ज्ञान चंद पाटनी
भारत में डिजिटल भुगतान की कहानी अगर किसी एक मंच के इर्द-गिर्द सबसे अधिक मजबूती से लिखी गई है, तो वह है यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई। कुछ ही वर्षों में यूपीआई ने भुगतान के तरीके को इतना बदल दिया है कि आज छोटे दुकानदार, सब्जी विक्रेता, ऑटो चालक, घरेलू कामगार और बड़े कारोबारी तक अपने रोजमर्रा के लेनदेन के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। मोबाइल नंबर, क्यूआर कोड या बैंक खाते के जरिए कुछ सेकंड में भुगतान हो जाना अब सुविधा भर नहीं, बल्कि भारतीय जीवन का सामान्य हिस्सा बन चुका है। इस बीच लोकसभा में टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 बिना चर्चा के ध्वनि मत से पारित हो गया है।
इस नए बिल के जरिए पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10ए में बदलाव किया गया है। पहले यूपीआई जैसे डिजिटल ट्रांजैक्शन पर किसी भी तरह का शुल्क पूरी तरह से प्रतिबंधित था। नए कानून के अस्तित्व में आने के बाद केंद्र सरकार बैंकों और अन्य पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को यूपीआई या अन्य अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड पर शुल्क लगाने की अनुमति दे सकती है।
यूपीआई के जरिए भुगतान करने पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की राह खुलने की खबरों ने सभी को चौंकाया है। वैश्विक स्तर पर यह डिजिटल भुगतान का एक बड़ा मॉडल बन चुका है। भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) अपनी तेज गति, सुगमता और सुरक्षा के कारण विदेशों में भी खूब सराहा जा रहा है। फ्रांस, सिंगापुर और यूएई समेत कई देशों ने इसकी शानदार सफलता और तकनीकी क्षमता की खुलकर तारीफ की है। इससे किसी भी तरह की छेड़छाड़ आत्मघाती साबित हो सकती है।
यूपीआई को भारत की सबसे बड़ी डिजिटल सफलताओं में गिना जाता है। वर्ष 2025-26 में यूपीआई के माध्यम से 24,000 करोड़ से अधिक लेन-देन हुए, जिनका कुल मूल्य लगभग 314 लाख करोड़ रुपए रहा। इस आंकड़े का महत्व समझने के लिए दूसरे आंकड़े पर गौर करें। इसी अवधि में देश का सकल घरेलू उत्पाद करीब 346.4 लाख करोड़ रुपए था। इसका अर्थ यह नहीं है कि यूपीआई का कारोबार सीधे जीडीपी के बराबर है, क्योंकि एक ही धनराशि कई बार लेन-देन में घूम सकती है। फिर भी यह आंकड़ा बताता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में यूपीआई कितनी गहराई तक प्रवेश कर चुका है।
वर्तमान में यूपीआई महज भुगतान का माध्यम नहीं रहा। यह भारत की डिजिटल मुद्रा जैसा व्यवहार करने लगा है। आज स्थिति यह है कि लोग नकदी रखने के बजाय मोबाइल में यूपीआई की सुविधा वाले ऐप रखते हैं। छोटे दुकानदारों में भी यह बहुत लोकप्रिय है क्योंकि इसमें ग्राहक से भुगतान लेना आसान है। साथ ही नकदी गिनने, छुट्टे पैसे रखने या बैंक जाकर पैसा जमा कराने की जरूरत कम हो गई है। यूपीआई के लोकप्रिय होने की एक वजह यह है कि फिलहाल इस तरह के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर नहीं लगता।
एमडीआर वह शुल्क है जो किसी डिजिटल भुगतान के लिए लिया जाता है। जब ग्राहक कार्ड या किसी अन्य डिजिटल माध्यम से भुगतान करता है, तो लेनदेन की प्रक्रिया में शामिल संस्थाओं को कुछ लागत उठानी पड़ती है। यही लागत आमतौर पर एमडीआर के जरिए पूरी की जाती है। यूपीआई के मामले में अब तक इसे शून्य रखा गया। इसका सबसे बड़ा लाभ छोटे कारोबारियों को मिला। यदि हर छोटे भुगतान पर दुकानदार को शुल्क देना पड़ता, तो वह डिजिटल भुगतान स्वीकार करने से बचता और यह इतना लोकप्रिय नहीं होता। जब उसे भुगतान लेने पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ा, तो यूपीआई को हर वर्ग ने हाथों हाथ लिया। यही कारण है कि यूपीआई पर एमडीआर लागू करने की संभावना से एक बड़े वर्ग की चिंता बढ़ गई है।
