राजेश श्रीवास्तव
12 साल पुरानी केंद्र की मोदी सरकार, मामला चाहे सीएए-एनआरसी प्रोटेस्ट का हो या संसद में बीच सत्र से 146 विपक्षी सांसदों का सस्पेंशन या फिर राहुल गांधी की सदस्यता खत्म कर दी गई हो, किसी विरोध के आगे कमजोर पड़ते नहीं दिखी। किसी मंत्री पर इस्तीफ़े का दबाव बना, तो कहा गया- श्भैया यहां इस्तीफ़े नहीं होते।’ लेकिन 12 साल में पहली बार कॉकरोच पार्टी ने मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया। इस पूरे घटनाक्रम से कौन-से बड़े डेंट लगे और क्या सरकार इससे उबर पाएगी। उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड की विधानसभाओं का कार्यकाल 2०27 में खत्म हो रहा है। यहां फरवरी-मार्च 2०27 में चुनाव हो सकते हैं। तो इन चुनावों पर इस आंदोलन का क्या डेंट लगेगा, इसकी पड़ताल करती यह रिपोर्ट।
प्रोटेस्ट के दौरान सरकार ने राहुल गांधी या विपक्षी से कोई बातचीत नहीं की। उसने सीजेपी के युवा नेताओं के साथ डील करके उनकी मांगें मान लीं ताकि विपक्ष इसे अपनी जीत न दिखा सके जबकि कॉकरोच पार्टी कोई चुनावी मंच नहीं, बल्कि यूथ प्लेटफॉर्म है। इसलिए सीधे तौर पर बीजेपी को कोई चुनावी नुकसान होता नहीं दिखता। विपक्ष को तब फायदा हो सकता था, जब उसने मांगें न मानी होतीं।
2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे पर आरोप लगे कि दोनों ने लंदन में रह रहे भगोड़े ललित मोदी की पुर्तगाल जाने में मदद की है। सुषमा और वसुंधरा के इस्तीफ़े की मांग होने लगी। तब 24 जून 2015 को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिह ने एक बयान दिया- श्नहीं… नहीं, इसमें (मोदी सरकार में) मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते हैं, भैया। यूपीए सरकार नहीं है, ये एनडीए सरकार है।’ राजनाथ का यही बयान बीजेपी सरकार का अघोषित नियम बन गया।
मोदी सरकार में किसी मंत्री के इस्तीफा न देने का इतिहास रहा है, सिर्फ एमजे अकबर का मामला छोड़ दें तो। 2०18 में रुमीटू मामले में एम.जे. अकबर ने विदेश राज्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया था। पीएम मोदी ने राजनीति में अपनी ऐसी छवि बनाई कि उन्हें कोई भी किसी तरह से दबाव में नहीं ला सकता। दबाव में उनसे काम नहीं करवा सकता लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े से इस छवि में कहीं-न-कहीं असर पड़ा है।
कॉकरोज जनता पार्टी के प्रोटेस्ट पर धर्मेंद्र प्रधान ने खुद कहा कि ये दहशतगर्दों की बी टीम है। लोकतांत्रिक रूप से खारिज किए जा चुके लोग भेष बदलकर सिस्टम के पीछे पड़े हैं और उन लोगों के लिए नारे लगाते हैं, जो देश को बांटना चाहते हैं। सरकार अक्सर विवादों को सांप्रदायिक बनाकर, एंटी नेशनल कहकर या विदेशी फंडिग बताकर बहुत अच्छे से हैंडल कर लेती है। लेकिन धर्म और आस्था से दूर जो मामले होते हैं, वहां सरकार को हैंडलिग में समस्या आती है। यानी यहां हिदू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद की बाइनरी फ़ेल होना भी बीजेपी सरकार के लिए डेंट है।
20 जुलाई दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स ने सीजेपी के संसद मार्च पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले दागे। जंतर-मंतर सजा स्टेज भी उखाड़ दिया। उसके बाद भी प्रदर्शन जारी रहा, यानी बल काम नहीं आया। इसके बाद सरकार ने बातचीत का रास्ता चुना। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने प्रदर्शनकारियों और सोनम वांगचुक से बातचीत शुरू की। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिह ने राहुल गांधी और विपक्ष से बातचीत की। पीएम मोदी ने भी इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट किए। लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े से कम में मानने को कोई तैयार नहीं था।
यानी अगर विरोध की आवाज में फैक्ट, कॉन्टिन्यूटी और मास-सपोर्ट हो तो उसे बलपूर्वक या राजनीतिक बयानबाजी से दरकिनार नहीं किया जा सकता। प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठी चलीं। पैलेट गन चलीं। फिर भी युवा पीछे नहीं हटे। इससे सरकार पर दबाव बना, जिसे खुद सरकार ने महसूस किया और छात्रों के दबाव में आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।
भारत में आधी आबादी 29 साल से कम उम्र की है। सबसे युवा आबादी वाले देश में शिक्षा या रोजगार से जुड़े विवाद सीधे युवाओं और उनके परिवारों को प्रभावित करते हैं। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े में देरी से छात्रों में यह संदेश गया कि सरकार उनके भविष्य को लेकर संवेदनशील नहीं है या जवाबदेही तय करने में देरी करती है।
