स्क्रीन पर सच और झूठ का महायुद्ध : डिजिटल मीडिया और भारतीय समाज की नई परीक्षा

स्क्रीन पर सच और झूठ का महायुद्ध : डिजिटल मीडिया और भारतीय समाज की नई परीक्षा

6 अप्रैल 2026 कृ असम, केरल और पुदुच्चेरी में चुनाव से ठीक तीन दिन पहले – भारत के करोड़ों नागरिक अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन पर राजनीतिक सूचनाओं की एक ऐसी बाढ़ में डूबे हुए हैं जिसमें सच और झूठ, तथ्य और मनगढ़ंत, जानकारी और जोड़-तोड़ – सब एक साथ बह रहे हैं। पाँच राज्यों के चुनाव, ईरान युद्ध की भू-राजनीति, एलपीजी की कीमतें, और विभिन्न राजनीतिक दलों के दावे-प्रतिदावे – यह सब एक साथ व्हाट्सएप समूहों, फेसबुक फीड, यूट्यूब चौनलों और एक्स (पूर्व में ट्विटर) की समयरेखाओं पर तैर रहा है। डिजिटल मीडिया और भारतीय समाज का यह संबंध आज अपनी सबसे जटिल और निर्णायक अवस्था में है।

भारत में डिजिटल मीडिया का विस्तार अभूतपूर्व है। व्हाट्सएप के भारत में उपयोगकर्ताओं की संख्या करोड़ों में है और यह देश में राजनीतिक सूचना के प्रसार का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। लेकिन यह माध्यम एन्क्रिप्टेड, बंद और किसी एल्गोरिदमिक जाँच से मुक्त है। यूट्यूब पर हिंदी में राजनीतिक टिप्पणी करने वाले चौनलों की संख्या हज़ारों में है, जिनमें से कई को कोई संपादकीय जवाबदेही नहीं है। एमआईटी के 2018 के शोध कृ जो ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था कृ ने सिद्ध किया था कि ट्विटर पर झूठी खबरें सच्ची खबरों की तुलना में 70 प्रतिशत अधिक रीट्वीट होती हैं और 1,500 लोगों तक करीब छह गुना तेज़ी से पहुँचती हैं। आज 2026 में, जब भारत में एक साथ पाँच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, यह शोध पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।

चुनाव प्रचार का डिजिटल रूपांतरण भारतीय राजनीति में एक गहरा संरचनात्मक परिवर्तन ला रहा है। एक ओर भाजपा की आईटी सेल है जो सोशल मीडिया प्रचार में अत्यंत परिष्कृत और संगठित है। दूसरी ओर सपा, कांग्रेस और तृणमूल जैसी पार्टियाँ भी इस क्षेत्र में तेज़ी से क्षमता विकसित कर रही हैं। ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट की 2019 की ‘ग्लोबल डिसइन्फर्मेशन ऑर्डर’ रिपोर्ट ने 70 देशों में संगठित सोशल मीडिया जनमत-हेरफेर का दस्तावेज़ीकरण किया था। भारत उन सात देशों में था जो फेसबुक और ट्विटर पर वैश्विक प्रभाव अभियान चलाते हैं। आज 2026 में यह परिदृश्य और जटिल हो गया है।

ईरान युद्ध और उससे जुड़ी खबरों के प्रसार का तरीका डिजिटल मीडिया की एक और समस्या को उजागर करता है – झूठी और अर्ध-सत्य सूचनाओं का युद्धकालीन उपयोग। जब हार्मुज़ बंद हुआ, तो भारत के व्हाट्सएप समूहों में पेट्रोल और एलपीजी की कथित कमी के बारे में अतिशयोक्तिपूर्ण संदेश वायरल होने लगे जिससे कुछ स्थानों पर घबराहट में खरीदारी (पैनिक बाइंग) की स्थिति बनी। इसका वास्तविकता से दूर का संबंध था कृ केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि घरेलू आपूर्ति सामान्य है और बुकिंग से डिलीवरी का समय 2.5 दिन पर स्थिर है। लेकिन व्हाट्सएप पर फैली अफवाह ने पहले ही असर कर दिया था। यह 2018 के भीड़-हिंसा प्रकरणों की याद दिलाता है जब इंडियास्पेंड के आँकड़ों के अनुसार जनवरी 2017 से जुलाई 2018 के बीच 69 भीड़-हमलों में 33 लोग मारे गए थे।

