आइए सामान्य भाषा में जानते हैं “भूगोल”

आइए सामान्य भाषा में जानते हैं “भूगोल”

गौतम चौधरी 

भूगोल वह शास्त्र है, जिसमें पृथ्वी के ऊपरी स्वरुप या परत और उसके प्राकृतिक विभागों (जैसे पहाड़, पठार, मैदान, महादेश, देश, नगर, नदी, समुद्र, झील, डमरुमध्य, उपत्यका, अधित्यका, वन आदि) का अध्ययन किया जाता है। प्राकृतिक विज्ञानों के निष्कर्षों के बीच कार्य-कारण संबंध स्थापित करते हुए पृथ्वी तल की विभिन्नताओं का मानवीय दृष्टिकोण से अध्ययन ही भूगोल कहलाता है। इसकी एक दूसरी परिभाषा भी है, जिसमें कहा गया है, ‘‘जब आप एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते हैं, तो पृथ्वी पर बनी हुई विभिन्न प्रकार की स्थालाकृतियां आपको दिखती है, भूगोल उन्हीं स्थलाकृतियों का वैज्ञानिक अध्ययन है। मसलन, पृथ्वी की सतह पर जो स्थान विशेष हैं, उनकी समताओं तथा विषमताओं का कारण और उनका स्पष्टीकरण भूगोल का निजी क्षेत्र है। भूगोल शब्द दो शब्दों, भू यानि पृथ्वी और गोल से बना है।

भूगोल एक ओर अन्य श्रृंखलाबद्ध विज्ञानों से प्राप्त ज्ञान का उपयोग उस सीमा तक करता है जहां तक वह घटनाओं और विश्लेषणों की समीक्षा तथा उनके संबंधों के यथासंभव समुचित समन्वय करने में सहायक होता है। दूसरी ओर अन्य विज्ञानों से प्राप्त जिस ज्ञान का उपयोग भूगोल करता है, उसमें अनेक व्युत्पत्तिक धारणाएं एवं निर्धारित वर्गीकरण होते हैं। यदि ये धारणाएं एवं वर्गीकरण भौगोलिक उद्देश्यों के लिये उपयोगी न हों, तो भूगोल को निजी व्युत्पत्तिक धारणाएं तथा वर्गीकरण की प्रणाली विकसित करनी होती है। अतः भूगोल मानवीय ज्ञान की वृद्धि में तीन प्रकार से सहायक होता है।

पहला, विज्ञानों से प्राप्त तथ्यों का विवेचन करके मानवीय वास स्थान के रूप में पृथ्वी का अध्ययन करना। दूसरा, अन्य विज्ञानों के द्वारा विकसित धारणाओं में अंतर्निहित तथ्य का परीक्षण करना। तीसरा, सार्वजनिक अथवा निजी नीतियों के निर्धारण में अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि प्रदान करना। सर्वप्रथम प्राचीन यूनानी विद्वान इरेटोस्थनीज ने भूगोल को धरातल के एक विशिष्ट विज्ञान के रूप में मान्यता दी। हालांकि भारतीय धार्मिक ग्रंथों में भी भूगोल की चर्चा है। ऋग्वेद के पुरुषुक्त में परमपुष की व्याख्या के दौरान महासमुद्र और महाद्वीप की चर्चा की गयी है लेकिन एक विषय के रूप में इसका अध्ययन भारतीय ज्ञान और विज्ञान में कहीं नहीं मिलता है। यूनानी विद्वान के बाद हिरोडोटस तथा रोमन विद्वान स्ट्रैबो तथा क्लाडियस टॉलमी ने भूगोल को एक व्यापक विषय के रूप में मान्यता दिलाई। इस प्रकार भूगोल में कहां, कैसे, कब, क्यों एवं कितने प्रश्नों की उचित व्याख्या की जाने लगी। स्ट्रैबो नामक भूगोलवेत्ता ने इस विषय को परिभाषित करते हुए कहा है कि भूगोल एक ऐसा स्वतंत्र विषय है, जिसका उद्देश्य लोगों को इस विश्व का, आकाशीय पिंडों का, स्थल, महासागर, जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों, फलों तथा भू धरातल के क्षेत्रों में देखी जाने वाली प्रत्येक अन्य वस्तु का ज्ञान प्राप्त कराना हैं।