सरकार को शुल्क लगाने से पहले यह समझना होगा कि यूपीआई का लाभ केवल ग्राहक और दुकानदार को नहीं मिला है। इसने बैंकिंग व्यवस्था और सरकार को भी कई तरह से लाभ पहुंचाया है। बैंकों को नकदी रखने के लिए मजबूत कमरे, सुरक्षा व्यवस्था, कर्मचारियों और परिवहन की आवश्यकता होती है। एटीएम मशीनों में नकदी भरना, उनकी सुरक्षा करना और खराब मशीनों की मरम्मत भी अतिरिक्त खर्च है।
यदि यूपीआई का इस्तेमाल न बढ़ा होता तो बैंकों पर यह दबाव और अधिक होता। डिजिटल भुगतान से बैंकों को शाखाओं और एटीएम पर होने वाले खर्चों में भी बचत होती है। बड़ी संख्या में छोटे लेन-देन डिजिटल माध्यम से होने के कारण बैंकिंग व्यवस्था का संचालन अधिक स्वचालित हुआ है। इसके अतिरिक्त, डिजिटल भुगतान से लेन-देन का रिकॉर्ड बनता है, जिससे कर अनुपालन और आर्थिक गतिविधियों की निगरानी बेहतर हो सकती है। छोटे कारोबारियों का कारोबार औपचारिक अर्थव्यवस्था में दर्ज होने लगता है और सरकार को कर संग्रह में मदद मिलती है।
नकदी आधारित अर्थव्यवस्था में नोट की छपाई, उन्हें सुरक्षित रखने, उनके परिवहन, छांटने, गिनने और खराब नोटों को बदलने पर भारी खर्च होता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) हर वर्ष नए नोट छापने पर भारी खर्च करता है। खराब और अनुपयोगी नोटों को नष्ट करने की प्रक्रिया भी महंगी होती है। आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में 62 अरब से अधिक नोट घिसने, फटने और गंदे होने की वजह से चलन से बाहर करने पड़े। वर्ष 2025-26 में करीब 17 अरब नोटों को चलन से बाहर करना पड़ा। वित्त वर्ष 2024-25 में 23.86 अरब नोट और 2023-24 में 21.25 अरब नोट खराब होने के कारण वापस लेने पड़े। यदि यूपीआई नहीं होता तो खराब होने वाले नोटों की संख्या बहुत ज्यादा होती।
एमडीआर औपचारिक रूप से व्यापारी से लिया जा सकता है, लेकिन व्यवहार में इसका बोझ ग्राहक तक पहुंच सकता है। व्यापारी यदि भुगतान पर शुल्क देने को तैयार नहीं होगा, तो वह अतिरिक्त राशि ग्राहक से वसूल सकता है। कुछ व्यापारी डिजिटल भुगतान पर अलग शुल्क लगाने लगेंगे, तो कुछ नकद भुगतान को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे यूपीआई के उस मूल उद्देश्य को नुकसान हो सकता है, जिसने इसे आम लोगों के लिए लोकप्रिय बनाया था।
यूपीआई की लागत जरूर है, लेकिन इससे होने वाला लाभ भी बहुत बड़ा है। नकदी प्रबंधन में बचत, कर अनुपालन में सुधार, बैंकिंग लागत में कमी और आर्थिक गतिविधियों की पारदर्शिता जैसे लाभ ऐसे हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए यूपीआई को राजस्व जुटाने का साधन बनाने के बजाय सार्वजनिक डिजिटल संपत्ति के रूप में देखने की जरूरत है।
भारत ने यूपीआई के रूप में दुनिया के सामने एक ऐसी भुगतान व्यवस्था का उदाहरण पेश किया है, जो तेज, सस्ती, सरल और व्यापक है। इसने डिजिटल समावेशन को बढ़ावा दिया और करोड़ों लोगों को औपचारिक भुगतान व्यवस्था से जोड़ा। इसकी सबसे बड़ी ताकत यही थी कि इसका इस्तेमाल अमीर और गरीब, बड़े कारोबारी और छोटे दुकानदार सभी कर सकते हैं।
इसलिए यूपीआई पर किसी भी प्रकार का शुल्क आम नागरिक के व्यवहार, छोटे कारोबारियों की आदत और डिजिटल अर्थव्यवस्था के भरोसे को प्रभावित करेगा। सरकार और वित्तीय संस्थानों को यह समझना होगा कि यूपीआई की सफलता का आधार उसका आसान और कम लागत वाला स्वरूप है। इसलिए इसे शुल्क से मुक्त ही रखा जाना चाहिए।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
