ज्ञान चंद पाटनी
मणिपुर फिर हिंसा की चपेट में है। राज्य के बिष्णुपुर जिले के एक छोटे से गांव में 7 अप्रेल को एक रॉकेटनुमा वस्तु के विस्फोट में दो निर्दाेष बच्चों की जान चली गई। इस हमले के बाद जहां इंफाल में वंगखेई इलाके में भारी विरोध प्रदर्शन हुए और झड़पों में 3 लोगों की मौत हो गई। इस बीच मणिपुर के उखरुल जिले में पेट्रोलिंग ड्यूटी पर तैनात बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स के एक कांस्टेबल की गोली मारकर हत्या कर दी गई। राज्य की कुल आबादी महज 32 लाख के आसपास है। देश के इस छोटे से हिस्से में तीन साल से हिंसा हो रही है। एक बार लगा था कि अब मणिपुर में शांति हो गई है, लेकिन यहां फिर से हो रही हिंसा की वारदातों से साफ है कि अभी लोगों के बीच अविश्वास बना हुआ है। इससे राज्य सरकार ही नहीं, केंद्र सरकार की कार्यशैली पर भी सवालिया निशान लग रहा है।
गौरतलब है कि अप्रेल 2023 में मणिपुर हाई कोर्ट ने एक आदेश जारी किया था जिसमें राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की संभावना पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। यह आदेश ऐसी चिंगारी साबित हुआ, जिसने समूचे मणिपुर को हिंसा की आग में धकेल दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद हाई कोर्ट के इस निर्देश को रद्द कर दिया गया लेकिन पहाड़ी इलाके के आदिवासी समूहों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। मैतेई समुदाय ने जवाबी प्रदर्शन किए। इस हिंसा में अब तक 260 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 60,000 से ज़्यादा लोगों को विस्थापित होकर अलग-अलग राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी है।
असल में मणिपुर की तकदीर उसकी भौगोलिक और जातीय बनावट से भी जुड़ी हुई है। इम्फाल की उपजाऊ घाटी में मैतेई समुदाय रहता है, जिसकी राज्य की आबादी में लगभग 53ः हिस्सेदारी है। ये हिंदू या सनामाही धर्म को मानते हैं। पहाड़ी इलाके में नगा और कुकी जनजातियों के लोग रहते हैं, इनके पास राज्य की कुल भूमि का लगभग 90ः हिस्सा है और ये अधिकतर ईसाई धर्म के अनुयायी हैं। वर्ष 1960 के मणिपुर लैंड रेवेन्यू एंड लैंड रिफॉर्म्स एक्ट के तहत इस इलाके में गैर‑जनजातियों को जमीन खरीदने की मनाही है। मैतेई समुदाय को ओबीसी की श्रेणी में रखा गया। इससे समयकृसमय पर यहां टकराव की स्थिति बनती रही है।
मैतेई समुदाय के संगठन अलग राजनीतिक स्वायत्तता के लिए लड़ रहे हैं, जबकि नगा समुदाय से जुड़े संगठन विस्तृत नगालैंड के सपने को पूरा करने को लेकर सक्रिय हैं। उधर कुकी जनजातियों ने “कुकीलैंड” या जूमलैंड जैसे स्वायत्त प्रशासनिक क्षेत्र की मांग को अपने दर्जनों संगठनों के माध्यम से आगे बढ़ाया। इन संघर्षों के बीच 1980 से 2004 तक लागू रहा आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट और सुरक्षा बलों से जुड़े कथित अत्याचारों ने जनता के मन में राज्य के प्रति घृणा और अविश्वास का भाव पैदा कर दिया दी। म्यांमार के गृहयुद्ध के कारण यहां आए चिन‑कुकी शरणार्थी नई समस्या बन गए। इसके साथ‑साथ उच्च पर्वतीय इलाकों में अफीम की खेती और नशीले पदार्थों की तस्करी ने राज्य को एक अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क से जोड़ दिया। इन गतिविधियों के लिए अक्सर कुकी समुदाय पर आरोप लगाए गए। सरकार और सुरक्षा बलों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठे।