भूगोल एक प्राचीनतम विज्ञान है और इसकी नींव प्रारंभिक यूनानी विद्वानों के कार्यों में दिखाई पड़ती है। भूगोल शब्द का प्रथम प्रयोग यूनानी विद्वान इरेटॉस्थनीज ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में किया था। भूगोल विस्तृत पैमाने पर सभी भौतिक व मानवीय तथ्यों की अन्तर्कि्रयाओं और इन अन्तर्कि्रयाओं से उत्पन्न स्थलरूपों का अध्ययन करता है। यह बताता है कि कैसे, क्यों और कहां मानवीय व प्राकृतिक क्रियाकलापों का उद्भव होता है और कैसे ये क्रियाकलाप एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं। भूगोल की अध्ययन विधि परिवर्तित होती रही है। प्रारंभिक विद्वान वर्णनात्मक भूगोलवेत्ता थे। बाद में, भूगोल विश्लेषणात्मक भूगोल के रूप में विकसित हुआ। आज यह विषय न केवल वर्णन करता है, बल्कि विश्लेषण के साथ-साथ भविष्यवाणी भी करता है। 15वीं सदी के मध्य से शुरू होकर 18वीं सदी के पूर्व तक भूगोल का मध्य काल माना जाता है। यह काल आरंभिक भूगोलवेत्ताओं की खोजों और अन्वेषणों द्वारा विश्व की भौतिक व सांस्कृतिक प्रकृति के बारे में वृहत ज्ञान प्रदान करता है। 17वीं सदी का प्रारंभिक काल नवीन वैज्ञानिक भूगोल की शुरुआत का गवाह बना। कोलम्बस, वास्कोडिगामा, मैगलेन और थॉमस कुक इस काल के प्रमुख अन्वेषणकर्ता थे। वारेनियस, कान्ट, हम्बोल्ट और रिटर इस काल के प्रमुख भूगोलवेत्ता थे। इन विद्वानों ने मानचित्र कला के विकास में योगदान दिया और नवीन स्थलों की खोज की, जिसके फलस्वरूप भूगोल एक वैज्ञानिक विषय के रूप में विकसित हुआ। कार्ल रिटर और हम्बोल्ट का उल्लेख बहुधा आधुनिक भूगोल के संस्थापक के रूप में किया जाता है। सामान्यतः 19वीं सदी के उत्तरार्ध का काल आधुनिक भूगोल का काल माना जाता है। वस्तुतः रेट्जेल प्रथम आधुनिक भूगोलवेत्ता थे, जिन्होंने चिरसम्मत भूगोलवेत्ताओं द्वारा स्थापित नींव पर आधुनिक भूगोल की संरचना का निर्माण किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भूगोल का विकास बड़ी तीव्र गति से हुआ। हार्टशॉर्न जैसे अमेरिकी और यूरोपीय भूगोलवेत्ताओं ने इस दौरान अधिकतम योगदान दिया। हार्टशॉर्न ने भूगोल को एक ऐसे विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जो क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन करता है। वर्तमान भूगोलवेत्ता प्रादेशिक उपागम और क्रमबद्ध उपागम को विरोधाभासी की जगह पूरक विषयों के रूप में देखा। 

