शौर्य, पराक्रम व बलिदान की जीवंत भूमि है उदयपुर

शौर्य, पराक्रम व बलिदान की जीवंत भूमि है उदयपुर

विनोद बब्बर

गत वर्ष साहित्य मंडल के कार्यक्रम में श्रीनाथद्वारा जाने का अवसर मिला। भगवान श्रीनाथजी के पाटोत्सव के अवसर पर आयोजित इस द्विवसीय समारोह में हमारे आग्रह पर हिम्मतनगर गुजरात से पूज्य स्वामी डॉ, गौरांगशरण देवाचार्य तथा महंत सुनीलदास भी श्रीनाथद्वारा पधारे। हमें बालासोर सदन में चार बिस्तरों वाला कक्ष उपलब्ध करवाया गया। इस दौरान हमने श्रीनाथजी के दर्शन लाभ के साथ-साथ ब्रज -भाषा से संबंधित अनेक कार्यक्रमों का आनंद लिया। श्रीनाथद्वारा में विराजित श्रीनाथ जी के विषय में जो जानकारी प्राप्त हुई उसके अनुसार गोवर्धन स्वरुप यह छवि मथुरा में विराजित थी जिसे मुगलकाल में सुरक्षा की दृष्टि से राजस्थान लाया गया था। सर्वप्रथम श्रीनाथजी यहाँ से 19 किलोमीटर दूर घसियार नामक स्थान पर पधारे जिसे फाल्गुन कृष्ण सप्तमी संवत 1728 को यहाँ लाकर प्रतिष्ठित किया गया। तभी से प्रभु श्रीनाथजी का पाटोत्सव फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को मनाया जाता है जिसमें देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

इस स्थान का पुराना नाम सिंहाड़ था, जो प्रभु श्रीनाथजी के आगमन के बाद श्रीनाथद्वारा हो गया। हमने हाइवे पर स्थित घसियार के प्राचीन मंदिर के भी दर्शन किये। 25 फरवरी को प्रातः मंगला दर्शन के बाद हमने हल्दीघाटी सहित उदयपुर के प्रमुख स्थलों का अवलोकन करने का निश्चय किया। इस संदर्भ में टैक्सी चालक सुखलाल से पहले ही बात हो चुकी थी, इसलिए वह नियत समय पर उपस्थित हो गया।

स्वभाव से सरल, अल्पभाषी सुखलाल ने प्रथम दृष्टि में ही प्रभावित किया इसलिए जब उसने हल्दीघाटी की ओर जाते हुए रास्ते में पड़ने वाले अपने घर चाय पीने का आग्रह किया तो हम इंकार न कर सके। राजसमंद जिले की तंग सड़क पर स्थित श्रीनाथद्वारा तहसील के गाँव निचली वाड़ा में सुखलाल के परिजनों ने अत्यंत आत्मीयता से हमारा स्वागत किया। बेशक वहाँ भौतिक साधनों की चमक-दमक नहीं थी लेकिन श्रद्धा कम न थी। जमीन पर चटाई बिछाकर हमें बैठाया गया और सबसे पहले जल प्रस्तुत किया गया। इसी बीच वहाँ उपस्थित एक वृद्ध ने राजस्थान की शाही परम्परा के अनुसार अफीम चटाने की पेशकश की तो हमने साफ इंकार कर दिया और केवल सादा चाय ग्रहण की। कुछ देर गाँव निचली वाड़ा में रुकने के बाद हम हल्दीघाटी की ओर बढ़े।

चारों ओर उबड़-खाबड़ पहाड़ और बीच में सुनसान घाटी को हल्दीघाटी क्यों कहा जाता है, इसका उत्तर वहाँ पहुंचते ही मिल गया। एक संकरे से दर्रें को पार करते ही देखा कि यहाँ की माटी का रंग पीला है। शायद इसी कारण इस घाटी को हल्दीघाटी का नाम दिया गया। यही वह स्थान है जहाँ 18 जून 1576 को मुगल सम्राट अकबर और मेवाड़ के महाराणा प्रताप के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ था।

मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह के ज्येष्ठ पुत्रा महाराणा प्रताप इकलौते ऐसे राजा थे जिन्होंने मुगलों की गुलामी स्वीकार नहीं की। इस युद्ध में उन्हें राधा पूंजा, झाला मान सिंह, हकीम खा सूरी, हजारों भीलों के साथ भामाशाह जैसे दानवीर का सहयोग भी मिला। कहा जाता है कि इस धरती पर इतना रक्त बहा कि पास का पोखर खून से लबालब हो गया। तभी से इसका नाम रक्त पोखर हो गया जो आज भी इसी नाम से जाना जाता है।