असल में मैतेई समुदाय ने 2012 से ही अपनी ओबीसी की स्थिति को बदलने और अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग शुरू कर दी थी, जिससे टकराव का माहौल बन रहा था। कुकी और नगा जनजातियां डर रही थीं कि अगर मैतेई समुदाय को एसटी का दर्जा मिल गया तो वे भी पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदने लगेंगे और धीरे‑धीरे अपनी जनसंख्या के आधार पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेंगे। इससे इन दोनों समुदायों के बीच दूरी बन गई। राजनीति ने इस दूरी को कम करने के बजाय बढ़ाया जिससे आपसी संघर्ष की स्थिति बनी। अब भी वहां समुदायों के बीच अविश्वास का माहौल बना हुआ है।
गौरतलब है कि वर्ष 2017 में पहली बार मणिपुर में बीजेपी की सरकार बनी थी, मुख्यमंत्री के रुप में एन. बीरेन सिंह ने कार्यभार संभाल था। पांच साल बाद 2022 में फिर बीजेपी की सत्ता में वापसी हुई और दूसरी बार एन. बीरेन सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनके निर्णयों और बयानबाजी ने पहाड़ी इलाके के अदिवासियों के बीच अविश्वास को बढ़ाया। कुकी लोगों को ष्अवैध प्रवासीष्, ष्नार्काे-आतंकवादीष् और जंगलों को तबाह करने वाले के तौर पर पेश किया गया। मैतेई संगठनों ने इस नैरेटिव को मजबूत किया। इस बीच मणिपुर हाईकोर्ट के निर्देश ने आग में घी का काम किया। इस आदेश ने राज्य के भीतर ऐसी आग लगा दी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अप्रभावी करने के बावजूद रोका नहीं जा सका।
वर्ष 2024 और 2025 के बीच हिंसा की तीव्रता तो धीरे‑धीरे कम होती गई, लेकिन हाल ही हुई हिंसा से साबित हो गया है कि मणिपुर भीतर ही भीतर सुलग रहा है। फरवरी 2025 में मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। राष्ट्रपति शासन की समाप्ति के बाद फरवरी 2026 में वाई.खेमचंद सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार अभी जन विश्वास नहीं जीत पाई है। राहत शिविरों में अब भी हजारों लोग रह रहे हैं। राज्य के आर्थिक हालात बिगड़ रहे हैं।
साफ है कि मणिपुर के हालात राख के नीचे छिपी चिंगारी जैसे हैं, जो मौका मिलते ही आग का रूप ले लेती है। राज्य में शांति बहाल करने के लिए सरकार और सुरक्षा बलों को लूटे गए हथियारों की बरामदगी के लिए जोरदार अभियान चलाना होगा। राहत शिविरों में राहत और भोजन की व्यवस्था को मजबूत किया जाए। राज्य सरकार और सुरक्षा बल इस तरह से काम करें कि जनता को ऐसा न लगे कि वे अपने ही नागरिकों के खिलाफ कार्य कर रहे हैं।
जरूरत है एक ईमानदार, खुले और निष्पक्ष संवाद कीकृजिसमें मैतेई, कुकी, नगा और अन्य छोटे समुदायों की आवाज बराबर सुनी जाए। ऐसे निकाय बनाए जाएं जिनमें महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सभी शामिल हों। केंद्र और राज्य सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि महज ताकत के बल पर वहां शांति कायम नहीं की जा सकती। जरूरत है ऐसी नीतियों की जो जमीनी बदलाव लाएं। शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी के बीच सहिष्णुता की बुनियाद बनाने पर ध्यान दिया जाए। यदि नेता मणिपुर और वहां की जनता के हितों को ध्यान में रखकर काम करें तो राज्य में फिर से शांति लौट सकती है। वोटों के लिए ध्रुवीकरण की राजनीति से सत्ता तो पाई जा सकती है, लेकिन शांति कायम नहीं की जा सकती। ऐसी राजनीति देश और जनता के हित में नहीं है।
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