EPFO के नए नियम : आठ करोड़ कामगारों का भविष्य खतरे में

ज्ञान चंद पाटनी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) से जुड़े हालिया बदलावों से निजी क्षेत्र के आठ करोड़ कर्मचारियों को झटका लगा है। नई व्यवस्था

मनोरंजन उद्योग/ OTT पर पहचान बना रही हैं, भूमिका गुरुंग

सुभाष शिरढोनकर एक्‍ट्रेस भूमिका गुरूंग ने धारावाहिक ‘बस इतना सा ख्वाब’ (2024-2025) में टीवी पर अक्सर दिखाए जाने वाले त्याग करने वाली बहू के पारम्परिक

हेमंत सरकार का दूसरा कार्यकाल : उम्मीदों की राजनीति से परिणाम तक

अक्षपाद् गौतम झारखंड की राजनीति में हेमंत सोरेन का दूसरा कार्यकाल केवल सत्ता की वापसी नहीं है; यह जनादेश का दूसरा अवसर भी है। जनता

₹5,700 करोड़ का समझौता : क्या NMC प्रकरण केवल बैंकिंग संकट है या फिर कुछ और?

गौतम चौधरी भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल वित्तीय संस्थान नहीं हैं; वे करोड़ों नागरिकों की बचत, सरकार की आर्थिक नीतियों और देश की

बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रस्तावित नई नियमावली से अभ्यर्थी चिंतित

पुष्पांशु पांडेय बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक नियुक्ति हेतु प्रस्तावित नई नियमावली से अभ्यर्थीगण चिंतित हैं। इसी के दृष्टिगत बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालय के

व्यापारियों के भरोसे सरकारी शिक्षा : व्यवस्था की रीढ़ या नीतिगत लाचारी?

सरदूल सिंह राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बुनियादी और भौतिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए शिक्षा विभाग लंबे समय से दानदाताओं के सहयोग पर निर्भर

हेमंत का शासन मॉडल : जल, जंगल, जमीन की राजनीति अब झारखंड के सुशासन की कसौटी है

अक्षपाद् गौतम झारखंड का निर्माण केवल एक नए राज्य के गठन की प्रशासनिक घटना नहीं था, उसके पीछे लगभग एक सदी का संघर्ष था। यह

बुलडोजर का कानून : क्या इस प्रकार का न्याय किसी लोकतंत्र का आदर्श हो सकता है?

गौतम चौधरी लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद में नहीं, सड़क पर होती है; अदालतों में नहीं, बल्कि उस क्षण होती है जब राज्य अपने सबसे

तन्जीह बनाम तश्बीह : इस्लामी धर्मशास्त्र की दो व्याख्यात्मक परंपराएँ, इसे तसल्ली से समझना होगा

#वृतांतों_की_यात्रा/ #दरभंगा/ पार्ट 01/ #कांच की #चूड़ियां/ गौतम चौधरी ’‘लैसा कमिस्लिही शै‘उन’’: उसके समान कोई भी वस्तु नहीं है। (सूरह अश-शूरा 42ः11) इस्लाम की संपूर्ण

बंगला बदला लेकिन सवाल नहीं, सरकारी आवास पर सियासत से ज्यादा ज़रूरी है जवाबदेही

कुमार कृष्णन राजनीति में कुछ पते केवल डाक पहुंचाने का माध्यम नहीं होते, वे इतिहास, सत्ता और स्मृतियों के प्रतीक बन जाते हैं। पटना का

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