भूगोल ने आज विज्ञान का दर्जा प्राप्त कर लिया है। भूगोल एक समग्र और अन्तर्सम्बन्धित क्षेत्रीय अध्ययन के रूप में उभरने वाला विज्ञान बन गया है। यह स्थानिक संरचना में भूत से भविष्य में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन करता है। इस तरह भूगोल का क्षेत्र विविध विषयों जैसे सैन्य सेवाओं, पर्यावरण प्रबंधन, जल संसाधन, आपदा प्रबंधन, मौसम विज्ञान, भाषा आदि नियोजन और विविध सामाजिक विज्ञानों में है। इसके अलावा भूगोलवेत्ता दैनिक जीवन से संबंधित घटनाओं जैसे पर्यटन, स्थान परिवर्तन, आवासों तथा स्वास्थ्य सम्बंधी क्रियाकलापों में सहायक कर रहे हैं। मोटे तौर पर भूगोल के दो भाग किए गए हैं। पहला भौतिक भूगोल और दूसरा आर्थिक भूगोल। आर्थिक भूगोल को मानवीय भूगोल भी कहा जाता है। पहले विभाग में पृथ्वी का सौर जगत के अन्यान्य ग्रहों और उपग्रहों आदि से संबंध बतलाया जाता है और उन सबके साथ उसके सापेक्षिक संबंध का वर्णन होता है। इस विभाग का बहुत कुछ संबंध गणित ज्योतिष से भी है। इसी भाग में पृथ्वी के भौतिक रूप का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन में नदी, पहाड़, पठार आदि विभिन्न स्थलाकृति का अध्ययन किया जाता है। इसके साथ ही भूगोल के इस भाग में पृथ्वी पर बने स्थलाकृतियों के कारक तत्वों, जैसे-भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट आदि का भी अध्ययन किया जाता है। यही नहीं बारिश, हवा की गति आदि के कारण भी पृथ्वी पर स्थलाकृतियों का निर्माण होता है और भूगोल उन गतिविधियों का भी अध्ययन करता है। भूगोल की दूसरी शाखा आर्थिक या मानवीय भूगोल है। इसमें मानव के द्वारा बनाए गए कृत्रिम स्थलाकृतियों का अध्ययन एवं विवेचना किया जाता है। राजनीतिक, कृषि, भूमि उपयोग, नगरीय संरचना आदि अध्ययन इस शाखा का अंग है। राजनीति, शासन, भाषा, जाति और सभ्यता आदि के विचार से पृथ्वी के कौन विभाग है और उन विभागों का विस्तार और सीमा आदि का अध्ययन भी इस शाखा में किया जाता है। 

भूगोल एक प्रगतिशील विज्ञान है। प्रत्येक देश में विशेषज्ञ अपने अपने क्षेत्रों का विकास कर रहे हैं। आर्थिक भूगोल में कृषि, उद्योग, खनिज, शक्ति तथा भंडार भूगोल और भू उपभोग, व्यावसायिक, परिवहन एवं यातायात भूगोल हैं। अर्थिक संरचना संबंधी योजना भी भूगोल की शाखा है। इसके अतिरिक्त भूगोल के अन्य खंड भी विकसित हो रहे हैं जैसे ग्रंथ विज्ञानीय, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, गणित शास्त्रीय, ज्योतिष शास्त्रीय एवं भ्रमण भूगोल तथा स्थाननामाध्ययन हैं।

कुल मिलाकर भूगोल मानवीय ज्ञान की वह शाखा है जो पृथ्वी पर बने स्थलाकृतियों का अध्ययन करता है। कुछ स्थलाकृतियां प्रकृति खुद बनाती है और कुछ मानव के द्वारा कृत्रिम रूप से बनाया गया है। इन दोनों प्रकार के स्थल आकृतियों के निर्माण में जिन शक्तियों की भूमिका होती है भूगोल उन विषयों का भी अध्ययन करता है। इसी संदर्भ में भूगोल को पृथ्वी के अंदर और बाहर झांकने का मौका मिलता है। हालांकि पृथ्वी के अंदर का अध्ययन करने के लिए अलग से भूगर्भ विज्ञान है और बाहरी वातावरण का अध्ययन करने के लिए मौसम विज्ञान है लेकिन चूकि स्थलाकृति के निर्माण में दोनों ओर की शक्तियों की भूमिका होती है इसलिए भूगोल का दायरा दोनों तरफ बढ़ जाता है। ऐसे में यह एक व्यापक विषय है जो मानव सभ्यता के विकास और सांस्कृतिक संरचना के साथ जुड़ा हुआ है। दैनंदिन के कार्य में भी भूगोल की अहम भूमिका है। 

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