जयसिंह रावत
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बैनर तले युवाओं के अभूतपूर्व और स्वतःस्फूर्त आंदोलन की असाधारण सफलता ने देश के राजनीतिक गलियारों को हिलाकर रख दिया है। किसी स्थापित राजनीतिक झंडे, जाने-पहचाने चेहरे या पारंपरिक सांगठनिक ढांचे के बिना केवल डिजिटल मंचों से उपजे इस जन-आक्रोश के आगे अंततः सरकार को घुटने टेकने और झुकने पर मजबूर होना पड़ा। यह अभूतपूर्व सफलता इस बात की स्पष्ट और गंभीर मुनादी है कि भारतीय राजनीति अब एक बिल्कुल नए और निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है। वह दौर, जहाँ सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अब जन-आकांक्षाओं को अपनी शर्तों पर नियंत्रित करने, दबाने या टालने का दावा नहीं कर सकते।
इक्कीसवीं सदी में सूचना महाक्रांति ने जनमत निर्माण और राजनीतिक भागीदारी के पूरे पारंपरिक स्वरूप को बुनियादी रूप से बदल कर रख दिया है। चुनावी सफलता, मजबूत सांगठनिक ढांचा, अनुशासित कार्यकर्ता तंत्र और संसाधनों के बावजूद अब कोई भी राजनीतिक दल जनभावनाओं को पूरी तरह नियंत्रित करने में सक्षम नहीं है। इस स्वतःस्फूर्त युवा आंदोलन ने यह साफ कर दिया है कि बिना किसी स्थापित कमान या औपचारिक संगठन के भी लाखों लोग एक साझा मुद्दे पर रातों-रात एकजुट होकर सत्ता को जवाबदेह बना सकते हैं। सोशल मीडिया ने हर नागरिक को जनमत का एक सक्रिय वाहक और निर्माता बना दिया है। यह बदलता परिदृश्य सभी राजनीतिक दलों के लिए स्पष्ट संकेत है कि आने वाले समय की राजनीति केवल नारों और प्रबंधन से नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, पारदर्शिता और त्वरित संवेदनशीलता पर ही टिकी होगी।
भारत में आंदोलनों का एक बेहद समृद्ध और जीवंत इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1970 के दशक का ऐतिहासिक जेपी आंदोलन, मंडल आयोग विरोधी प्रदर्शन, राम मंदिर आंदोलन, अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और हाल का किसान आंदोलनकृइन सभी बड़े जन-उभारों में एक बात समान थी। इनका एक स्पष्ट, दृश्यमान और स्थापित नेतृत्व हुआ करता था। उनके पास एक औपचारिक संगठन या संयुक्त मोर्चा होता था और सरकारें भी प्रतिनिधियों के माध्यम से बातचीत करती थीं। परंतु आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।
डिजिटल तकनीक और इंटरनेट ने जनसंपर्क के इस पारंपरिक स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। अब किसी एक ज्वलंत मुद्दे पर देशभर के लोग बिना किसी केंद्रीय नेतृत्व या औपचारिक संगठन के एक-दूसरे से सीधे जुड़ सकते हैं। ऐसे आंदोलनों की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इन्हें किसी एक राजनीतिक दल का श्प्रायोजित आंदोलनश् कहकर खारिज करना या किसी एक प्रमुख नेता को निशाना बनाकर उसकी धार कुंद करना अब सत्ता के लिए आसान नहीं रह गया है।
हाल ही में हुए इस व्यापक विरोध प्रदर्शन को केवल किसी एक परीक्षा के रद्द होने, भर्ती प्रक्रिया की धांधली या किसी तात्कालिक निर्णय तक सीमित करके देखना बड़ी राजनीतिक भूल होगी। इन स्वतःस्फूर्त प्रदर्शनों के पीछे युवा पीढ़ी की वे गहरी चिंताएं हैं, जो लंबे समय से सतह के नीचे उबल रही थीं। रोजगार के लगातार सिमटते अवसर, प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार सामने आने वाली अनियमितताएं, सरकारी नियुक्तियों में अंतहीन विलंब, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अपने भविष्य को लेकर गहराती असुरक्षा की भावना-इन सबने मिलकर असंतोष का एक बड़ा गुबार पैदा किया है।
भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे युवा देशों में माना जाता है। यह विशाल युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी पूंजी है। लेकिन यदि युवाओं की बढ़ती आकांक्षाओं और उन्हें मिलने वाले वास्तविक अवसरों के बीच की खाई लगातार चौड़ी होगी, तो उसका सीधा असर देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता पर पड़ना स्वाभाविक है। आज का जागरूक युवा अब केवल राजनेताओं के भाषणों या राजनीतिक आश्वासनों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। वह वर्तमान में ठोस अवसर, परीक्षा प्रणाली में शत-प्रतिशत पारदर्शिता और त्वरित परिणाम चाहता है।
