2014 के बाद के भारत का आलोचनात्मक विवेचन : तो सचमुच नरेन्द्र मोदी की सरकार क्रूर पूंजीवार के मजबूत बना रही है?

2014 के बाद के भारत का आलोचनात्मक विवेचन : तो सचमुच नरेन्द्र मोदी की सरकार क्रूर पूंजीवार के मजबूत बना रही है?

2014 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी, तब भारतीय राजनीति में केवल सरकार नहीं बदली थी; एक नये वैचारिक युग का उद्घाटन हुआ था। इसे कुछ लोगों ने “नये भारत” का उदय कहा, तो कुछ ने इसे भारतीय लोकतंत्र के भीतर उभरती कॉरपोरेट-राष्ट्रवादी राजनीति का निर्णायक क्षण माना। उसी दौर में वामपंथी पत्रिका मज़दूर बिगुल में प्रकाशित कात्यायनी का आलेख एक तीखा और वैचारिक भविष्य-विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आज, लगभग साढ़े बारह वर्षों बाद, उस विश्लेषण को पढ़ना केवल अतीत की समीक्षा नहीं, बल्कि वर्तमान भारत को समझने का एक राजनीतिक उपकरण भी है।

उस लेख की सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि उसने व्यक्तियों की नहीं, बल्कि पूँजीवादी संरचना, नवउदारवादी अर्थनीति और हिन्दुत्ववादी राजनीति के अंतर्संबंधों की चर्चा की। इसलिए उसकी कई बातें आज भी प्रासंगिक प्रतीत होती हैं।

सबसे पहली भविष्यवाणी थी-विदेशों से काला धन वापस नहीं आयेगा, “15 लाख” का वादा राजनीतिक जुमला साबित होगा। यह बात आज लगभग निर्विवाद सत्य की तरह स्थापित हो चुकी है। काले धन के विरुद्ध निर्णायक युद्ध का दावा करने वाली सरकार ने नोटबंदी जैसे कठोर कदम उठाए, परंतु स्वयं भारतीय रिज़र्व बैंक के आँकड़े बताते हैं कि लगभग पूरी मुद्रा व्यवस्था वापस बैंकों में लौट आई। इससे यह प्रश्न और तीखा हुआ कि क्या भ्रष्टाचार-विरोध केवल राजनीतिक नैरेटिव था, आर्थिक समाधान नहीं।

इसी प्रकार रोज़गार के प्रश्न पर भी उस आलेख का आकलन उल्लेखनीय रूप से सटीक दिखाई देता है। “स्टार्टअप इंडिया”, “मेक इन इंडिया” और “डिजिटल इंडिया” जैसे अभियानों के बावजूद संगठित क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार नहीं पैदा हुए। इसके विपरीत अस्थायी, संविदा और गिग अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ। युवा आबादी वाले देश में बेरोज़गारी लगातार एक केंद्रीय राजनीतिक प्रश्न बनी रही। इंजीनियरिंग और उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं का निम्नस्तरीय नौकरियों की ओर धकेला जाना उस भविष्यवाणी की पुष्टि जैसा लगता है कि “व्हाइट कॉलर” नौकरियाँ भी संकटग्रस्त होंगी।

हालाँकि यह कहना भी उचित होगा कि उस विश्लेषण में कुछ अतिरंजना और वैचारिक आग्रह भी मौजूद थे। उदाहरण के लिए भारतीय राज्य को “विफल राज्य” जैसी स्थिति में पहुँचने की बात अभी वास्तविकता नहीं बनी। भारतीय संस्थाएँ दबावों के बावजूद कार्यरत हैं; चुनाव होते हैं, न्यायपालिका और मीडिया की सीमित किंतु सक्रिय भूमिका बनी हुई है, और क्षेत्रीय दल अभी भी राष्ट्रीय सत्ता को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। इसलिए भारत को पूर्ण “फासीवादी राज्य” घोषित कर देना शायद जटिल वास्तविकताओं का सरलीकरण होगा।