मुगलों की सेना का नेतृत्व मानसिंह कर रहा था। महाराणा प्रताप की सेना ने छापामार युद्ध पद्धति का अनुसरण करते हुए मुगलों के दांत खट््टे कर दिये। महाराणा प्रताप और मानसिंह में आमने-सामने मुकाबला भी हुआ। प्रताप के भाले के वार से स्वयं को बचाने के लिए मानसिंह हाथी के ओहदे के पीछे छिप गया। इसी दौरान प्रताप के स्वामीभक्त घोड़े चेतक के पैर में चोट लग गई लेकिन उसके बावजूद चेतक ने अपने स्वामी को एक बड़े नाले को पार करवाकर सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया। जिस स्थान पर चेतक ने अंतिम सांस ली, आज वहाँ चेतक का स्मारक देखकर अहसास हुआ कि वतन पर मिटने वाले घोड़े को जो श्रद्धा प्राप्त है शायद वह मुगलों के चाटुकार रहे मानसिंह को भी प्राप्त नहीं हुई।

इसी स्मारक के बिल्कुल पास महाराणा प्रताप म्यूजियम बनाया गया है। टिकट लेकर हमने प्रवेश किया। महान राष्ट्र भक्त के इस स्मारक पर बहुत कम चहल-पहल देखकर मन में बहुत ग्लानि हुई क्योकि आज चरित्राहीन नेताओं- अभिनेताओं के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। इस संग्रहालय में हल्दीघाटी और महाराणा प्रताप से संबंधित समस्त जानकारी जैसे अस्त्रा-शस्त्रा, वेशभूषा, साहित्य आदि को बहुत अच्छे ढंग से दिखाया गया है। यहाँ एक फिल्म दिखाने के बाद लाइट एण्ड साउंड कार्यक्रम के माध्यम से उस काल की घटनाओं को इस तरह से प्रस्तुत किया गया कि इतिहास के वे गौरवशाली क्षण जीवंत हो उठे। इसी संग्रहालय में छोटा सा बाजार भी है जहाँ राजस्थानी शैली की कलात्मक वस्तुएं बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। एक स्थान पर महाराणा प्रताप की पोशाक में फोटो खिंचवाने की व्यवस्था भी है। मुनीष गोयल को महाराणा प्रताप के वेश में देखना एक सुखद अहसास था। महंत सुनीलदास ने राजस्थानी पगड़ी वाला फोटो खिंचवाया।

हल्दीघाटी की ऐतिहासिक धरा को प्रणाम कर हम उदयपुर की ओर बढ़े। अरावली की पहाड़ियों के घुमावदार रास्तों से आगे बढ़ते हुए हम जब उदयपुर पहुंचे तो समय काफी हो चुका था और सुबह से कुछ भी ग्रहण न करने के कारण भूख भी लगी थी इसलिए सबसे पहले दालभाटी-चूरमा का आनंद लिया और उसके बाद उदयपुर की ऐतिहासिक झीलों की ओर बढ़े।

उदयपुर को झीलों की नगरी कहा जाता है क्योंकि यहाँ कई झीलें हैं। सबसे खूबसूरत झील है पिछौला झील जोकि सिटी पैलेस के बिल्कुल साथ है। इसी झील के बीचोंबीच लेक पैलेस है जोकि आजकल पंचसितारा होटल का रूप धारण कर चुका है। इसके अतिरिक्त जग निवास के नाम से मंदिर भी है। इस झील और इन महलों को देखने देश-विदेश से लाखों लोग आते हैं क्योंकि यहाँ का नजारा सचमुच निराला है। इसका अवलोकन करते हुए मन में सवाल उठता है कि इतनी गहरी झील के बीचोंबीच ये महल आखिर बनाये भी गये तो कैसे? यह तो सर्वविदित ही है कि इस नगर की स्थापना महाराजा उदय सिंह ने की। कहा जाता है कि एक बार उदयसिंह शिकार खेलते हुए इस झील के किनारे पहुँचे तो यहाँ धूनी लगाये एक ऋषि बैठे थे। उन दिनों उदयसिंह मुगलों तथा दूसरे अनेक राजाओं की आँखों की किरकिरी बने हुए थे। राजा ने ऋषि को प्रणाम किया और उन्होंने राजा को झील के किनारे अपनी राजधानी बनाने को कहा और आशीर्वाद दिया कि यहाँ कोई भी तुम्हारा बाल तक बांका न कर पायेगा। बस तभी से राजा ने चित्तौड़गढ को छोड़कर यहीं बसने का निर्णय लिया।