दरअसल, 2014, 2019 और 2024 में बीजेपी को 35 प्रतिशत से ज्यादा युवा वोटर्स ने वोट दिया लेकिन सीजेपी के प्रदर्शन, शिक्षा और बेरोजगारी को लेकर युवाओं में सरकार के प्रति नाराजगी पैदा हुई।
पॉलिटिकल रिसर्च एजेंसी श्वोट वाइब’ ने सीजेपी और उसके प्रोटेस्ट को लेकर सर्वे किया जिसके मुताबिक, 87 प्रतिशत लोग सीजेपी को जानते हैं और एक-तिहाई लोग प्रदर्शन का समर्थन करते हैं। 41.4 प्रतिशत लोगों का मानना है कि इस प्रदर्शन से बीजेपी और एनडीए सहयोगियों को नुकसान होगा।
2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष पर कमजोर या बेअसर होने का ठप्पा लगता रहा है। विपक्ष के पास तमाम मुद्दे आए लेकिन कुछ खास नहीं कर सका जैसे- सीएए/एनआरसी का मुद्दा, 146 विपक्षी सांसदों का सस्पेंशन, राहुल गांधी की सदस्यता रद्द होना।
भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार 21 जुलाई को लोकसभा और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों के साथ प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया। सरकार को भी फौरन उन्हें मनाने पहुंचना पड़ा।
धर्मेंद्र प्रधान जैसे कद्दावर बीजेपी नेता, गृहमंत्री अमित शाह के करीबियों में से एक और सीनियर कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा पिछले 12 साल में पहली बार विपक्ष के लिए एक बड़ी सिबोलिक जीत जैसा है।
25 जुलाई को मोदी सरकार और सीजेपी ने मीटिग के बाद जॉइन्ट प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने प्रदर्शनकारियों की मांगों पर हामी भरी और सीजेपी ने प्रदर्शन खत्म करने का ऐलान किया।
अब सवाल यह है कि क्या इस डेंट का असर आने वाले चुनावों पर पड़ेगा? तो उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड की विधानसभाओं का कार्यकाल 2027 में खत्म हो रहा है। यहां फरवरी-मार्च 2027 में चुनाव हो सकते हैं। प्रोटेस्ट के दौरान सरकार ने राहुल गांधी या विपक्षी से कोई बातचीत नहीं की। उसने सीजेपी के युवा नेताओं के साथ डील करके उनकी मांगें मान लीं, ताकि विपक्ष इसे अपनी जीत न दिखा सके। जबकि कॉकरोच पार्टी कोई चुनावी मंच नहीं, बल्कि यूथ प्लेटफॉर्म है। इसलिए सीधे तौर पर बीजेपी को कोई चुनावी नुकसान होता नहीं दिखता। विपक्ष को तब फायदा हो सकता था, जब उसने मांगें न मानी होतीं।
राम मंदिर चंदाचोरी और फिर इस मामले में युवाओं के एकजुट प्रोटेस्ट से बीजेपी के सामने हिदुत्व, हिदू-मुस्लिम बाइनरी और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को लेकर एक नई चुनौती है, लेकिन बीजेपी को कोई चुनावी घाटा नहीं होगा। हर राज्य के चुनावी फैक्टर अलग हैं। पंजाब में सिख बनाम अन्य की राजनीति है। उत्तराखंड में मुस्लिम सिर्फ 15ः है। वहां हिदुत्व का मुद्दा नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में भी जातीय फैक्टर ज्यादा रोल निभाता है।’
हालांकि आने वाले विधानसभा चुनावों में इसका कोई असर नहीं दिखता है। पीएम मोदी के चेहरे या केंद्र सरकार के कामकाज के बजाय राज्यों में लोकल मुद्दे ज्यादा प्रभावी होते हैं। हालांकि आदेश ये भी कहते हैं कि युवाओं में जिस तरह का रोष है और वो जारी रहता है, तो उसका इलेक्टोरल टेस्ट 2०29 के लोकसभा चुनाव में होगा।
धर्मेंद्र के इस्तीफ़े के अलावा सरकार ने कॉकरोच पार्टी की बाकी दोनों मांगें भी मान ली हैं- प्रोटेस्टर्स पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी और नीट-यूजी पेपर लीक के चलते जान गंवाने वाले बच्चों के परिवारों को एक करोड़ का मुआवजा मिलेगा।
बीजेपी हिदुत्व, राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों से जुड़ा विरोध होता, तो बिना किसी डैमेज के मैनेज कर लेती, लेकिन इस बार मुद्दा उनके सिलेबस से बाहर का था। इस्तीफा दिया नहीं गया, बल्कि छात्रों ने इंस्टाग्राम पर इस्तीफा लिया है। पीएम मोदी को 2 दिन में बार-बार झुकना पड़ा। सारी मांगें माननी पड़ीं। वैचारिक तौर पर कुछ डैमेज ऐसा जरूर हुआ है, सरकार का मनोबल भी टूटा है, लेकिन ये डैमेज कंट्रोल हो जाएगा। आदेश जोड़ते हैं कि बीजेपी अपनी भूल में तुरंत सुधार करना भी जानती है। देश के लोगों की याद्दाश्त बहुत लंबी नहीं है। सरकार संसद सत्र में परिसीमन बिल आदि ला सकती है, इससे पूरा ध्यान उस पर चला जाएगा।
