सरदूल सिंह
भारत के संविधान की विशेषताएं जब पढ़ी और पढ़ाई जाती हैं तो उसमें दुनिया का सबसे विस्तृत, लिखित, लचीला और कठोर जिसमें मूल अधिकार, मूल कर्तव्य लिखित रूप में बताए गए हैं और जिसकी प्रस्तावना ‘‘हम भारत के लोग से शुरू होकर देश को संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है और नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सुनिश्चित करती है।’’
संविधान की प्रस्तावना पर गौर किया जाए तो इसमें दो शब्द ज्यादा ध्यान देने वाले हैं। पहला शब्द है समाजवादी तथा दूसरा है लोकतांत्रिक। जब हम समाजवाद शब्द का अर्थ और समाजवादी व्यवस्था के बारे में पढ़ने, जानने, समझने की कोशिश करते हैं तो पता लगता है कि जहां सारे उत्पादन के साधन और पूरी उत्पादन प्रक्रिया समाज के हित में की जाती है उसमें समाज का हित सर्वाेपरि होता है। व्यक्तिगत हित सर्वाेपरि नहीं होता है जिसमें समाज की मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सबको निशुल्क उपलब्ध करवाई जाती है। दूसरा नियम लागू किया जाता है कि उत्पादन प्रक्रिया में प्रत्येक व्यक्ति भाग लेगा अर्थात ‘‘योग्यता अनुसार काम और काम के अनुसार दाम’’ का नियम लागू किया जाता है।
भारत के संविधान को लागू हुई 76 वर्ष हो गए हैं तो अब इस बात पर ध्यान देना और इसका मूल्यांकन करना अति आवश्यक है कि क्या हम मूल प्रस्तावना में लिखे हुए शब्दों को धरातल पर उतार सके हैं? विशेष कर 1990 के उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण के दौर के बाद उत्पादन प्रणाली में धीरे धीरे सामाजिक और सार्वजनिक हित की बजाय व्यक्तिगत और निजी हित सर्वाेपरि होते गए। शिक्षा, चिकित्सा, जलदाय, परिवहन आदि में निजीकरण के लागू किए जाने के कानून के कारण यह सारी सुविधाएं सेव नहीं बल्कि व्यापार बना दी गई। निजी मुनाफों को बढ़ाने के लिए इन सेवाओं को प्राप्त करने के लिए महंगी कीमत देकर प्राप्त करने के कानून बनाए गए। जिससे गरीबी बढ़ती चली गई। असमानता बढ़ती गई। निजी मुनाफे बढ़ने के कारण एक तरफ धन के देर और धन कुबेर पैदा होते गए दूसरी तरफ अभावग्रस्त जिंदगी जीने वालों की संख्या अधिकांश होती चली गई । मध्यवर्गीय आए दिन फिसल कर अपने से निम्न स्तरीय गरीब और अभावग्रस्त श्रेणी में शामिल हो रहे हैं। वे छटपटा रहे हैं। कर्ज के बोझ तले दबता दबते केवल किश्तें भरने वाले बनकर रह गए हैं।
युवा पीढ़ी जिसको ‘‘योग्यता अनुसार काम और काम के अनुसार दाम’’ दिया जाना था, संविधान की प्रस्तावना के अनुरूप वे अभी तक इस अधिकार को प्राप्त नहीं कर पाए हैं। आए दिन भर्ती परीक्षाओं के नाम पर ठगे जा रहे हैं। अपनी योग्यता का हनन होता देख वे निराश परेशान हो रहे हैं। अनैतिक, आपराधिक, असामाजिक गतिविधियों में शामिल हो अपनी युवा शक्ति को नष्ट कर रहे हैं। जिस युवा शक्ति ने देश के विकास में भागीदार होकर अपने भविष्य को संवारना था वह भविष्य के अंधकार में खोते चले जा रहे हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण शब्द लोकतंत्र है। लोकतंत्र के दो घटक होते हैं पहला आर्थिक समानता और दूसरा राजनीतिक समानता। राजनीतिक स्तर पर संविधान के लागू होते ही प्रत्येक बालिक को मताधिकार के कानूनी अधिकार की समानता प्राप्त हो गई है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति के पास एक मत है। वह अपने मताधिकार का प्रयोग कर अपनी सरकार चुन सकता है। हालांकि इस कानून को भी डर, प्रलोभन, अभिज्ञता के हथियारों का उपयोग कर साधन संपन्न या वर्चस्व वाले लोग मोम की नाक बनाकर अपनी इच्छा अनुसार मोड रहे हैं,घुमा रहे हैं, तोड़ रहे हैं।
लोकतंत्र का दूसरा घटक होता है आर्थिक समानता जो समाज का अति महत्वपूर्ण घटक होता है। इस घटक के अनुसार आर्थिक रूप में समानता स्थापित करने के प्रयास किए जाते हैं और आर्थिक समानता स्थापित की जाती है लेकिन संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार में शामिल किए जाने के कारण बेतहाशा संपत्तियों का एकत्रीकरण किए जाने की सुविधाएं, छूटें, प्रत्यक्ष करों में छूट दिए जाने के कारण और श्रम कानून का झुकाव पूंजीपति या साधन संपन्न वर्ग की ओर किए जाने के कारण लोकतंत्र की यह भावना भी कुचल दी जाती है। परिणाम स्वरूप आज श्रम कानूनों को बदलकर निजी और ठेके पर आधारित काम करवाए जा रहे हैं। सेवा सुरक्षा और सेवा शर्तें मालिकों के हक में अपने निर्णय दे रही हैं। इसलिए समाज में एक तरफ बेतहाशा बेरोजगारी दूसरी तरफ काम करने वालों पर अत्यधिक बोझ, न्यूनतम वेतन से भी कम भुगतान, काम के दिन का विस्तार आदि देखा जा सकता है। इस प्रकार से दिनों दिन आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है।
