बंगला बदला लेकिन सवाल नहीं, सरकारी आवास पर सियासत से ज्यादा ज़रूरी है जवाबदेही

बंगला बदला लेकिन सवाल नहीं, सरकारी आवास पर सियासत से ज्यादा ज़रूरी है जवाबदेही

राजनीति में कुछ पते केवल डाक पहुंचाने का माध्यम नहीं होते, वे इतिहास, सत्ता और स्मृतियों के प्रतीक बन जाते हैं। पटना का 10, सर्कुलर रोड ऐसा ही एक पता है। लगभग दो दशकों तक यह बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली परिवारों में से एक का राजनीतिक केंद्र रहा। यहां रणनीतियां बनीं, चुनाव लड़े गए, सत्ता गई, सत्ता लौटी और विपक्ष की राजनीति भी यहीं से संचालित हुई। इसलिए जब पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने यह बंगला खाली किया तो यह केवल एक सरकारी मकान खाली होने की घटना नहीं रही बल्कि बिहार की राजनीति के एक लंबे अध्याय के समापन का संकेत भी बन गई।

इस पूरे विवाद में दो तस्वीरें समानांतर दिखाई देती हैं। पहली तस्वीर सरकार की है, जो कहती है कि सरकारी आवास नियमों के अनुसार खाली कराया गया है। दूसरी तस्वीर विपक्ष की है जो इसे राजनीतिक दबाव और प्रतिशोध की कार्रवाई बताता है। सच इन दोनों के बीच कहीं खड़ा दिखाई देता है।

लोकतंत्र में सरकारी आवास किसी व्यक्ति या दल की विरासत नहीं होते। वे पद के साथ आते हैं और पद बदलने पर वापस भी जाते हैं। यदि इस मूल सिद्धांत को सभी राजनीतिक दल समान सहजता से स्वीकार कर लें, तो ऐसे विवाद शायद ही कभी पैदा हों। लेकिन भारतीय राजनीति में सरकारी बंगले अक्सर सत्ता की निरंतरता का प्रतीक बन जाते हैं। पद चला जाता है, मगर पता बदलने में वर्षों लग जाते हैं।

राबड़ी देवी को सरकार ने 39, हार्डिंग रोड स्थित दूसरा सरकारी आवास आवंटित किया था। उन्होंने वहां जाने से इनकार किया। उनका आरोप था कि सरकार राजनीतिक कारणों से उन्हें हटाना चाहती है। बाद में उन्होंने निजी आवास में जाने का फैसला किया, लेकिन उससे पहले यह मांग भी रखी कि वर्ष 2006 में बंगला आवंटित होने के समय मौजूद सरकारी सामान की सूची उपलब्ध कराई जाए ताकि भविष्य में कोई आरोप न लगे।

इस मांग को केवल राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यदि सरकारी विभाग किसी भवन का कब्जा वापस ले रहा है तो उसके पास वस्तुओं का स्पष्ट रिकॉर्ड होना चाहिए। सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण का यही सामान्य प्रशासनिक तरीका है। यदि सूची उपलब्ध कराकर मिलान किया जाता है तो इससे सरकार की पारदर्शिता भी मजबूत होगी और आवंटी का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा।

लेकिन दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक संपत्ति का समय पर हस्तांतरण भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। सरकारी आवास का उपयोग अधिकार नहीं, दायित्व के साथ मिलने वाली सुविधा है। इसलिए नियमों का पालन सत्ता पक्ष और विपक्षकृदोनों से समान रूप से अपेक्षित है।

इस विवाद के दौरान एक और दिलचस्प चर्चा चली कि 39, हार्डिंग रोड का बंगला राजनीतिक रूप से ष्अशुभष् माना जाता है। भारतीय राजनीति में शुभ-अशुभ, वास्तु और ज्योतिष पर विश्वास करने वाले नेताओं की कमी नहीं है लेकिन लोकतांत्रिक शासन इन मान्यताओं से नहीं चल सकता। यदि सरकारी आवासों का आवंटन भी शुभ-अशुभ के आधार पर होने लगे तो प्रशासनिक व्यवस्था का कोई अर्थ नहीं बचेगा।

असल चिंता कहीं और है। भारत में लगभग हर बड़े राजनीतिक परिवार के साथ सरकारी आवास को लेकर विवाद जुड़ा रहा है। कभी दिल्ली में, कभी लखनऊ में, कभी भोपाल में और अब पटना में। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या हमारे यहां सरकारी संपत्ति को लेकर स्पष्ट और निर्विवाद व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है?

समाधान कठिन नहीं है। प्रत्येक सरकारी आवास की डिजिटल इन्वेंटरी हो। प्रवेश के समय संयुक्त निरीक्षण हो। निकासी के समय वही प्रक्रिया दोहराई जाए। पूरी कार्रवाई ऑनलाइन रिकॉर्ड हो। इससे न सरकार पर पक्षपात का आरोप लगेगा, न पूर्व आवंटी पर किसी सामान को लेकर संदेह पैदा होगा। तकनीक वहां विवाद खत्म कर सकती है, जहां राजनीति उन्हें बढ़ा देती है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक राजनीतिक संदेश भी है। राबड़ी देवी अब अपने निजी आवास में चली गई हैं। यानी सत्ता के प्रतीकों से अधिक महत्वपूर्ण अब राजनीतिक संघर्ष का नया दौर है। दूसरी ओर सरकार ने भी यह संकेत दिया है कि सरकारी आवास व्यक्ति से नहीं, पद से जुड़ा होता है। दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों के बीच इसे अपनी राजनीतिक जीत की तरह प्रस्तुत करेंगे लेकिन जनता के लिए असली प्रश्न यह नहीं है कि बंगले में कौन रहा और कौन जाएगा। असली प्रश्न यह है कि क्या सार्वजनिक संस्थाएं पहले से अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बन रही हैं?

लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी पहचान बंगले नहीं, बल्कि संस्थाओं की मजबूती होती है। जिस दिन सरकारी आवास का हस्तांतरण सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बन जाएगा और वह राजनीतिक प्रतिष्ठा का विषय नहीं रहेगा, उस दिन भारतीय लोकतंत्र एक कदम और परिपक्व हो जाएगा।

10, सर्कुलर रोड का पता अब बदल जाएगा। वहां नए लोग आएंगे, नई राजनीतिक बैठकों का दौर शुरू होगा। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक स्थायी सवाल छोड़ दिया हैकृक्या हमारी राजनीति सार्वजनिक संपत्ति को सचमुच जनता की संपत्ति मानने के लिए तैयार है, या वह अब भी उसे सत्ता के प्रतीक के रूप में देखती है? यही सवाल इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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