पर्यावरण चिंतन : ‘एक पेड़ माँ के नाम’

पर्यावरण चिंतन : ‘एक पेड़ माँ के नाम’

साहित्यकार का दायित्वबोध बहुत व्यापक होता है। साहित्यकार अपनी कलम से अपने समय का वर्णन शब्दमाला के माध्यम से करता है। साहित्यकार का एक-एक शब्द वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढियों के लिए आदर्श और मार्गदर्शक का काम करता है। साहित्यकार अपने समय की शिक्षा, समाज, पर्यावरण आदि सभी को समाहित करके लिखने का प्रयास करता है। वह अग्नि, भूमि, जल, नभ, वायु पांच तत्वों के शुद्धीकरण की बात सोचता है, उसका चिंतन-मनन करता है। अपने साहित्य में उसको स्थान देता है।

पंच तत्व से बना यह मानव शरीर भी इन सभी तत्वों की शुद्धि के साथ ही शांत,पावन, पवित्र रह सकता है। इनमें से किसी की भी अशुद्धता बढ़ जाती है तो पूरा संतुलन बिगड़ जाता है।अथर्ववेद (भूमि सूक्त) में लिखा है कि माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः अर्थातयह भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ। दूसरे शब्दों में कहें कि मनुष्य और प्रकृति के बीच के अटूट, भावनात्मक और जैविक रिश्ते है। जैसे एक बच्चा अपनी माँ से जुड़ा होता है, वैसे ही हर एक मनुष्य का कर्तव्य इस धरती के प्रति है। इसे किसी भी प्रकार के प्रदूषण से बचाए रखना हमारा कर्तव्य है।

हमारी ज्ञान परंपरा में हमारे संतो ने भगवान की कथाके माध्यम से हमें बताते हुए प्रकृति, पर्यावरण के बारे में पूरा ज्ञान दिया है। विचार करें तो हमारे देवी-देवता, साधु-संत, महात्मा-तपस्वी आदि सभी पर्वतों, पवित्र नदियों, पूज्य वृक्षों के नीचे बैठकर साधना करते रहे हैं। गीता के अध्याय दस के 26वें श्लोक में भगवान कहते हैं कि, अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदःद्य अर्थातसमस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ, देवर्षियों में नारद मुनि।

विचार करें तो भगवान प्रकृति के कण-कण में व्याप्त हैं। हमारे ऋषियों-मुनियों ने आयुर्वेद में प्रकृति के हर एक वृक्ष की जड़ से लेकर पत्ते तक के हर एक अंग पर शोधपरक कार्य किया है। किस से कौन सी औषधियाँ बनती है, कहां-कहां काम आती है, बताया समझाया है। दूसरी ओर विचार करें तो हमारे देवी-देवताओं की पूजा के समय भी हमें अलग-अलग वृक्षों के पत्तों की जरूरत होती है। हमारी ज्ञान परंपरा, पूजा पद्धति, भक्ति साधना आदि में भी वृक्षों का बड़ा महत्व है।

‘एक पेड़ माँ के नाम’ पुस्तक के रचयिता डॉ. वेदप्रकाश वत्स जी वर्तमान साहित्य चिंतन का बड़ा नाम है। आपने इस पुस्तक में भारतीय ज्ञान परंपरा के स्रोतों से बात को शुरू किया है। वृक्षों का महत्व देवी-देवताओं, वेदों आदि से शुरू कर वर्तमान सामाजिक स्थिति तक अलग-अलग अध्यायों में बताने और समझने का प्रयास किया है। पुस्तक का सबसे बड़ा सफल पक्ष यह है कि डॉ. वेदप्रकाश जी भारतीय ज्ञान परंपरा से सीधे जुड़े हुए हैं।