डीपफेक तकनीक अब भारत के चुनावी परिदृश्य का एक वास्तविक खतरा बन चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कई नेताओं के कृत्रिम रूप से तैयार वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। आज, 2026 के इन पाँच राज्यों के चुनाव में भी यही खतरा है। यूक्रेन युद्ध में मार्च 2022 में ज़ेलेंस्की के डीपफेक आत्मसमर्पण वीडियो का उदाहरण – जो यूक्रेन 24 चौनल हैक करके प्रसारित किया गया था – दुनिया को याद है। भारत में चुनाव आयोग ने डिजिटल प्रचार के नियमन के लिए कदम उठाए हैं और प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों के साथ स्वैच्छिक आचार संहिता पर सहमति बनाई है, लेकिन एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्मों पर नियंत्रण अभी भी बेहद कठिन है।

भारत में डिजिटल समाचार का पारिस्थितिकी तंत्र असमान और असंरचित है। एक ओर ‘द हिंदू’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘एनडीटीवी’ जैसे स्थापित संस्थान हैं जिनकी संपादकीय जवाबदेही और तथ्य-परीक्षण की परंपरा है। दूसरी ओर हज़ारों अज्ञात यूट्यूब चौनल, व्हाट्सएप ग्रुप एडमिन और फेसबुक पेज हैं जो किसी मानक या जवाबदेही के बिना राजनीतिक सामग्री प्रसारित करते हैं। ‘ऑल्ट न्यूज़’, ‘बूम’, ‘फैक्टली’ जैसी तथ्य-परीक्षण संस्थाएँ सीमित संसाधनों के साथ इस विशाल प्रचार-तंत्र से लड़ रही हैं।

‘तर्क की मृत्यु और भावना का उदय’ – यह केवल सैद्धांतिक अवधारणा नहीं है, यह आज के भारतीय डिजिटल राजनीतिक विमर्श की ज़मीनी सच्चाई है। जब चुनाव की पूर्व संध्या पर व्हाट्सएप पर कोई संदेश वायरल होता है जो एक समुदाय के बारे में अपमानजनक बात कहता है कृ तब वह तर्क से नहीं, भावना से फैलता है कृ क्रोध, भय, या सामुदायिक अस्मिता की रक्षा की भावना से। ‘साइलेंस पीरियड’ – मतदान से 48 घंटे पहले के प्रचार-प्रतिबंध – का एनक्रिप्टेड व्हाट्सएप समूहों में कोई अर्थ नहीं रहता।

इस जटिल परिदृश्य में एक नई संभावना भी दिखती है – वही कृत्रिम मेधा जो खतरा है, वही समाधान का साधन भी बन सकती है। एआई आधारित तथ्य-परीक्षण उपकरण, फेक न्यूज़ पहचानने की तकनीकें, और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम कृ ये सब साथ मिलकर काम कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए डिजिटल मंचों की जवाबदेही, सरकार की स्पष्ट नीति, और नागरिकों की समझ कृ तीनों की एक साथ ज़रूरत है। भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा है। उसकी ताक़त आज की डिजिटल चुनौतियों से तय होगी। जो समाज डिजिटल झूठ को पहचानना सीख जाए, जो मतदाता स्क्रीन पर आने वाली हर बात को एक पल रुककर जाँचे – वही लोकतंत्र टिकाऊ है।

लेखक नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स के सलाहकार संपादक हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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