भारतीय राजनीति का ‘नया भूगोल’: भारत में ‘नारी शक्ति’ का आधुनिक अध्याय

भारतीय राजनीति का ‘नया भूगोल’: भारत में ‘नारी शक्ति’ का आधुनिक अध्याय

भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में 16 अप्रैल का दिन एक युगांतरकारी मोड़ साबित हो सकता है। केंद्र सरकार ने श्नारी शक्ति वंदन अधिनियमश् को धरातल पर उतारने के लिए एक साहसिक और दूरगामी योजना तैयार की है। इस योजना के केंद्र में केवल महिला आरक्षण ही नहीं, बल्कि लोकसभा की संरचना में अब तक का सबसे बड़ा विस्तार भी शामिल है। श्नारी शक्ति वंदन अधिनियमश् में बड़े संशोधनों के साथ ही लोकसभा की 50 प्रतिशत सीटो की बढ़ोतरी की तैयारी कर ली है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य न केवल विधायी निकायों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना है बल्कि दशकों से लंबित परिसीमन की प्रक्रिया को एक नई दिशा देना भी है। सरकार द्वारा इस तैयारी के लिए खींचे गये खाके को लेकर स्पष्ट कर दिया है कि वह महिलाओं को संसद में भेजने के अपने वादे को 2029 के आम चुनाव तक हर हाल में पूरा करना चाहती है। देश को उम्मीद है कि लोकसभा की नई सरंचना न केवल भारत की बढ़ती आबादी का प्रतिनिधित्व करेगी, बल्कि श्नारी शक्तिश् को राष्ट्र के नीति-निर्माण में बराबर का हिस्सेदार बनाएगी।

संसद के बजट सत्र के अंतिम दिन केंद्र सरकार ने भारतीय राजनीति और संसदीय इतिहास में उस समय चौंकाने वाला निर्णय लिया जिसमें अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने वाले बजट सत्र को समाप्त करने के बजाय, 16 अप्रैल सुबह 11 बजे तक के लिए टाल दिया गया है। यानी संसद के बजट सत्र का यह विशेष हिस्सा अब 16 से 18 अप्रैल तक फिर से चलेगा। केंद्र सरकार का मकसद श्महिला आरक्षण कानूनश् (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को समय से पहले जमीन पर उतारना है। सरकार का पूरा फोकस अब उस कानूनी अड़चन को खत्म करना है जो महिला आरक्षण और जनगणना तथा परिसीमन के बीच फंसी हुई है। दरअसल 2023 में पास हुए नारी शक्ति वंदन अधिनियम के मुताबिक, आरक्षण अगली जनगणना के बाद ही लागू हो सकता था जिसमें वर्षों का समय लगना स्वाभाविक था। अब सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही लंबित परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संशोधन बिल लाने की तैयारी में है। सरकार चाहती है कि महिलाओं को उनके हक के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े। इसलिए जनगणना और परिसीमन की तकनीकी अड़चनों को दूर करने के लिए यह सत्र मील का पत्थर साबित होगा।

इस सत्र के विस्तार का सबसे बड़ा आकर्षण लोकसभा सीटों का पुनर्गठन हो सकता है। चर्चा है कि सरकार सदन में सीटों की संख्या 543 में 50 फीसदी सीटे बढ़ाने का प्रस्ताव है जिससे लोकसभा की 816 सीटें होने पर 33 प्रतिशत यानी एक-तिहाई आरक्षण के फार्मूले के तहत लोकसभा में लगभग 273 सीटें सीधे महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। मसलन इन 273 सीटों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उनके आरक्षित कोटे के भीतर सीटें तय होंगी। संसद में यदि यह संशोधन पास होता है तो 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ही देश की संसद का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा और महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच जाएगी। माना जा रहा है कि इसके लिए बजट सत्र की आगामी तीन दिन की बैठकों में सरकार जहां एक संविधान संशोधन विधेयक के जरिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बदलाव करेगी, वहीं दूसरा सामान्य विधेयक परिसीमन अधिनियम में संशोधन लाएगी। इन दोनों प्रस्तावित कानून 31 मार्च 2029 से लागू किया जा सकता है।

