रुपया, चुनाव और अविश्वास की राजनीति : संदर्भों के बीच तथ्य, आशंका और वास्तविकताएँ

रुपया, चुनाव और अविश्वास की राजनीति : संदर्भों के बीच तथ्य, आशंका और वास्तविकताएँ

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सार्वजनिक विमर्श में अक्सर ऐसे दावे सामने आते हैं, जो आर्थिक तथ्यों, राजनीतिक आरोपों और जनभावनाओं का मिश्रण होते हैं। हाल के दिनों में भारतीय रुपये की गिरावट को लेकर भी इसी प्रकार की चर्चाएँ तेज हुई हैं। कुछ लोगों का दावा है कि दुनिया की अधिकांश मुद्राएँ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत हो रही हैं, जबकि भारतीय रुपया लगातार कमजोर पड़ रहा है। इसके पीछे चुनावी खर्च, विदेशी तकनीकी कंपनियों को भुगतान और सत्ता-पूंजी गठजोड़ जैसी व्याख्याएँ भी प्रस्तुत की जा रही हैं। लेकिन किसी भी गंभीर विषय की तरह इस प्रश्न को भी भावनाओं या राजनीतिक पूर्वाग्रहों के बजाय तथ्यों और तर्कों के आधार पर समझना आवश्यक है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि वैश्विक मुद्रा बाजार अत्यंत जटिल और बहुआयामी होता है। किसी एक समयावधि में डॉलर कुछ मुद्राओं के मुकाबले कमजोर पड़ सकता है, जबकि उसी अवधि में कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं (Emerging Markets) की मुद्राएँ दबाव में रह सकती हैं। इसलिए यह कहना कि “सारी दुनिया की मुद्राएँ मजबूत हो रही हैं और केवल रुपया गिर रहा है”, वास्तविकता का सरलीकृत चित्रण है।

भारतीय रुपया लंबे समय से एक नियंत्रित अवमूल्यन (Managed Depreciation) की प्रक्रिया से गुजरता रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक विनिमय दर को पूरी तरह बाजार के भरोसे नहीं छोड़ता, बल्कि अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए समय-समय पर हस्तक्षेप भी करता है। इसका उद्देश्य मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखना होता है।

रुपये की विनिमय दर को प्रभावित करने वाले कई वास्तविक आर्थिक कारण हैं। भारत विश्व के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है। तेल का भुगतान डॉलर में किया जाता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं या भू-राजनीतिक तनाव पैदा होते हैं, तब डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ता है।

इसी प्रकार वैश्विक अनिश्चितता के समय विदेशी निवेशक अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी बाजारों की ओर लौटते हैं। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी का बहिर्गमन होता है और स्थानीय मुद्राएँ कमजोर पड़ सकती हैं।

भारत का व्यापार घाटा भी एक महत्वपूर्ण कारक है। जब आयात निर्यात की तुलना में अधिक होता है, तब विदेशी मुद्रा की अतिरिक्त आवश्यकता उत्पन्न होती है, जिसका प्रभाव विनिमय दर पर पड़ता है। इसके अतिरिक्त वैश्विक युद्ध, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीतियाँ तथा अंतरराष्ट्रीय निवेश प्रवाह जैसी परिस्थितियाँ भी रुपये की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन तथ्यों को देखते हुए केवल यह कहना कि “चुनाव हो रहे हैं इसलिए रुपया गिर रहा है”, आर्थिक दृष्टि से पर्याप्त और संतोषजनक व्याख्या नहीं कही जा सकती।

रुपये की गिरावट को लेकर एक दूसरा दावा यह भी सामने आता है कि विदेशी चुनावी सॉफ्टवेयर, इजराइली या चीनी तकनीकी कंपनियों को किए गए भुगतान अथवा चुनाव प्रबंधन पर भारी डॉलर खर्च के कारण भारतीय मुद्रा कमजोर हो रही है।

यहाँ तथ्य और अनुमान के बीच स्पष्ट भेद करना आवश्यक है। अब तक ऐसे दावों के समर्थन में कोई सार्वजनिक, विश्वसनीय और ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, जिनके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि रुपये की कमजोरी का प्रमुख कारण चुनावी तकनीक या विदेशी डिजिटल सेवाओं पर खर्च किया गया धन है। इस प्रकार के आरोप अधिकतर राजनीतिक संदेहों और षड्यंत्रात्मक व्याख्याओं की श्रेणी में आते हैं।