वर्तमान के संतों का आशीर्वाद आपको मिलता रहा है। बाबा केदारनाथ, श्री बदरी विशाल से लेकर कन्याकुमारी तक के तीर्थों के दर्शन किए हैं और ऐतिहासिक स्थलों को देखने-समझने का अवसर मिला है। आप ऋषिकेश, हरिद्वार, मथुरा, वृंदावन, प्रयागराज, चित्रकूट, गंगासागर आदि तीर्थों का भ्रमण कर पवित्र नदियों पर चिंतन करके लिखते रहते हैं।आपने इन नदियों के किनारे लगे वृक्षों को भी देखा-समझा है। समयानुसार समाचारपत्रों में आपने नदियों, वृक्षों आदि पर लेख भी लिखे हैं।

पुस्तक के लेखकीय में लिखा है कि, किसी भी विषय पर लिखने के कुछ कारण अथवा निहितार्थ होते हैं। एक पेड़ माँ के नाम यह पुस्तक प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं स्वामी चिदानंद सरस्वती जी जैसे संतों के उस विचार, प्रयास एवं संकल्प से प्रेरित है जिसमें प्रकृति-पर्यावरण की चिंता है। उस चिंता से आगे बढ़ते हुए प्रकृति-पर्यावरण के संरक्षण-संवर्धन एवं प्रदूषण से मुक्ति हेतु धरातल पर निरंतर प्रयास हैं और इन प्रयासों की उत्तरोत्तर वृद्धि हेतु जन भागीदारी का आवाह्न है। आपने अपनी साहित्यिक लंबी यात्रा के साथ इस पुस्तक की यात्रा को लिखने का प्रयास किया है। यह पुस्तक शोधपरक है, इसका एक-एक शब्द व्यक्ति को सोचने-समझने को आतुर करता है।

‘एक पेड़ मां के नाम’ यह मंत्र देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने दिया। इसमें पांच शब्द हैं, यह पांच शब्द ही वास्तविक मंत्र हैं। पंच तत्व से शरीर बना है और पंचतत्व से ही प्रकृति है। इन पांच शब्दों को लेकर एक पुस्तक का निर्माण करना, उसके बारे में चिंतन-मनन करना, उसकी व्यापकता तथा समाज में उपयोगिता को समझना एक साहित्यकार का दायित्वबोध है। पुस्तक के पाँचवें अध्याय में मन की बात में पर्यावरण चिंतन को लिया गया है।

आपने रेडियो पर प्रसारित यशस्वी प्रधानमंत्री जी की मन की बात के अलग-अलग प्रसारणों में प्रकृति चिंतन को बताने-समझाने का प्रयास किया है।पुस्तक में आपका साहित्य चिंतन एक-एक शब्द पर चला है। पंच तत्व की बात पहले अध्याय से लेकर पुस्तक के अंत तक बराबर चलती रही है। एक विचारक ही दूरगामी सोच के साथ समाज कल्याण की सोचता है। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री के शब्दों को पुस्तक रूप में जन मानस के सामने लेकर आना एक साहित्यकार की बड़ी कला है।यह उनके सोचने-समझने का एक व्यापक तरीका है।

इस पुस्तक को देश के सभी विद्वानों और बच्चों को जरूर पढ़ना चाहिए। इस पुस्तक पर चर्चा होनी चाहिए। भारत सरकार के सभी मंत्रालयों में यह पुस्तक पहुँचनी चाहिए, जिससे कि लोगों को पता चले और एक संदेश मिले की शब्द ब्रह्म है। पांच शब्द और उस पर एक पुस्तक कैसे समाज के सामने आती है। यह हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा का हिस्सा है। एक आदर्श लेखक समाज के सामने सच्चा आदर्श खड़ा करता है। वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के लिए पुस्तक का एक-एक शब्द सार्थक है। यह पुस्तक समाज के हर वर्ग के लिए महत्वपूर्ण है, हमें इसे जरूर पढ़ना चाहिए।डॉ. वेदप्रकाश जी की इस पुस्तक के लिए बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं। हमें अपने चारों ओर वृक्ष लगाने होंगे।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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