ऐसी स्थितियों में आम नागरिक संविधान दिवस या गणतंत्र दिवस आदि के प्रति रुचि नहीं रखने लगा है। उसे अपने रोटी रोजी का ख्याल होता है। इस प्रकार के कार्यक्रम केवल सरकारी कार्यक्रमों, सरकारी विद्यालयों, महाविद्यालयों या कार्यालयों से संबंधित होकर रह जाते हैं। गणतंत्र दिवस, संविधान दिवस, मतदाता दिवस पर भी लोग अपनी रोटी रोजी की व्यवस्था में लगे हुए होते हैं। खेतों खलिहानों ,ईंट भट्ठे ,सड़कों, झाड़ू पोछे, सफाई से लेकर भवन निर्माण तक के श्रमिक अपने इन मूल अधिकारों से अभिज्ञ अपने जीवन को जी रहे होते हैं। रोटी रोजी की तलाश में भटक रहे होते हैं ।
बहुत सारे लोग संविधान की रक्षा के नाम पर अपनी बात रखते हुए देखें सुने जा सकते हैं लेकिन वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार उसमें संशोधन या नए बदलाव की बात पर गंभीर होते दिखाई नहीं देते हैं। हालांकि संविधान में अब तक 100 से ज्यादा संशोधन में किया जा चुके हैं लेकिन कल्पना करें कि अगर भारत के संविधान में दर्ज मूल अधिकारों के साथ-साथ नया मूल अधिकार ‘‘रोजगार का अधिकार’’ जोड़ दिया जाए तो भारत के संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए शब्द समाजवाद तथा लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ सिद्ध हो जाएगा, लागू हो जाएगा जो लोगों के जीवन में सार्थक, यथार्थवादी बदलाव लाएगा
कल्पना करें कि भारत के संविधान में ‘‘सबको योग्यता अनुसार काम और काम के अनुसार दाम’’ का मूल अधिकार जोड़ दिया जाए तो देश के लगभग 40 करोड़ युवा जिनके पास योग्यताएं भी हैं, काम करने का कौशल भी है, जिनकी जिंदगी की जरूरत भी है, उनकी समाज के विकास में भागीदारी हो सकती है। वे संतुलित समाज का विकास कर सकते हैं, समाज में समतावादी नीतियों को लागू कर सकते हैं, भाईचारे को बढ़ा सकते हैं, सांस्कृतिक विकास कर सकते हैं और सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति ला सकते हैं।
भारत के संविधान के निर्माताओं ने तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिस संविधान को लागू किया, उसका सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार उसमें मूल अधिकारों के रूप में रोजगार का अधिकार भी जोड़ा जाना चाहिए क्योंकि यही वह मूल अधिकार है जिसके जोड़ने से पूरी उत्पादन प्रणाली में बदलाव आएगा। आए दिन अभावग्रस्त जिंदगी में बिजली, पानी, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य की जरूरत है, वह आसानी से मिल सकेंगी। भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं खत्म होंगी। आम लोगों की आवाज सुनी जाना संभव होगा। किसानों की समस्याओं, मंडियों में उनके माल के बिकने की समस्याएं, उनके बढ़ते हुए कर्ज के जाल की समस्याएं, रोजगार की तलाश में भटकने वाले युवा और प्रवास की समस्या जिसमें लोगों का जीवन जो एकाकीपन, अकेलेपन में बिता रहे हैं। एक तरफ बुढ़ापा आशा और बेबसी भरी निगाहों से ताक रहा होता है दूसरी तरफ बचपन कुचला जा रहा होता है और युवावस्था काम की तलाश में भटक रही होती है। लोग अभावग्रस्त जिंदगी जी रहे होते हैं । ऐसी स्थिति में रोजगार के एक ही मूल अधिकार को शामिल किए जाने से पूरी जिंदगी संतुलित हो जाएगी।
समाज के नेतृत्वकर्ताओं का कार्य है कि वे इस पुनीत कार्य को करने से ही समाज में वास्तविक बदलाव आ सकते हैं वरना अभावग्रस्त ,पीड़ित लोग केवल अपनी खीझ ही उतार सकते हैं या फिर किसी अदृश्य शक्ति से इस बदलाव की आशा कर सकते हैं और उस आशा में अपना जीवन बिता सकते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचने वाले जानते हैं कि वास्तविक बदलाव तो भौतिक परिस्थितियों को बदलने से आएगा। भौतिक परिस्थितियों को कानूनी रूप में बदला जाता है। इसलिए संविधान में इस बात को लिखा जाना ही आज के दिन की सर्वाेपरि आवश्यकता है। आओ, समाज के बदलाव में भागीदार बने और इस अति आवश्यक कानून को संविधान में शामिल करने के बारे में सोचें, समझें, समझाएं और जन चेतना का हिस्सा बनाएं।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
