वीरेंद्र बंगरू
पिछले कुछ दिनों से तुलमुला स्थित खीर भवानी मंदिर की वार्षिक यात्रा में कश्मीरी पंडितों की भागीदारी को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई है। इस यात्रा को कश्मीर में मेल-मिलाप, सह-अस्तित्व और स्वागत के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर खीर भवानी तथा अन्य धार्मिक स्थलों के दर्शन के लिए आए कश्मीरी पंडितों की तस्वीरें, वीडियो और साक्षात्कार व्यापक रूप से साझा किए जा रहे हैं।
कई टिप्पणीकारों का मानना है कि सुरक्षा स्थिति में आए सुधार के मद्देनज़र यह यात्रा कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास के लिए सकारात्मक माहौल तैयार कर सकती है। कश्मीर के मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने भी सार्वजनिक रूप से इसका समर्थन किया है। उनका तर्क है कि कश्मीरी पंडितों को अलग-थलग टाउनशिप में बसाने के बजाय उनके मूल घरों और मोहल्लों में वापस लौटने का अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन यदि इस प्रश्न को थोड़ी गहराई से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि स्वागत और समर्थन की ये आवाज़ें अभी पूरे कश्मीरी मुस्लिम समाज की सामूहिक भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ये महत्वपूर्ण अवश्य हैं, किंतु संख्या और प्रभाव की दृष्टि से सीमित प्रतीत होती हैं। अतीत में भी ऐसी सद्भावनापूर्ण आवाज़ें मौजूद रही हैं, परंतु कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास के प्रश्न पर व्यापक सामाजिक सहमति आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती।
इस स्थिति के पीछे कुछ प्रमुख कारण समझे जा सकते हैं। ’’पहला, जनसांख्यिकीय और राजनीतिक आशंकाएँ।’’ समाज के एक हिस्से में यह चिंता मौजूद है कि कश्मीरी पंडितों की बड़े पैमाने पर वापसी से राजनीतिक प्रतिनिधित्व, स्थानीय शक्ति-संतुलन और संसाधनों के वितरण के वर्तमान समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
’’दूसरा, धार्मिक-सांस्कृतिक विशिष्टता की भावना।’’ कुछ वर्गों में यह आशंका भी दिखाई देती है कि गैर-इस्लामी धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक संस्थानों की पुनर्स्थापना उस दृष्टिकोण को चुनौती दे सकती है, जो कश्मीर को लगभग पूर्णतः मुस्लिम पहचान वाले क्षेत्र के रूप में देखता है।
’’तीसरा, संपत्ति और स्वामित्व के विवाद।’’ विस्थापन के बाद कश्मीरी पंडितों की अनेक संपत्तियों पर अतिक्रमण, अवैध कब्जे या स्वामित्व संबंधी विवादों की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में कुछ लोगों को यह आशंका हो सकती है कि वापसी की स्थिति में पुराने दावों और अधिकारों को लेकर नए विवाद उत्पन्न होंगे।
इन कारणों से यह स्पष्ट है कि कश्मीरी पंडितों की व्यापक और त्वरित वापसी आज भी एक जटिल सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बनी हुई है।
यह भी समझना आवश्यक है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी का प्रश्न केवल सद्भावना या सामाजिक इच्छा का विषय नहीं है। इसके लिए सुनियोजित और दीर्घकालिक सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी। मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना पुनर्वास की कोई भी योजना व्यावहारिक सफलता प्राप्त नहीं कर सकती।
केवल नागरिक समाज या व्यक्तिगत स्तर की सद्भावनाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि सामाजिक पूर्वाग्रह और जमीनी वास्तविकताएँ अक्सर ऐसे प्रयासों की सीमाएँ निर्धारित कर देती हैं। इसलिए एक संस्थागत और राज्य-समर्थित ढाँचा आवश्यक हैकृचाहे वह सुरक्षित आवासीय व्यवस्था हो, अतिक्रमित संपत्तियों के समाधान की प्रक्रिया हो, या कोई व्यापक पुनर्वास नीति।
इसके साथ-साथ आर्थिक एकीकरण भी पुनर्वास की सफलता की अनिवार्य शर्त है। रोजगार के अवसर, उद्यमिता को प्रोत्साहन, स्टार्ट-अप और स्वरोज़गार के लिए वित्तीय सहायता तथा सम्मानजनक आजीविका का वातावरण उपलब्ध कराना आवश्यक होगा। ऐसे कदम ही विस्थापित समुदाय के भीतर यह विश्वास पैदा कर सकते हैं कि उनकी वापसी केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थायी होगी।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि विश्वास का पुनर्निर्माण एक धीमी प्रक्रिया है। दशकों के विस्थापन, हिंसा और अविश्वास से उत्पन्न घाव कुछ वर्षों में नहीं भर सकते। कश्मीरी पंडितों की सार्थक वापसी और पुनर्स्थापना के लिए समय, धैर्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति और समाज के सभी वर्गों के सक्रिय सहयोग की आवश्यकता होगी।
खीर भवानी यात्रा निस्संदेह आशा का एक संकेत है, लेकिन इसे अंतिम समाधान का प्रमाण मान लेना जल्दबाज़ी होगी। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी, जब कश्मीरी पंडित बिना भय, बिना विशेष सुरक्षा और बिना असुरक्षा की भावना के अपने घरों, मोहल्लों और सामाजिक परिवेश में सम्मानपूर्वक जीवन जी सकेंगे।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
