नयी दिल्ली/पटना/रांची/ इस वर्ष का दक्षिण-पश्चिम मानसून एक दिलचस्प संयोग और विरोधाभास लेकर आया है। जून के अधिकांश हिस्से में मानसून अपेक्षाकृत कमजोर रहा और देशव्यापी वर्षा सामान्य से काफी कम दर्ज की गई। इसके कारण कृषि, जलाशयों और खरीफ बुवाई को लेकर चिंता बढ़ गई थी। किंतु जुलाई के पहले सप्ताह में स्थिति तेजी से बदली है। बंगाल की खाड़ी में बने सशक्त निम्न दबाव क्षेत्र ने मानसून को सक्रिय कर दिया है और मध्य तथा पूर्वी भारत में व्यापक वर्षा शुरू हो गई है।
राष्ट्रीय परिदृश्य
जून के अंत तक देश में वर्षा का संचयी घाटा लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच गया था, जो जुलाई के पहले सप्ताह में सक्रिय मानसून के कारण घटकर लगभग 27 प्रतिशत के आसपास आ गया है। इसका अर्थ है कि मानसून ने ‘रिकवरी मोड’ में प्रवेश कर लिया है, यद्यपि अभी भी पूरे देश में वर्षा का वितरण समान नहीं है।
क्षेत्रवार स्थिति
पूर्वी भारत (झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल)
यह क्षेत्र वर्तमान में मानसून का सबसे सक्रिय क्षेत्र बना हुआ है। बंगाल की खाड़ी से लगातार नमी मिलने के कारण अच्छी वर्षा हो रही है। झारखंड और बिहार में कई स्थानों पर सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई है तथा अगले कुछ दिनों तक भी अच्छी बारिश की संभावना बनी हुई है।
मध्य भारत (छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, विदर्भ)
मानसून सक्रिय है। कई जिलों में भारी वर्षा हुई है, जिससे कृषि कार्यों को गति मिली है। हालांकि कहीं-कहीं अत्यधिक वर्षा के कारण जलभराव और बाढ़ जैसी स्थितियाँ भी बन रही हैं।
पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र, गुजरात, कोंकण)
इस समय देश में सबसे अधिक वर्षा इसी क्षेत्र में हो रही है। विशेषकर मुंबई और कोंकण क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा ने सामान्य जनजीवन को प्रभावित किया है।
उत्तर भारत
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में मानसून अब मजबूत हो रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में अगले कुछ दिनों तक भारी वर्षा, भूस्खलन और अचानक बाढ़ का खतरा बना रह सकता है।
दक्षिण भारत
केरल, कर्नाटक और तेलंगाना में सामान्य से अच्छी वर्षा हो रही है। आंध्र प्रदेश के कुछ भागों में अभी भी वर्षा का वितरण असमान है।
झारखंड की स्थिति
झारखंड के लिए यह मानसून अब तक अपेक्षाकृत संतोषजनक माना जा सकता है। जून के प्रारंभिक दिनों में वर्षा की कमी अवश्य रही, लेकिन जून के अंतिम सप्ताह से मानसून ने अच्छी गति पकड़ी। राज्य के अधिकांश जिलों में खेतों में पर्याप्त नमी उपलब्ध हो चुकी है। धान की रोपाई तेज़ी से आगे बढ़ रही है और जलाशयों का जलस्तर भी सुधरने लगा है।
विशेष रूप से रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम तथा संथाल परगना के कई क्षेत्रों में अच्छी वर्षा दर्ज की गई है। कुछ स्थानों पर अल्प अवधि में अत्यधिक वर्षा होने से शहरी जलभराव और ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे पुल-पुलियों पर दबाव भी देखा गया है।
खरीफ कृषि पर प्रभाव
कृषि की दृष्टि से वर्तमान स्थिति उत्साहजनक है।
धान की रोपाई में तेजी आएगी।
मक्का, दलहन और तिलहन की बुवाई को भी लाभ मिलेगा।
भूजल पुनर्भरण की स्थिति सुधरेगी।
छोटे जलाशयों और तालाबों में पानी का स्तर बढ़ेगा।
हालाँकि जिन क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होगी, वहाँ खेतों में जलनिकासी की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।
क्या जुलाई सामान्य रहेगा?
यहीं एक रोचक स्थिति बनती है।
मासिक दृष्टि से मौसम विभाग का अनुमान है कि पूरे जुलाई में देशभर की औसत वर्षा सामान्य से कुछ कम (लगभग 94ः दीर्घकालिक औसत) रह सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे महीने कम वर्षा होगी। इसका आशय यह है कि वर्षा का वितरण असमान रहेगाकृकुछ क्षेत्रों में बहुत अधिक और कुछ में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है।
अगले 10ः15 दिनों का पूर्वानुमान
वर्तमान मौसम प्रणालियों को देखते हुए –
पूर्वी भारत (झारखंड, बिहार, ओडिशा) में अच्छी वर्षा का दौर जारी रहने की संभावना है।
मध्य भारत में सक्रिय मानसून बना रहेगा।
पश्चिमी तट पर भारी से अत्यधिक भारी वर्षा जारी रह सकती है।
उत्तर भारत में वर्षा की तीव्रता बढ़ सकती है।
झारखंड में कई स्थानों पर गरज-चमक के साथ मध्यम से भारी वर्षा की संभावना बनी हुई है।
संभावित जोखिम
यदि वर्तमान सक्रिय मानसून लगातार बना रहता है, तो निम्न स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैंकृ
दामोदर, स्वर्णरेखा, बराकर और कोयल जैसी नदियों के जलस्तर में वृद्धि।
शहरी क्षेत्रों, विशेषकर रांची, जमशेदपुर और धनबाद के निचले इलाकों में जलभराव।
पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की आशंका।
बिजली गिरने की घटनाओं में वृद्धि।
समग्र आकलन
कुल मिलाकर, 2026 का मानसून अभी तक ‘कमजोर शुरुआत, लेकिन मजबूत वापसी’ की कहानी कहता है। जून की कमी ने चिंताएँ अवश्य बढ़ाईं, पर जुलाई के पहले सप्ताह में मानसून ने उल्लेखनीय सुधार दिखाया है। यदि बंगाल की खाड़ी में निम्न दबाव प्रणालियाँ इसी प्रकार बनती रहीं, तो पूर्वी भारतकृविशेषकर झारखंडकृको सामान्य अथवा उससे बेहतर वर्षा का लाभ मिल सकता है। दूसरी ओर, पश्चिमी भारत और कुछ मध्य भारतीय क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा से बाढ़ और जलभराव का जोखिम बना रहेगा।
