों ने दशकों तक बिहार और केंद्र की सत्ता संभाली, वे भी इस ढांचे की नियति तय करने में सहभागी रहे। यदि निर्माण गुणवत्ता सर्वाेत्तम होती, नियमित तकनीकी ऑडिट होते और रखरखाव को राजनीतिक दिखावे से ऊपर रखा जाता, तो शायद स्थिति इतनी भयावह नहीं बनती।
दरअसल, भारत की राजनीति में “इन्फ्रास्ट्रक्चर” का अर्थ अक्सर केवल शिलान्यास और उद्घाटन तक सीमित रह जाता है। कैमरों के सामने फीता काट दिया जाता है, लेकिन उसके बाद पुल, सड़क, बांध और अस्पताल धीरे-धीरे अपनी नियति पर छोड़ दिए जाते हैं। जनता तब तक भूल चुकी होती है और राजनीतिक वर्ग अगली परियोजना की घोषणा कर चुका होता है।
विक्रमशिला सेतु की त्रासदी हमें कई बड़े सवाल पूछने को मजबूर करती है-क्या भारत में सार्वजनिक परियोजनाओं की जवाबदेही केवल निर्माण तक सीमित है, यदि कोई पुल समय से पहले जर्जर हो जाए, तो जिम्मेदार कौन होगा, ठेकेदार, इंजीनियर, तत्कालीन सरकारें, या वर्तमान प्रशासन?
दुर्भाग्य से हमारे यहां जवाबदेही की परंपरा नहीं, केवल आरोप-प्रत्यारोप की संस्कृति है। आज समानांतर नया पुल बनाया जा रहा है। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन यदि वही पुरानी राजनीतिक मानसिकता बनी रही, तो कुछ दशक बाद शायद वही कहानी फिर दोहराई जाएगी कृ नया पुल, नए उद्घाटन, नए भाषण और फिर वही जर्जर ढांचा।
क्षतिग्रस्थ विक्रमशिला सेतु केवल गंगा पर बना पुल नहीं, बल्कि भारतीय शासन व्यवस्था पर खड़ा एक असुविधाजनक प्रश्न है। यह प्रश्न हमारी संपूर्ण व्यवस्था को कठघरे में खड़ी करती है। आज तो इतना ही हो रहा है, यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में आधारभूत संरचनाएं क्षतिग्रस्त होती रहेगी और याद रहे जिस राष्ट्र की आधारभूत संरचनाएं खंडित होती है वह राष्ट्र लंबे समय तक स्वतंत्र नहीं रह पाता है।
