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गौतम चौधरी
’‘लैसा कमिस्लिही शै‘उन’’: उसके समान कोई भी वस्तु नहीं है। (सूरह अश-शूरा 42ः11)
इस्लाम की संपूर्ण धार्मिक संरचना जिस आधारशिला पर खड़ी है, वह है ’’तौहीद’’-अल्लाह की पूर्ण एकता, अद्वितीयता और निरपेक्ष सत्ता। यही कारण है कि पवित्र कुरआन बार-बार मनुष्य को चेताता है कि ईश्वर को किसी भी सृष्ट वस्तु के समान न समझा जाए लेकिन इसी कुरआन में कहीं ‘अल्लाह का हाथ’ है, कहीं ‘अल्लाह का चेहरा’, कहीं ‘अर्श पर स्थापित होने’ का उल्लेख है और कहीं उसके ‘आने’ अथवा ‘उतरने’ जैसी अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं। यहीं से इस्लामी धर्मशास्त्र की एक अत्यंत गंभीर बहस प्रारम्भ होती है-क्या इन कथनों को शाब्दिक रूप में समझा जाए, या उन्हें प्रतीकात्मक भाषा के रूप में पढ़ा जाए?
यह केवल भाषाई विवाद नहीं है। यह प्रश्न सीधे-सीधे इस बात से जुड़ा है कि मुसलमान अपने ईश्वर की कल्पना किस प्रकार करते हैं। क्या ईश्वर का वर्णन मनुष्य की भाषा में संभव है? यदि संभव है, तो क्या उस भाषा को शब्दशः ग्रहण किया जाना चाहिए? और यदि नहीं, तो उसकी व्याख्या का मानदंड क्या होगा?
यही वह बिंदु है जहाँ इस्लामी धर्मशास्त्र दो प्रमुख व्याख्यात्मक परंपराओं में विभाजित दिखाई देता है-’’तन्जीह’’ और ’’तश्बीह’’ की प्रवृत्तियाँ।
’’तन्जीह’’ का अर्थ है-अल्लाह को हर प्रकार की समानता, भौतिकता, दिशा, आकार, सीमा और सृष्टिगत गुणों से परे मानना। कुरआन की अनेक आयतें इसी सिद्धांत की पुष्टि करती हैं। ‘उसके समान कोई वस्तु नहीं है’, ‘न वह जन्म देता है और न जन्म लिया गया’, ‘उसका कोई समकक्ष नहीं’-ये घोषणाएँ केवल धार्मिक कथन नहीं, बल्कि इस्लामी ईश्वर-दर्शन की मूल आधारशिला हैं।
इसके विपरीत, ’’तश्बीह’’ का शाब्दिक अर्थ है-समानता स्थापित करना। इस्लामी परंपरा में शायद ही कोई मान्य विद्वान यह कहे कि अल्लाह वास्तव में मनुष्य जैसा है। इसलिए यहाँ तश्बीह का प्रयोग उस प्रवृत्ति के लिए किया जाता है जिसमें ईश्वर के लिए प्रयुक्त शारीरिक प्रतीत होने वाले वर्णनों को उनके प्रत्यक्ष अर्थ में स्वीकार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, भले ही साथ में यह कहा जाए कि उनका वास्तविक स्वरूप मनुष्य जैसा नहीं है।
इन दोनों चिंतनों पर इस्लाम के विभिन्न स्कूलों में व्यापक मतभेत दिखते हैं। इस मामले में बरेलवी फिरके के इस्लामिक विद्वान मुफ्ती तुफैल खान कादिरी साहब कहते हैं, ‘‘इस्लाम के मानने वाले ही नहीं दुनिया के वर्तमान सभी धर्म चिंतनों में ईश्वर एक है, ऐसा बताया गया है। अब ईश्वर के बारे में व्याख्याएं अलग-अलग तरीके से की गयी है। उन्होंने बताया, यहीं सलाफी व्याख्या चर्चा के केंद्र में आती है। इस परंपरा के अनेक विद्वान कहते हैं कि अल्लाह की जिन विशेषताओं का उल्लेख कुरआन और हदीस में है, उन्हें बिना किसी रूपकात्मक व्याख्या के स्वीकार किया जाना चाहिए। ‘कैसे?’-इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य नहीं दे सकता; इसलिए वे ’’बिला कैफ़’’ का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार अल्लाह का ‘हाथ’ है लेकिन वह कैसा है-यह मनुष्य नहीं जानता; अल्लाह ‘अर्श पर स्थापित’ है, पर उसका तरीका मानव बुद्धि की पहुँच से बाहर है।’’
कादिरी साहब फरमाते हैं, ‘‘पहली दृष्टि में यह विचार संतुलित प्रतीत हो सकता है, क्योंकि वह स्पष्ट रूप से अल्लाह को मनुष्य जैसा मानने से इंकार करता है। किंतु यहीं एक गंभीर धर्मशास्त्रीय प्रश्न उठता है। यदि किसी सत्ता के लिए ‘हाथ’, ‘चेहरा’, ‘आना’, ‘उतरना’, ‘ऊपर होना’ जैसे शब्द उसी अर्थ-क्षेत्र में प्रयुक्त हों जिनका प्रयोग हम भौतिक जगत के लिए करते हैं, तो क्या सामान्य धार्मिक चेतना अनिवार्यतः उसकी एक प्रकार की मानसिक आकृति निर्मित नहीं करेगी?’’
