गौतम चौधरी
कभी भारतीय आईटी उद्योग को देश के उभरते मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा निर्माता कहा जाता था। इंजीनियरिंग कॉलेजों से निकलने वाले लाखों युवाओं के लिए आईटी सेक्टर केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक उन्नति का माध्यम भी था। पिछले तीन दशकों में इस क्षेत्र ने भारत को वैश्विक सेवा अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाया। लेकिन आज वही क्षेत्र एक नए मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेज विस्तार ने एक ऐसा प्रश्न खड़ा कर दिया है, जो केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है-क्या एआई भारत के रोजगार मॉडल को बदल रहा है?
दुनिया भर में पिछले दो वर्षों के दौरान लाखों नौकरियों पर संकट की खबरें सामने आई हैं। अनेक वैश्विक कंपनियों ने छँटनी की है और कई मामलों में एआई को इसका प्रमुख कारण बताया गया है। हालांकि अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग यह भी कहता है कि इन छँटनियों के पीछे केवल एआई नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक मंदी, महामारी के बाद की अति-भर्ती और कॉर्पाेरेट पुनर्गठन जैसे कारण भी जिम्मेदार हैं।
फिर भी भारत के लिए वास्तविक चिंता कहीं अधिक विशिष्ट है। भारतीय आईटी उद्योग का पारंपरिक मॉडल बड़ी संख्या में प्रवेश-स्तरीय कर्मचारियों की भर्ती पर आधारित था। कॉलेज से निकले युवाओं को प्रशिक्षण देकर धीरे-धीरे उत्पादक कार्यबल में बदला जाता था लेकिन अब यह मॉडल बदल रहा है। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार प्रवेश-स्तरीय भर्ती का हिस्सा हाल के वर्षों में उल्लेखनीय रूप से घटा है और कंपनियाँ बड़े पैमाने पर फ्रेशर्स रखने के बजाय एआई, क्लाउड, साइबर सुरक्षा और ऑटोमेशन जैसे विशिष्ट कौशलों पर अधिक ध्यान दे रही हैं।
यही वह बिंदु है जहाँ एआई का प्रभाव सबसे स्पष्ट दिखाई देता है। जिन कार्यों के माध्यम से लाखों युवा आईटी उद्योग में प्रवेश करते थे-जैसे प्रारंभिक कोडिंग, टेस्टिंग, सपोर्ट, डेटा प्रोसेसिंग और दस्तावेज़ीकरण-उनमें से कई कार्य अब एआई उपकरणों की सहायता से कम लोगों द्वारा किए जा सकते हैं। एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रवेश-स्तरीय आईटी भूमिकाओं में 20 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट देखी जा रही है।
अब सवाल उठता है, क्या इसका अर्थ यह है कि एआई केवल नौकरियाँ नष्ट कर रहा है? उत्तर इतना सरल नहीं है। यही तकनीक नई प्रकार की नौकरियाँ भी पैदा कर रही है। एआई इंजीनियर, डेटा वैज्ञानिक, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, क्लाउड आर्किटेक्ट और डोमेन-विशेषज्ञ पेशेवरों की मांग बढ़ रही है। कुछ अध्ययनों का निष्कर्ष है कि भारत में एआई ने व्यापक स्तर पर रोजगार विनाश नहीं किया है, बल्कि कार्य-प्रणालियों का पुनर्गठन किया है और कुशल श्रमिकों की मांग बढ़ाई है।
समस्या यह है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था और रोजगार बाजार के बीच पहले से मौजूद अंतर अब और गहरा होता दिखाई दे रहा है। हर वर्ष लाखों छात्र इंजीनियरिंग और तकनीकी डिग्रियाँ लेकर निकलते हैं, लेकिन उद्योग को अब पहले जैसी संख्या में सामान्य कौशल वाले कर्मचारी नहीं चाहिए। उसे कम संख्या में, लेकिन अधिक विशेषज्ञता वाले पेशेवर चाहिए। परिणामस्वरूप डिग्रीधारियों की संख्या बढ़ रही है, जबकि गुणवत्तापूर्ण अवसर अपेक्षाकृत सीमित होते जा रहे हैं।
यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चुनौती भी है। यदि एआई उत्पादकता बढ़ाता है लेकिन रोजगार वृद्धि की गति धीमी कर देता है, तो इसका असर सबसे अधिक युवाओं पर पड़ेगा। विशेषकर उन छात्रों पर, जिन्होंने तकनीकी शिक्षा को रोजगार की गारंटी समझकर भारी शुल्क और ऋण के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की है।
भारत के नीति-निर्माताओं के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। एक ओर देश एआई क्रांति से पीछे नहीं रह सकता। दूसरी ओर केवल तकनीकी प्रगति को सफलता मान लेना भी पर्याप्त नहीं होगा। यदि उत्पादकता बढ़े लेकिन रोजगार के अवसर सिकुड़ते जाएँ, तो आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता के बीच तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।
आज आवश्यकता एआई को रोकने की नहीं, बल्कि उसके अनुरूप शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार नीतियों को पुनर्गठित करने की है। विश्वविद्यालयों को पुराने पाठ्यक्रमों से आगे बढ़ना होगा। उद्योगों को पुनः कौशल (reskilling) और उन्नत कौशल (upskilling) में अधिक निवेश करना होगा। सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीकी परिवर्तन का लाभ केवल कुछ कंपनियों तक सीमित न रह जाए, बल्कि व्यापक समाज तक पहुँचे।
एआई भारत के लिए खतरा भी बन सकता है और अवसर भी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि देश इसे केवल लागत घटाने के औजार के रूप में देखता है या मानव क्षमता को बढ़ाने वाली तकनीक के रूप में। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भारतीय आईटी उद्योग का पुराना रोजगार मॉडल बदल रहा है। प्रश्न यह नहीं है कि एआई आएगा या नहीं; प्रश्न यह है कि उसके आने से बनने वाले नए भारत में युवाओं के लिए कितनी जगह होगी।