फिर भी यह भी उतना ही सत्य है कि पिछले दशक में राज्य की दमनकारी क्षमता में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। यूएपीए, बुलडोज़र राजनीति, डिजिटल निगरानी, इंटरनेट शटडाउन और विरोध आंदोलनों पर कठोर कार्रवाई ने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर गंभीर बहस खड़ी की है। किसान आंदोलन, CAA-NRC विरोध, विश्वविद्यालय आंदोलनों और पत्रकारों-कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियों ने यह संकेत दिया कि राज्य अधिक केंद्रीकृत और असहमति के प्रति अधिक असहिष्णु हुआ है। इस संदर्भ में “पुलिस स्टेट” की आशंका पूरी तरह काल्पनिक नहीं लगती।

कात्यायनी के लेख का सबसे राजनीतिक हिस्सा हिन्दुत्व और आर्थिक संकट के संबंध पर था। उनका तर्क था कि जैसे-जैसे आर्थिक वादों का “बैलून” पिचकेगा, वैसे-वैसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और आक्रामक राष्ट्रवाद बढ़ेगा। पिछले वर्षों में राम मंदिर आंदोलन की परिणति, “लव जिहाद”, “घर वापसी”, धार्मिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया आधारित नफ़रत अभियानों और पाकिस्तान-विरोधी राष्ट्रवाद की तीव्रता को देखते हुए यह विश्लेषण कई लोगों को सही प्रतीत हो सकता है। Pulwama और Balakot जैसे घटनाक्रमों के बाद राष्ट्रवाद का चुनावी विमर्श में केंद्रीय स्थान पा लेना भी इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है।

लेकिन इस पूरे विमर्श में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या भारत की जनता केवल “प्रचार” के प्रभाव में है? यह निष्कर्ष अधूरा होगा। भाजपा और संघ परिवार का उभार केवल साम्प्रदायिकता का परिणाम नहीं, बल्कि कांग्रेस-युगीन भ्रष्टाचार, क्षेत्रीय दलों की सीमाएँ, सामाजिक आकांक्षाओं का विस्फोट, कल्याणकारी योजनाओं की प्रत्यक्ष डिलीवरी और एक मजबूत नेतृत्व की जन-इच्छा से भी जुड़ा है। यही कारण है कि मोदी सरकार के प्रति समर्थन केवल उच्च वर्गों तक सीमित नहीं रहा; गरीब तबकों और नए मध्यवर्ग में भी उसकी मजबूत सामाजिक स्वीकृति बनी रही।

यहीं पर वामपंथी विश्लेषण की सीमा दिखाई देती है। वह आर्थिक संकट को तो ठीक पकड़ता है, परंतु सांस्कृतिक राजनीति, आकांक्षी राष्ट्रवाद और पहचान-आधारित समर्थन की जटिलताओं को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। भारत का मतदाता केवल वर्गीय पहचान से संचालित नहीं होता; जाति, धर्म, राष्ट्रीय गौरव, कल्याणकारी लाभ और नेतृत्व की छवि भी उसकी राजनीतिक चेतना को प्रभावित करते हैं।

फिर भी, उस लेख का केंद्रीय निष्कर्ष आज भी विचारणीय है-भारतीय पूँजीवाद का संकट केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक और राजनीतिक भी है। अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई, कृषि संकट, बेरोज़गारी, शिक्षा और स्वास्थ्य का बाजारीकरण, और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ता दबाव यह संकेत देते हैं कि भारत एक संक्रमणकाल से गुजर रहा है। इस संक्रमण का अंतिम परिणाम क्या होगाकृएक अधिक केंद्रीकृत राष्ट्रवादी राज्य, या सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण की नई राजनीतिकृयह अभी तय नहीं है।

अतः 2014 की उस भविष्यवाणी को न तो अंधभक्ति में खारिज किया जा सकता है और न ही उसे पूर्ण सत्य घोषित किया जा सकता है। लेकिन इतना निश्चित है कि उसने भारतीय राजनीति के कई गहरे अंतर्विरोधों को समय रहते चिन्हित किया था। आज आवश्यकता भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की नहीं, बल्कि उसी प्रकार के कठोर, तथ्याधारित और वैज्ञानिक विश्लेषण की हैकृताकि हम समझ सकें कि भारत किस दिशा में जा रहा है, और लोकतंत्र, सामाजिक न्याय तथा आर्थिक समानता की लड़ाई आगे किस रूप में विकसित हो सकती है।

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