सच पूछिए तो तुफैल साहब का यही प्रश्न अशअरी, मातुरीदी और अनेक सूफ़ी विद्वानों ने भी उठाया। उनका तर्क था कि यदि अल्लाह समय, स्थान और पदार्थ का सृष्टा है, तो उसे उन्हीं श्रेणियों में बाँध देना स्वयं तौहीद की अवधारणा को चुनौती देता है। इसलिए उन्होंने इन अभिव्यक्तियों को रूपकात्मक अर्थों में समझना अधिक सुरक्षित और कुरआन-सम्मत माना। उनके लिए ‘यदुल्लाह’ शक्ति और प्रभुत्व का प्रतीक है; ‘वज्हुल्लाह’ उसकी शाश्वत सत्ता का संकेत है; ‘इस्तिवा’ उसके सार्वभौमिक शासन का रूपक है।
तुफैल साहब कहते हैं, ‘‘यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह व्याख्या आधुनिक उदारवाद की देन नहीं है। यह इस्लामी बौद्धिक परंपरा के भीतर ही विकसित हुई। अशअरी और मातुरीदी इस्लामिक स्कूलों से लेकर सूफ़ी चिंतन और अनेक दार्शनिकों तक यह विचारधारा सदियों से मौजूद रही है। इस दृष्टि से यह कहना कि केवल एक ही व्याख्या ‘मूल इस्लाम’ का प्रतिनिधित्व करती है, ऐतिहासिक रूप न तो सही है और ही इस्लाम की मूल भावना, ‘‘विविधता और बहुलतावाद’’ से मेल खाता है।
एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भाषा का है। भाषा मूलतः मनुष्य के अनुभव से निर्मित होती है। जब वही भाषा अनंत और निराकार सत्ता का वर्णन करती है, तो वह स्वाभाविक रूप से प्रतीकों का सहारा लेती है। यह केवल इस्लाम की समस्या नहीं है। यहूदी, ईसाई, वैदिक और अन्य धार्मिक परंपराओं में भी ईश्वर के लिए मानवीय भाषा प्रयुक्त हुई है, किंतु अधिकांश धर्मशास्त्रियों ने उसे प्रतीकात्मक माना है। इसलिए यह मान लेना कि रूपकात्मक व्याख्या ईश्वरीय वचनों से विमुख होना है, स्वयं धर्मशास्त्रीय इतिहास के साथ न्याय नहीं करता।
यह भी सत्य है कि रूपकात्मक व्याख्या की अपनी सीमाएँ हैं। यदि प्रत्येक कथन को केवल प्रतीक मान लिया जाए, तो मूल ग्रंथ का प्रत्यक्ष अर्थ धुंधला पड़ सकता है। इसलिए इस्लामी परंपरा में अनेक विद्वानों ने एक संतुलित मार्ग अपनाने का प्रयास कियाकृन पूर्ण शाब्दिकता, न असीमित रूपकवाद।
तुफैल साहब कहते हैं, ‘‘वास्तविक प्रश्न शायद यह नहीं है कि कौन-सी परंपरा सही है। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कौन-सी व्याख्या कुरआन के उस केंद्रीय उद्घोष के साथ अधिक सामंजस्य स्थापित करती है जिसमें कहा गया है-‘उसके समान कोई वस्तु नहीं है’।’’
इस्लामिक विद्वानों की एक धारा यह मान कर चता है कि यदि किसी व्याख्या से सामान्य विश्वासियों के मन में ईश्वर की कोई आकृति, दिशा, स्थान या भौतिक स्वरूप बनने लगता है, तो तन्जीह का सिद्धांत हमें पुनर्विचार के लिए प्रेरित करता है। वहीं यदि कोई व्याख्या ईश्वर के सभी गुणों को केवल अमूर्त प्रतीकों में बदल देती है, तो वह भी मूल पाठ से दूरी बना सकती है।
इसीलिए इस्लामी बौद्धिक परंपरा का सबसे बड़ा पाठ यह है कि तौहीद केवल एक धार्मिक नारा नहीं, बल्कि ईश्वर की ऐसी अवधारणा है जो हर प्रकार की सीमित कल्पना का अतिक्रमण करती है। मनुष्य की भाषा सीमित है; ईश्वर असीम है। अतः उसकी वास्तविक सत्ता किसी भी मानवीय उपमा, कल्पना या मानसिक प्रतिमा में पूर्णतः समाहित नहीं हो सकती।
आज जब धार्मिक विमर्श प्रायः त्वरित निष्कर्षों और संकीर्ण पहचान-राजनीति का शिकार हो रहा है, तब इस्लामी धर्मशास्त्र की यह पुरानी बहस हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देती है-ईश्वर के बारे में जितना ज्ञान आवश्यक है, उससे अधिक के विषय में विनम्रता भी आवश्यक है। संभवतः यही विनम्रता तौहीद की सबसे गहरी अभिव्यक्ति है। क्या यह जैन चिंतन, ‘‘अनेकांतवाद, या फिर हिन्दू चिंतन-ईश्वर एक है और विप्रगण उसे अपनी-अपनी तरह व्याख्यायित करते हैं, जैसा नहीं है?’’