1569 में बनना शुरु हुआ सिटी पैलेस राजस्थान का सबसे बड़ा महल है। भारतीय के साथ-साथ चीन और यूरोप की वास्तुकला के बेहतरीन नमूने को देखना सुखद अनुभव है। आजकल इसके एक भाग को संग्रहालय के रुप में परिवर्तित कर दिया गया है जहाँ शाही साजो सामान को सुंदर ढ़ंग से प्रदर्शित किया गया है। इतिहासकारों ने इस महल को भारत के विंडसर पैलेस की संज्ञा दी है। इसके अतिरिक्त सहेलियों की बावड़ी, फतेहसागर झील, सज्जनगढ़ में मानसून पैलेस, शिल्पग्राम, मोती की मगरी, जगदीश मंदिर, कांच गैलेरी, सहेलियों की बाड़ी जैसे अनेक दर्शनीय स्थान भी हैं। मोती की मगरी फतेहसागर झील के पास पहाड़ी पर वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की भव्य प्रतिमा है। जिसके चारों ओर सुदर बगीचे हैं। यहाँ का रॉक गार्डन भी देखने योग्य है।

उदयपुर से मात्रा 100 किमी की दूरी पर चित्तौड़गढ़ का किला है जिसे समयाभाव के कारण से हम नहीं देख सके लेकिन एक माह बाद जब एक साहित्यिक कार्यक्रम का निमंत्राण मिला तो हमने ये स्थल देखने के लिए फौरन हामी भर दी। वास्तव में यह भूमि देश-प्रेम, स्वाभिमान, आन-बान-शान और मर्यादा की रक्षा में मरमिटने वाले वीर सपूतों का इतिहास अपने में समेटे हुए है। अपनी मातृभूमि पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले रणबांकुरों तथा अपनी इज्जत की रक्षा के लिए जलती अग्नि में प्रवेश कर जौहर करने वाली वीरांगनाओं की माटी को मस्तक पर लगाकर कौन भारतीय स्वयं को गौरवांवित महसूस न करेगा। इसके 5 मील दूर कुम्भागढ़ के महल के पास मीरामंदिर भी है। मेवाड़ घराने की बहू मीरा का कृष्ण से प्रेम जगजाहिर है। मीरा ने हंसते-हंसते जहर कर प्याला पी लिया था, जो अमृत बन गया।

उदयपुर के आसपास के प्रमुख दर्शनीय पर्यटक स्थलों में नागदा, एकलिंगजी, कांकरोली, राजसमंद झील, उदयपुर की सात बहनों का मंदिर, सास-बहू का मंदिर भी प्रसिद्ध है। ‘सास-बहू का मंदिर’ जैसाकि नाम सुनकर ही कौतुहल होता है कि यह कैसा स्थान होगा। यह जानकर बेहद आश्चर्य हुआ कि उदयपुर से 28 किमी दूर प्रसिद्ध एकलिंग जी के मंदिर से थोड़ा पहले कच्चे रास्ते पर खड़ा यह मंदिर वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। विक्रमी संवत ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास बने सास बहू के मंदिर के विषय में कहा जाता है कि मेवाड़ घराने की राजमाता और उनकी बहू द्वारा निर्मित मंदिर का असली नाम सहस्रबाहू मंदिर था जो बिगड़ कर सास-बहू का मंदिर हो गया। यहाँ विष्णु तथा शेषनाग मंदिर हैं। कला संस्कृति के उत्कृष्ट नमूने के रुप में आज भी विद्यमान ये दोनों मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर सुर-सुंदरियों की प्रतिमाएं सूक्ष्म नक्काशी से उकेरी गई हैं। इनकी भव्यता की तुलना आबू के दिलवाड़े के मंदिरों से की जा सकती है। सास बहू मंदिर के प्रवेशद्वार पर बने छज्जों पर पूरी महाभारत कथा अंकित है। बायें स्तम्भ पर शिव- पार्वती की प्रतिमाएं हैं तो तोरण भी देखते ही बनते हैं।

सास-बहू के मंदिर के बीच में ब्रह्माजी का मंदिर है। इस मंदिर का गुम्बद छोटा होते हुए भी बारीक जाली जैसी नक्काशी से शोभायमान है। ये मंदिर अत्यंत प्राचीन तो है लेकिन अनेक मंदिरों से बेहतर स्थिति मंे माने जा सकते हैं। इन्हें संरक्षित स्मारकों की श्रेणी में शामिल तो अवश्य किया गया है लेकिन शासन की ओर से संरक्षण की व्यापक व्यवस्था तो दूर इसके इतिहास और महत्व की जानकारी देने वाला कोई पर्यटन अधिकारी भी न होना क्षोभ उत्पन्न करता है क्योंकि ऐसी लापरवाही से इतिहास के ये मूक गवाह जो आने वाली पीढ़ियों को उसके गौरवशाली अतीत से परिचित करवा सकते हैं, एक दिन लापता हो जायेंगे। उदयपुर का यह संक्षिप्त प्रवास अविस्मरणीय रहेगा। स्वामीजीे हिम्मत नगर के लिए प्रस्थान कर गये। मैं मेवाड़ एक्सप्रेस में बैठा भवानी मण्डी के राजेश शर्मा ‘पुरोहित’ द्वारा प्रेषित पंक्तियों को स्मरण कर रहा था।

(उर्वशी)

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