हाँ, यह अवश्य सत्य है कि आधुनिक लोकतंत्रों में चुनावी अभियानों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। डेटा एनालिटिक्स, सोशल मीडिया प्रबंधन, डिजिटल प्रचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मतदाता विश्लेषण तथा विभिन्न तकनीकी सेवाओं का उपयोग दुनिया भर में बढ़ा है। ’’कैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण’’ ने भी यह प्रश्न उठाया था कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में डेटा और तकनीक का दुरुपयोग किस सीमा तक संभव है।

भारत में भी राजनीतिक दलों द्वारा डिजिटल प्रचार पर बड़े पैमाने पर खर्च किए जाने की चर्चाएँ समय-समय पर होती रही हैं। किंतु वहाँ से सीधे यह निष्कर्ष निकाल लेना कि रुपये का अवमूल्यन इसी कारण हुआ है, अभी तक प्रमाण-आधारित आर्थिक विश्लेषण नहीं माना जा सकता। भारत जैसा विशाल विदेशी मुद्रा बाजार किसी एक चुनावी व्यय से प्रभावित होने के बजाय व्यापक आर्थिक शक्तियों से संचालित होता है।

इस बहस का एक और पक्ष है, जो केवल मुद्रा विनिमय दर तक सीमित नहीं है। यह सत्ता, पूंजी और लोकतंत्र के संबंधों को लेकर उठने वाली चिंताओं से जुड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में बड़े उद्योग समूहों और सरकार के बीच निकटता को लेकर राजनीतिक बहस लगातार चलती रही है। आलोचकों का तर्क है कि आर्थिक संकटों का बोझ आम नागरिकों पर पड़ता है, जबकि बड़े कॉर्पाेरेट समूहों को अपेक्षाकृत अधिक संरक्षण और अवसर प्राप्त होते हैं।

दूसरी ओर सरकार समर्थक यह तर्क देते हैं कि बड़े उद्योग निवेश, रोजगार सृजन, बुनियादी ढाँचे के विकास और आर्थिक विस्तार के लिए आवश्यक हैं। उनके अनुसार निजी क्षेत्र की मजबूती के बिना उच्च विकास दर और वैश्विक प्रतिस्पर्धा संभव नहीं है।

सच्चाई शायद इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं स्थित है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वाभाविक है कि बड़े उद्योगों और सत्ता के संबंधों पर प्रश्न उठें, और उतना ही आवश्यक यह भी है कि उन प्रश्नों की जांच तथ्यों के आधार पर हो, न कि केवल राजनीतिक धारणाओं के आधार पर।

वास्तव में इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू रुपये की विनिमय दर नहीं, बल्कि समाज में बढ़ती आर्थिक असुरक्षा और लोकतांत्रिक अविश्वास की भावना है। जब महंगाई बढ़ती है, रोजगार के अवसर सीमित दिखाई देते हैं, मुद्रा कमजोर होती है और चुनावों में धनबल की भूमिका लगातार बढ़ती प्रतीत होती है, तब आम नागरिकों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या व्यवस्था वास्तव में जनसाधारण के हित में काम कर रही है या सत्ता और पूंजी के गठजोड़ के पक्ष में अधिक झुकी हुई है। यह प्रश्न लोकतंत्र में वैध है। किंतु किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श की शर्त यह है कि आलोचना और विश्लेषण के बीच संतुलन बना रहे।

रुपये की कमजोरी के पीछे वास्तविक आर्थिक कारण मौजूद हैंकृजैसे तेल आयात, व्यापार घाटा, वैश्विक निवेश प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियाँ। चुनावी वित्तपोषण, कॉर्पाेरेट प्रभाव और लोकतांत्रिक पारदर्शिता को लेकर उठने वाले प्रश्न भी अपने आप में महत्वपूर्ण और वैध हैं। लेकिन इन दोनों बातों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। जहाँ आर्थिक तथ्यों का मूल्यांकन आँकड़ों और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए, वहीं राजनीतिक आरोपों को भी ठोस साक्ष्यों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

लोकतंत्र में संदेह आवश्यक है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है तथ्य। क्योंकि अंततः मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहाँ नागरिक प्रश्न भी पूछते हैं और उत्तर भी प्रमाणों के आधार पर तलाशते हैं।

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