सत्तारूढ़ दल की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल संगठन, बूथ स्तर तक फैले कार्यकर्ता और अचूक माना जाने वाला चुनावी प्रबंधन है। लेकिन जब जन-विरोध किसी स्थापित विपक्षी दल के बजाय समाज के भीतर से स्वतःस्फूर्त ढंग से उभरता है, तब चुनौती का स्वरूप बदल जाता है। ऐसे आंदोलनों में विरोध का कोई एक चेहरा नहीं होता, जिससे बंद कमरों में वार्ता की जा सके। इसलिए इन्हें केवल श्विपक्ष की साज़िशश् बताकर खारिज करना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से घाटे का सौदा साबित होता है। ऐसी स्थितियों में सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ जनता का विश्वास बनाए रखने की कठिन परीक्षा होती है। लोकतंत्र में जनविश्वास ही किसी भी चुनी हुई सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी होता है।
दूसरी तरफ, ऐसे नेता-विहीन आंदोलन विपक्षी दलों को राजनीतिक अवसर तो अवश्य प्रदान करते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि विपक्ष स्वतः ही उनका स्वाभाविक नेतृत्व हासिल कर लेता है। यदि विपक्षी दल इन जनांदोलनों के साथ संवेदनशीलता से खड़े दिखाई देते हैं, तो उन्हें अप्रत्यक्ष राजनीतिक लाभ मिल सकता है परंतु यदि वे इन आंदोलनों को पूरी तरह हथियाने या अपने चुनाव प्रचार में बदलने की कोशिश करते हैं, तो इससे आंदोलन की अपनी निष्पक्षता और आम जनता में उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। यानी यह नया परिदृश्य सत्तापक्ष और प्रतिपक्षकृदोनों से ही अधिक परिपक्वता और संवेदनशीलता की मांग करता है।
सूचना महाक्रांति ने मुख्यधारा के मीडिया के एकाधिकार को भी समाप्त कर दिया है। अतीत में सूचनाओं के प्रवाह पर जिन माध्यमों का नियंत्रण था, उन पर समय-समय पर राजनीतिक या व्यावसायिक दबावों के आरोप लगते रहे हैं। आज स्मार्टफोन हाथ में लिए खड़ा लगभग हर नागरिक एक संभावित श्सिटिजन रिपोर्टरश् है। कहीं भी घटित होने वाली घटना या प्रशासनिक लापरवाही का दृश्य कुछ ही पलों में दुनिया के सामने आ जाता है। यही कारण है कि अब किसी घटना को दबा देना या केवल एकतरफा कहानी को स्थापित कर पाना बेहद कठिन हो गया है। हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि यही मंच कभी-कभी अपुष्ट सूचनाओं और अफ़वाहों का जरिया भी बन जाता है, जिससे निपटना समाज और प्रशासन दोनों के लिए एक चुनौती है।
भारतीय राजनीति दशकों तक मुख्य रूप से जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और अस्मिता पर आधारित मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इन विषयों का महत्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन अब रोजगार, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही और अवसरों की समानता जैसे मुद्दे तेजी से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। विशेषकर युवा मतदाता अब राजनीतिक दलों का मूल्यांकन केवल नारों से नहीं, बल्कि उनके वर्तमान प्रदर्शन और कार्यशैली के आधार पर कर रहा है।
किसी भी जीवंत लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि उसकी चेतना का प्रमाण होते हैं। यदि जनता का विरोध संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर हो, तो उसे लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति माना जाना चाहिए। सरकारों के लिए ऐसे आंदोलन केवल चुनौती नहीं होते, बल्कि अपनी नीतियों की कमियों को पहचानने और जनता की चिंताओं को समझकर सुधार करने का अवसर भी होते हैं।
भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का साक्षी है कि यहाँ कोई भी राजनीतिक दल या नेता स्थायी रूप से अजेय नहीं रहा है। 1977, 1989 और 2014 के राजनीतिक बदलाव इसी शाश्वत सत्य की पुष्टि करते हैं। जब जनता का मन बदलता है, तो बड़े से बड़े सांगठनिक समीकरण ढह जाते हैं। श्कॉकरोच आंदोलनश् जैसे हालिया घटनाक्रम यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि भारतीय राजनीति एक नए दौर के मुहाने पर खड़ी है। अब केवल भारी-भरकम संगठन और चुनावी प्रबंधन ही पर्याप्त नहीं होंगे; सुशासन, जवाबदेही और जनता के प्रति संवेदनशीलता ही वास्तविक ताकत बनेगी। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय सदैव जनता का होता है, और जो दल समय रहते इस बदलते मनोविज्ञान को समझ लेगा, वही इस नए दौर में प्रासंगिक बना रहेगा।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