यदि ऐसा हुआ तो आगामी लोकसभा चुनावों और ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनावों में महिलाओं को आरक्षण मिल सकेगा। यही फॉर्मूला राज्यों की विधानसभाओं में भी लागू किया जाएगा, ताकि पंचायत से लेकर संसद तक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का एक समान ढांचा तैयार हो सके। माना जा रहा है कि उत्तर बनाम दक्षिणसीटों की संख्या बढ़ने से बड़े राज्यों, विशेषकर हिंदी भाषी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में भारी उछाल आएगा। नए परिसीमन के जरिए राज्यों में फिलहाल संसदीय सीटों में 50 फीसदी बढ़ोतरी होगी और उत्तर प्रदेश में यह संख्या सबसे ज्यादा होकर तीन अंक में पहुंच जाएगी।

वर्तमान में लोकसभा की सदस्य संख्या 543 है, जो 1971 की जनगणना के आधार पर टिकी हुई है। सरकार के नए प्रस्ताव के अनुसार यदि सीटों में 50 फीसदी की बढ़ोतरी होती है तो यह संख्या बढ़कर 816 हो जाएगी। इस विस्तार का आधार 2011 की जनगणना को बनाया जाएगा यानी अब 2011 के आंकड़ों के आधार पर ही सीटों का पुनर्गठन (परिसीमन) किया जाएगा। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि नई जनगणना में होने वाली देरी के कारण आरक्षण के क्रियान्वयन में बाधा आ रही थी। यदि ये दोनों विधेयक संसद में पारित हाते हैं, तो महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी, जिनमें महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित होगी। बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है, जहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। मध्यप्रदेश में 29 से 44 सीटों में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 39 से 59 प्रस्तावित सीटों में 20 और दिल्ली प्रस्तावित 11 में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है, जहां फिलहाल 14 सीटें हैं। ऐसे ही अन्य राज्यों की सीटे भी नए परिसीमन में बढ़ेंगी।

सरकार को हालांकि इस ऐतिहासिक बदलाव को अमली जामा पहनाने के लिए दो मोर्चों पर काम करना होगा। इसके लिए संविधान संशोधन के लिए सरकार को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता है। यानी इन दोनों विधेयकों को पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। इसी वजह से सरकार विपक्ष का समर्थन जुटाने में लगी है। यही कारण है कि इसके लिए गृहमंत्री अमित शाह सपा, राजद, बीजद, वाईएसआर कांग्रेस, एनसीपी (एसपी), और एआईएमआईएम जैसे विपक्षी दलों के साथ निरंतर संवाद कर रहे हैं। दरअसल विपक्ष में खासतौर से कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दल लगातार मांग कर रहे हैं कि महिला कोटे के भीतर ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए क्योंकि फिलहाल इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान शामिल नहीं है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार सरकार इसी फॉर्मूले पर राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की योजना है, ताकि पूरे देश में एक जैसा ढांचा रहे।

देश में महिला आरक्ष्ण का मुद्दा नया नही है, बल्कि साल 1931 यानी लगभग एक सदी पुरानी है। साल 1931 में सरोजिनी नायडू और बेगम शाह नवाज ने पहली बार राजनीतिक समानता की आवाज को बुलंद किया था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी, लेकिन तब प्रस्ताव खारिज कर दिया गया था। इसके बाद 1971 में भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया, जिसमें कई सदस्यों ने महिला आरक्षण का विरोध किया। जबिक 1974 में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी।

इस रिपोर्ट में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद साल 1988 में महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की और यहीं से पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले संविधान संशोधनों की नींव रखी और 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं।

महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया है। मोदी सरकार ने साल 2023 में महिला आरक्षण कानून के स्थान पर श्नारी शक्ति वंदन अधिनियमश् कानून पास हुआ और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी इसकी मंजूरी दे चुकी हैं लेकिन जनगणना और परिसीमन की शर्त के कारण यह अटका हुआ है। अब सरकार 2011 की जनगणना को आधार मानकर इसे तत्काल प्रभावी बनाने की योजना बना रही है।

(अदिति फीचर्स)

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