गौतम चौधरी
हमारे समय की एक बड़ी विडंबना यह है कि संस्कृति पर चर्चा तो बहुत होती है लेकिन संस्कृति को समझने का प्रयास कम होता है। राजनीति उसे पहचान का प्रश्न बना देती है। बाज़ार उसे मनोरंजन के रूप में प्रस्तुत करती है। कभी-कभी अकादमिक विमर्श उसे केवल सत्ता-संबंधों की व्याख्या तक सीमित कर देता है। परिणाम यह होता है कि संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हमारी दृष्टि से ओझल हो जाता है-संस्कृति एक संसाधन है और संस्कार उस संसाधन की संचयित पूंजी।
संस्कृति को परिभाषित करना आसान नहीं है। शायद इसलिए कि संस्कृति कोई वस्तु नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है। वह निरंतर चलने वाला परिष्कार है। संस्कृत भाषा में ‘संस्कृति’ शब्द की जड़ ‘संस्कृ’ धातु में है, जिसका अर्थ-परिमार्जन, परिष्कार और उन्नयन होता है। इसी से संस्कार, संस्कृत और संस्कृति जैसे शब्द निर्मित हुए हैं। इस दृष्टि से संस्कृति का अर्थ केवल परंपरा का संरक्षण नहीं, बल्कि जीवन का संवर्धन भी है।
इसे समझने के लिए वृक्ष की एक सरल उपमा पर्याप्त है। एक बीज का अंकुरित होकर वृक्ष बनना प्रकृति है। उस वृक्ष को उचित दिशा देना, उसकी सूखी शाखाओं की छंटाई करना, उसे रोगों से बचाना और उसके भीतर निहित संभावनाओं को विकसित करना संस्कृति है और वृक्ष को ही काट दिया जाए या उसके विकास को बाधित कर दिया जाए, तो वह विकृति है। इस प्रकार प्रकृति, संस्कृति और विकृति के बीच का अंतर स्पष्ट हो जाता है। यहां संस्कृति को सही तरीके से समझा जा सकता है। संस्कृति प्रकृति का विरोध नहीं करती; वह उसका परिष्कार करती है।
मनुष्य का जीवन भी इसी नियम पर चलता है। भूख प्रकृति है। भोजन को साझा करना संस्कृति है। दूसरे का भोजन छीन लेना विकृति है। शक्ति प्रकृति है। शक्ति का उपयोग संरक्षण के लिए करना संस्कृति है। शक्ति का उपयोग दमन के लिए करना विकृति है। इच्छा प्रकृति है। प्रेम और उत्तरदायित्व संस्कृति है। शोषण और हिंसा विकृति है। संस्कृति प्रकृति को नष्ट नहीं करती; वह उसे उचित दिशा प्रदान करती है।
यही कारण है कि संस्कारों का महत्व केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं है। संस्कार समाज द्वारा अर्जित वे अनुभव हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्य को बेहतर जीवन जीने की दिशा देते हैं। सत्य बोलने की प्रवृत्ति, श्रम का सम्मान, अतिथि-सत्कार, सामूहिक सहयोग, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, बड़ों का आदर और बच्चों के प्रति दायित्वकृये सब संस्कार हैं। इन्हें किसी कानून द्वारा लागू नहीं किया जा सकता। ये समाज की आंतरिक पूंजी हैं।
यहां कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना ठीक रहेगा। पहला उदाहरण झारखंड के आदिवासी समाज का है। यह समाज अपने आप में बेहतर और बेहद सुसंस्कृत है। इसका प्रभाव यह है कि समाज उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है। दूसरा उदाहरण हिमाचल प्रदेश का है। यहां आज भी पहाड़ के लोग अपनी संस्कृति को बचा कर रखे हुए हैं। यह उनके व्यवहार में दिखता है। बच्चों में भी वही संस्कार दिखता है और वह संस्कार मन को मोह लेता है। उसी प्रकार तीसरा उदाहरण तिरहुत क्षेत्र का है। यह क्षेत्र उत्तर