गौतम चौधरी
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विशेषकर इज़रायल, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच टकराव को लेकर भारत में महँगाई की आशंकाएँ फिर सुर्खियों में हैं। एक आर्थिक मामलों के स्वतंत्र संगठन की मुख्य अर्थशास्त्री अदिती नायर ने दावा किया है कि चालू वित्तवर्ष में 4-5 की दर से महँगाई बढ़ने का अनुमान है। यह केवल बहस का विषय नहीं है, इसे एक प्रकार की चेतावनी भी समझा जाना चाहिए। यह बहस यहीं खत्म नहीं होती। असली प्रश्न यह है कि क्या हम हर बार वैश्विक संकटों को ही दोष देकर अपनी नीतिगत कमजोरियों से नजरें चुराते रहेंगे या फिर कुछ ठोस उपाय की ओर भी ध्यान देंगे।
यह निर्विवाद है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयातित तेल पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का उछाल सीधे महँगाई को प्रभावित करता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यह तर्क एक “स्थायी बहाना” बन जाता है। दशकों से यह ज्ञात है कि तेल आयात निर्भरता भारत की आर्थिक एड़ी की एड़ी है, फिर भी यह निर्भरता आज भी लगभग 85 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में प्रगति जरूर हुई है, पर वह अभी तक इस स्तर की नहीं कि वैश्विक झटकों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित कर सके। इस स्थिति में भारत हर संकट के समय “प्रभाव झेलने वाला” बन जाता है, न कि “प्रभाव को सोखने वाला”।
Red Sea क्षेत्र में असुरक्षा और बढ़ती शिपिंग लागत को महँगाई का नया कारण बताया जा रहा है। लेकिन यह विश्लेषण आधा सच है। भारत में लॉजिस्टिक्स लागत पहले से ही GDP के 13-14 प्रतिशत के आसपास है, जो कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं से अधिक है। बंदरगाहों की क्षमता, सप्लाई चेन की दक्षता और कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क की कमी जैसी समस्याएँ लंबे समय से मौजूद हैं। ऐसे में वैश्विक संकट महँगाई का कारण कम, और हमारी संरचनात्मक कमियों का दर्पण अधिक बन जाता है।
महँगाई को “Imported inflation” कहकर अक्सर रुपये की कमजोरी पर चर्चा होती है। लेकिन यह मान लेना कि यह केवल डॉलर की मजबूती का परिणाम है, वास्तविकता को सरल बना देना है। बढ़ता चालू खाता घाटा, निर्यात की सीमित वृद्धि और विदेशी पूंजी पर निर्भरता, ये सभी संकेत देते हैं कि समस्या आंशिक रूप से घरेलू भी है। कमजोर मुद्रा केवल बाहरी दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन की कमी का भी संकेत होती है।
महँगाई नियंत्रण के लिए Reserve Bank of India और सरकार के पास कई उपकरण हैं, ब्याज दरें, कर नीति, सब्सिडी। लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो नीतियाँ अक्सर प्रतिक्रियात्मक प्रतीत होती हैं। केंद्रीय बैंक तब सक्रिय होता है जब महँगाई स्पष्ट रूप से बढ़ चुकी होती है, और सरकार ईंधन पर करों में कटौती से इसलिए बचती है क्योंकि इससे राजस्व प्रभावित होता है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि महँगाई का वास्तविक बोझ उपभोक्ता पर स्थानांतरित हो जाता है।
Reserve Bank of India का महँगाई लक्ष्य 4% (±2%) है, और इस दृष्टि से 4-5 प्रतिशत का स्तर “नियंत्रित” माना जा सकता है। लेकिन यह केवल सांख्यिकीय संतुलन है, सामाजिक वास्तविकता नहीं। मध्यम वर्ग की आय वृद्धि धीमी है, और निम्न आय वर्ग के लिए खाद्य व ईंधन की कीमतें कहीं अधिक निर्णायक होती हैं। इस कारण “हेडलाइन महँगाई” भले संतुलित दिखे, लेकिन वास्तविक जीवन में महँगाई का दबाव कहीं अधिक तीव्र महसूस होता है। पश्चिम एशिया का तनाव निश्चित रूप से महँगाई पर दबाव डालता है, लेकिन इसे पूरी तरह बाहरी कारण मान लेना आत्म-संतोष का संकेत होगा।
सच्चाई यह है कि तेल पर निर्भरता, कमजोर लॉजिस्टिक्स, रुपये की संवेदनशीलता और नीतिगत हिचकिचाहट, ये सभी समस्याएँ पहले से मौजूद हैं। युद्ध ने केवल इन्हें उजागर किया है।
अदिती नायर का अनुमान केवल एक चेतावनी है, महँगाई बढ़ सकती है। लेकिन इस चेतावनी का सही अर्थ यह है कि भारत को अपनी आर्थिक संरचना की गहराई में झांकना होगा। यदि हर बार वैश्विक संकटों को दोष देकर आगे बढ़ा गया, तो महँगाई एक अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि स्थायी चुनौती बन जाएगी। और तब 4-5 प्रतिशत का स्तर भी “सामान्य” नहीं, बल्कि एक नए आर्थिक दबाव का संकेत होगा।
