गौतम चौधरी
आधुनिक युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे हैं। वे सूचनाओं, संचार माध्यमों, एल्गोरिद्म और डिजिटल नेटवर्कों पर भी लड़े जाते हैं। इक्कीसवीं सदी में किसी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या परमाणु क्षमता से नहीं आँकी जाती; यह भी देखा जाता है कि संकट की घड़ी में वह अपने नागरिकों तक बिना किसी बाहरी अवरोध के सूचना पहुँचाने सक्षक है या नहीं।
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट का कुछ समय के लिए Meta के मंच से गायब हो जाना और बाद में उसे ‘तकनीकी त्रुटि’ बताकर पुनः बहाल कर देना, सतही दृष्टि से एक सामान्य डिजिटल दुर्घटना लग सकती है, किंतु यदि इस घटना को केवल एक तकनीकी भूल मानकर भुला दिया जाए, तो संभव है कि हम उस बड़े प्रश्न को अनदेखा कर दें, जो इसके पीछे छिपा है।
प्रश्न यह नहीं है कि Meta की सफाई पर विश्वास किया जाए या नहीं। प्रश्न यह भी नहीं है कि संबंधित नेता कौन है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत जैसे संप्रभु राष्ट्र की सर्वाेच्च कार्यपालिका का आधिकारिक संवाद निजी वैश्विक डिजिटल कंपनियों की तकनीकी प्रणालियों और कॉर्पाेरेट निर्णयों पर इस सीमा तक निर्भर होना चाहिए?
लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं। आज नरेंद्र मोदी हैं, कल कोई और होगा लेकिन प्रधानमंत्री का पद स्थायी संवैधानिक संस्था है। यदि किसी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सेनाध्यक्ष, चुनाव आयोग या राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का आधिकारिक संदेश अचानक बाधित हो जाए, तो उसका प्रभाव किसी दल विशेष पर नहीं, पूरे शासन-तंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ता है।
भारत ने पिछले दशक में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का एक वैश्विक मॉडल प्रस्तुत किया है। आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर, कोविन और डिजिटल भुगतान प्रणालियाँ विश्वभर में अध्ययन का विषय बनीं। किंतु एक प्रश्न अब भी अनुत्तरित है-क्या भारत ने अपनी राष्ट्रीय सूचना अवसंरचना को भी उतनी ही प्राथमिकता दी?
आज अधिकांश सरकारी घोषणाएँ सबसे पहले Facebook, X, Instagram, YouTube और WhatsApp जैसे निजी विदेशी मंचों पर दिखाई देती हैं। करोड़ों भारतीय इन्हीं प्लेटफ़ॉर्मों के माध्यम से सरकारी संदेश प्राप्त करते हैं। यह व्यवस्था सुविधाजनक अवश्य है, परंतु क्या यह रणनीतिक रूप से सुरक्षित है?
यहाँ समस्या किसी एक कंपनी की नहीं है। समस्या उस संरचनात्मक निर्भरता की है जिसमें लोकतांत्रिक राज्य का सार्वजनिक संवाद निजी कॉर्पाेरेट नेटवर्कों पर आधारित हो जाता है। इन मंचों के अपने एल्गोरिद्म हैं, अपनी नीतियाँ हैं, अपने व्यावसायिक हित हैं और अनेक देशों के अलग-अलग कानूनी दायित्व हैं। किसी तकनीकी त्रुटि, साइबर हमले, कॉर्पाेरेट विवाद, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध या नीति परिवर्तन का प्रभाव सीधे सरकारी सूचना प्रणाली पर पड़ सकता है।
यहाँ एक और गंभीर प्रश्न उभरता है। क्या भारत का पारंपरिक सरकारी सूचना तंत्र धीरे-धीरे कमजोर होता गया है, या फिर उसे जानबूझ कर कमजोर बना दिया गया है?
एक समय प्रेस सूचना ब्यूरो, आकाशवाणी, दूरदर्शन, सरकारी प्रकाशन और प्रशासनिक तंत्र सरकारी सूचना के प्रमुख माध्यम हुआ करते थे। आज इनकी भूमिका बनी हुई है लेकिन आम नागरिक तक त्वरित पहुँच के लिए सरकार स्वयं निजी सोशल मीडिया मंचों पर अधिक निर्भर दिखाई देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि सरकारी संस्थाएँ निष्क्रिय हो चुकी हैं, बल्कि यह कि नागरिकों तक पहुँच का सबसे प्रभावी माध्यम अब सरकारी नियंत्रण में नहीं है।
यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक भी है। लोकतंत्र में सूचना का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है सूचना की सार्वभौमिक उपलब्धता। यदि किसी बाहरी मंच का एल्गोरिद्म यह तय करे कि कौन-सी सरकारी सूचना किस नागरिक तक पहुँचेगी, कितनी देर तक दिखाई देगी और किस प्राथमिकता से प्रदर्शित होगी, तो यह केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं रह जाती; यह राष्ट्रीय सूचना-संप्रभुता का विषय बन जाती है।
विश्व के अनेक देश अब इस चुनौती को समझने लगे हैं। यूरोपीय संघ डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों के नियमन पर लगातार काम कर रहा है। अमेरिका भी राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में डिजिटल मंचों की भूमिका पर बहस कर रहा है। चीन ने तो वर्षों पहले अपना स्वतंत्र डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर लिया। भारत का लोकतांत्रिक मॉडल अलग है और उसे खुला इंटरनेट चाहिए लेकिन खुलापन और निर्भरता एक ही बात नहीं हैं।
भारत को निजी मंचों का विरोध करने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि उन्हें लोकतांत्रिक संवाद का महत्त्वपूर्ण माध्यम मानते हुए भी यह सुनिश्चित करना होगा कि वे एकमात्र माध्यम न बन जाएँ।
आवश्यकता इस बात की है कि देश एक बहुस्तरीय राष्ट्रीय सूचना ढाँचा विकसित करे-जहाँ सरकारी वेबसाइटें, मोबाइल आधारित सार्वजनिक सूचना नेटवर्क, आपदा संचार प्रणाली, सार्वजनिक प्रसारण संस्थाएँ, क्षेत्रीय भाषाओं के डिजिटल मंच और सुरक्षित सरकारी संचार माध्यम समानांतर रूप से सक्रिय रहें। नागरिक तक पहुँचने के लिए सरकार को किसी एक निजी मंच की कृपा पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
इस घटना का सबसे बड़ा सबक, भारत को अब डिजिटल आत्मनिर्भरता की परिभाषा का विस्तार करना होगा। केवल डेटा सेंटर, क्लाउड और भुगतान प्रणाली पर्याप्त नहीं हैं; सूचना का प्रवाह भी राष्ट्रीय रणनीतिक अवसंरचना का हिस्सा है।
यह भी आवश्यक है कि सरकारें इस विषय को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखें। यदि आज किसी सरकार का संदेश बाधित हुआ है तो कल विपक्ष की सरकार का भी हो सकता है। यदि आज किसी प्रधानमंत्री का आधिकारिक वक्तव्य प्रभावित हुआ है तो कल किसी संवैधानिक संस्था की आपात सूचना भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए यह किसी व्यक्ति का प्रश्न नहीं, शासन की निरंतरता का प्रश्न है।
डिजिटल युग में संप्रभुता का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं है। उसका अर्थ यह भी है कि राष्ट्र अपनी आवाज़ स्वयं नियंत्रित कर सके, अपने नागरिकों तक बिना किसी बाहरी अवरोध के पहुँच सके और संकट की घड़ी में उसका संचार किसी कॉर्पाेरेट एल्गोरिद्म का बंधक न बने।
