गौतम चौधरी
भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद उन्हें वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे वास्तवक हकदार हैं। मलिक अंबर, ऐसा ही एक नाम है। एक ऐसा व्यक्ति, जिसका जन्म भारतीय उपमहाद्वीप से हजारों किलोमीटर दूर अफ्रीका की धरती पर हुआ, जिसे बचपन में गुलाम बनाकर बेच दिया गया, जिसने अपना जीवन दासता में प्रारंभ की लेकिन अंततः दक्कन की राजनीति का सबसे शक्तिशाली नेता बनकर उभरा। यह कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता की नहीं, बल्कि उस सामाजिक गतिशीलता की भी है जिसने मध्यकालीन भारत को विश्व के अनेक अन्य समाजों से अलग बनाया।
मलिक अंबर का जन्म सोलहवीं शताब्दी के मध्य में इथियोपिया के हारर क्षेत्र में ओरोमो समुदाय में हुआ था। उनका मूल नाम चापू था। बचपन में ही उन्हें गुलाम बनाकर अरब व्यापारियों के हाथों बेच दिया गया। दास व्यापार के उस क्रूर नेटवर्क ने उन्हें अफ्रीका से अरब जगत तक पहुँचा दिया। बगदाद के गुलाम बाजारों से गुजरते हुए अंततः वह गुलाम भारत आ गया। भारत में उस चापू गुलाम की किस्मत ने पलटी मारी।
जिस व्यक्ति ने उन्हें खरीदा, वह स्वयं कभी गुलाम रह चुका था और अहमदनगर का एक प्रभावशाली अधिकारी बन चुका था। उसके निधन के बाद मलिक अंबर को स्वतंत्रता मिली। यहीं से उनके जीवन का दूसरा अध्याय शुरू हुआ। स्वतंत्र होने के बाद उन्होंने सैनिक सेवाओं में अपना स्थान बनाया और धीरे-धीरे अपनी सैन्य प्रतिभा, संगठन क्षमता तथा राजनीतिक सूझबूझ के कारण पहचान अर्जित की।
उस समय दक्कन का राजनीतिक परिदृश्य अत्यंत उथल-पुथल भरा था। उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य विस्तार कर रहा था और दक्कन की सल्तनतें उसके दबाव में थीं। अकबर की महत्वाकांक्षा दक्कन को अपने साम्राज्य में शामिल करने की थी। अहमदनगर सल्तनत पर मुगल आक्रमणों ने वहाँ की राजनीतिक व्यवस्था को संकट में डाल दिया था। ऐसे समय में मलिक अंबर एक सैनिक नेता भर नहीं रहे; वे प्रतिरोध के प्रतीक बन गए।
उन्होंने निजामशाही वंश के एक उत्तराधिकारी को संरक्षण देकर वैध सत्ता की पुनर्स्थापना का प्रयास किया और स्वयं उसके संरक्षक तथा वास्तविक शासक के रूप में उभरे। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने मुगलों के विरुद्ध स्थानीय शक्तियों को संगठित किया। दक्खिनी मुसलमानों, मराठा सरदारों और विभिन्न स्थानीय समूहों को एक मंच पर लाना आसान कार्य नहीं था लेकिन मलिक अंबर ने यह कर दिखाया।
यही वह दौर था जब मराठा सरदारों की भूमिका तेजी से बढ़ने लगी। मालोजी भोंसले जैसे सरदार मलिक अंबर के सहयोगी बने। इतिहासकारों का मानना है कि दक्कन में जो सैन्य और प्रशासनिक संरचना विकसित हुई, उसने आगे चलकर मराठा शक्ति के उदय की भूमि तैयार की। इस दृष्टि से मलिक अंबर को केवल अहमदनगर का नेता नहीं, बल्कि मराठा राजनीतिक चेतना के प्रारंभिक निर्माताओं में भी गिना जाता है।
मलिक अंबर की सैन्य रणनीति विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। उन्होंने विशाल मुगल सेनाओं का मुकाबला पारंपरिक युद्धों से नहीं, बल्कि तेज़ गति, स्थानीय भूगोल की समझ और छापामार रणनीति के माध्यम से किया। बाद में यही युद्धक शैली मराठाओं की पहचान बनी। कई इतिहासकार मानते हैं कि जिस गुरिल्ला युद्ध पद्धति को बाद में छत्रपति शिवाजी महाराज ने नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया, उसकी प्रारंभिक नींव मलिक अंबर के दौर में ही रखी गयी थी।
उनकी प्रशासनिक उपलब्धियाँ भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मलिक अंबर ने भूमि राजस्व व्यवस्था में सुधार किया, किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए कर प्रणाली को व्यवस्थित किया और दक्कन के कई क्षेत्रों में कृषि उत्पादन को बढ़ावा दिया। उन्होंने खड़की नामक नगर की स्थापना की, जो आगे चलकर औरंगाबाद के रूप में विकसित हुआ।
मुगल सम्राट जहाँगीर के लिए मलिक अंबर एक स्थायी सिरदर्द बन चुका था। जहाँगीर ने अपने संस्मरणों में उनके प्रति नाराज़गी व्यक्त की है। यहाँ तक कि उन्होंने एक प्रसिद्ध चित्र भी बनवाया जिसमें वे मलिक अंबर को पराजित करते हुए दिखाए गए थे। विडंबना यह थी कि जिस व्यक्ति को चित्रों में हराया जा रहा था, उसे वास्तविक युद्धभूमि में मुगल साम्राज्य कभी निर्णायक रूप से परास्त नहीं कर सका।
1626 में लगभग अस्सी वर्ष की आयु में मलिक अंबर का निधन हुआ। उन्हें एलोरा गुफाएँ के निकट दफनाया गया लेकिन मलिक अंबर की विरासत उनकी कब्र से कहीं बड़ी है। मलिक अंबर का जीवन इतिहास की उन धारणाओं को चुनौती देता है जो सत्ता, नस्ल, जन्म और सामाजिक स्थिति को सफलता का आधार मानती हैं। अफ्रीका में जन्मा एक गुलाम भारत में आकर दक्कन की राजनीति का निर्णायक व्यक्तित्व बनता है, मुगल साम्राज्य जैसी विशाल शक्ति को दशकों तक चुनौती देता है और एक ऐसी राजनीतिक-सैन्य परंपरा की नींव रखता है जो आगे चलकर मराठा साम्राज्य के उदय का मार्ग प्रशस्त करती है-यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि इतिहास की संभावनाओं की कहानी है।
आज जब भारतीय इतिहास को अक्सर संकीर्ण पहचानों के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब मलिक अंबर का जीवन हमें याद दिलाता है कि भारत का इतिहास अनेक महाद्वीपों, संस्कृतियों और समुदायों के परस्पर संवाद से निर्मित हुआ है। एक इथियोपियाई बालक का महाराष्ट्र का वास्तविक शासक बन जाना इसी जटिल और समृद्ध ऐतिहासिक विरासत का प्रमाण है।