बिहार के एक बड़े भू-भाग में फैला हुआ है। लगभग पांच करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाला यह क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में ही मधुबनी नामक जिला है। यहां की संस्कृति यहां के लोगों के व्यवहार में परिलक्षित होता है। इस सांस्कृतिक व्यवहार के कारण तिरहुत के लोग दुनिया भर में फैले और उन्होंने अपनी सफलता का झंडा बुलंद किया। माड़वाड़ियों का तो उदाहरण सब देते हैं। इनकी भाषा और व्यवहार ही इनकी सांस्कृतिक पहचान है और इनकी सफलता में इसका बड़ा योगदान है।
आर्थिक विकास के विमर्श में अक्सर पूंजी, तकनीक और निवेश की चर्चा होती है लेकिन संस्कृति और संस्कार की भूमिका कम आंकी जाती है। जबकि किसी समाज की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक पूंजी में निहित होती है। जहाँ विश्वास का संस्कार है, वहाँ व्यापार सुगम होता है। जहाँ सहयोग की संस्कृति है, वहाँ सामुदायिक जीवन मजबूत होता है। जहाँ ज्ञान का सम्मान है, वहाँ शिक्षा और नवाचार विकसित होते हैं। जहाँ प्रकृति के प्रति संवेदना है, वहाँ संसाधनों का संरक्षण संभव होता है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी यही सांस्कृतिक पूंजी रही है। गाँवों के तालाब, श्रमदान की परंपरा, लोकज्ञान, कृषि संबंधी अनुभव, परिवार और समुदाय आधारित सहयोग की प्रणालियाँ-ये सब केवल परंपराएँ नहीं थीं; ये समाज के जीवित संसाधन थे। दुर्भाग्य से आधुनिक विकास की दौड़ में हमने कई बार इन्हें पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया और उनके महत्व को समझे बिना त्याग दिया।
आज जब दुनिया जलवायु संकट, सामाजिक विघटन और बढ़ते अकेलेपन जैसी समस्याओं का सामना कर रही है, तब संस्कृति को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। संस्कृति केवल अतीत का गौरव नहीं है; वह भविष्य का आधार भी है। यह वह माध्यम है जिसके द्वारा एक पीढ़ी अपनी अर्जित बुद्धि, अनुभव और संवेदनशीलता अगली पीढ़ी को सौंपती है।
संस्कृति की रक्षा का अर्थ इसलिए केवल स्मारकों की रक्षा नहीं है। संस्कृति की रक्षा का अर्थ है-उन मूल्यों, व्यवहारों और संस्कारों की रक्षा जो मनुष्य और समाज को बेहतर बनाते हैं। यदि कोई परंपरा मनुष्य के विकास में सहायक है, तो वह संस्कृति है। यदि कोई विचार मनुष्य को अधिक उदार, अधिक संवेदनशील और अधिक जिम्मेदार बनाता है, तो वह संस्कृति है। संस्कृति का मूल्य उसके प्राचीन होने में नहीं, बल्कि उसके जीवनदायी होने में है।
संस्कृति कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि यह समाज का एक जीवित और गतिशील तत्व है। यह पीढ़ियों में हस्तांतरित होता चला जाता है। इसके हस्तांतरण की अपनी-अपनी परंपरा है। उसे केवल विरासत में मिले वृक्षों की रक्षा नहीं करनी होती, बल्कि नई पौध भी लगानी होती है, सूखी शाखाएँ भी हटानी होती हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए छाया भी तैयार करनी होती है। यही संस्कृति का अर्थ है और यही संस्कार का उद्देश्य-मनुष्य तथा समाज को उसके श्रेष्ठतर स्वरूप की ओर ले जाने की सतत प्रक्रिया।
संस्कृति और संस्कार इसलिए केवल परंपरा नहीं हैं; वे समाज की सबसे बड़ी पूंजी, सबसे बड़ा संसाधन और सबसे स्थायी निवेश हैं।

बहुत ही सुंदर ।