सत्ता बदली, राजनीति नहीं : सू ची व हसीना की वापसी से दक्षिण एशिया की राजनीति में उबाल

सत्ता बदली, राजनीति नहीं : सू ची व हसीना की वापसी से दक्षिण एशिया की राजनीति में उबाल

दक्षिण एशिया में बीता सप्ताह केवल दो पुरानी राजनीतिक हस्तियों की सार्वजनिक वापसी की घटना नहीं था। यह उस गहरे संकट का आईना भी था, जिससे इस क्षेत्र की लोकतांत्रिक राजनीति लंबे समय से जूझ रही है। कुछ ही दिनों के अंतराल में म्यांमार की आंग सान सू ची की तस्वीरें सार्वजनिक हुईं और बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने नई दिल्ली से अंतरराष्ट्रीय मीडिया को संबोधित किया। दोनों अपने-अपने देशों की सत्ता से बाहर हैं लेकिन राजनीतिक विमर्श से बाहर नहीं।

बीते 3 अगस्त को म्यांमार की सरकार ने लंबे अंतराल के बाद सू ची की तस्वीरें जारी कीं। 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से वह लगभग सार्वजनिक जीवन से गायब थीं। उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी का पंजीकरण भी समाप्त किया जा चुका है। ऐसे में यह मान लेना स्वाभाविक था कि शायद सू ची का राजनीतिक अध्याय बंद हो चुका है। लेकिन तस्वीरें जारी करने का निर्णय स्वयं सैन्य सत्ता ने लिया। यही इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है।

यदि सू ची अप्रासंगिक हो चुकी हैं, तो उनकी तस्वीर सार्वजनिक करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? संभवतः म्यांमार की सत्ता अब केवल घरेलू नियंत्रण से संतुष्ट नहीं है। उसे अपने शासन की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी चाहिए। चुनाव, संस्थागत नियंत्रण और क्षेत्रीय कूटनीति के बाद अब वह स्थिरता और सामान्य स्थिति का संदेश देना चाहती है। सू ची की नियंत्रित सार्वजनिक उपस्थिति इस रणनीति का हिस्सा हो सकती है लेकिन इसमें एक गहरी विडंबना भी हैकृ’’जिस नेता को अप्रासंगिक सिद्ध करने की कोशिश की गई, उसकी तस्वीर को राजनीतिक संदेश बनाने की जरूरत पड़ना स्वयं उसकी प्रासंगिकता की स्वीकारोक्ति है।’’

बांग्लादेश में शेख हसीना की स्थिति भी इसी विरोधाभास को सामने लाती है। 2024 में सत्ता से बेदखल होने और भारत आने के बाद उनके विरुद्ध गंभीर कानूनी कार्रवाई हुई। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उन्हें उनकी अनुपस्थिति में मानवता के विरुद्ध अपराधों के मामले में मृत्युदंड सुनाया है, जिसे हसीना ने खारिज किया है। इसके बावजूद नई दिल्ली से उनका वर्चुअल संबोधन तत्काल अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने दिसंबर 2026 में बांग्लादेश लौटने की इच्छा भी जताई।

हसीना के समर्थकों के लिए यह राजनीतिक वापसी का संकेत है और विरोधियों के लिए एक नई चुनौती। लेकिन दोनों ही स्थितियों में एक तथ्य समान हैकृ’’हसीना के बाद की राजनीति अभी पूरी तरह हसीना के बाद की राजनीति बन नहीं सकी है।’’ आवामी लीग मौजूद है और बांग्लादेश की राजनीतिक बहस बार-बार इस प्रश्न पर लौट आती है कि हसीना कब और कैसे लौटेंगी।

यहीं से इन दोनों घटनाओं का व्यापक अर्थ सामने आता है। दक्षिण एशिया की राजनीति में संस्थाओं की तुलना में व्यक्तित्वों का प्रभाव असाधारण रूप से अधिक है। राजनीतिक दल अक्सर अपने नेताओं के पर्याय बन जाते हैं और सत्ता परिवर्तन कई बार संस्थागत परिवर्तन के बजाय केवल एक चेहरे को हटाकर दूसरे चेहरे को स्थापित करने की प्रक्रिया बन जाता है। परिणाम यह होता है कि नेता सत्ता से हट जाता है, लेकिन राजनीति से नहीं। उसकी गिरफ्तारी, निर्वासन, बीमारी, तस्वीर या भाषण तक राजनीतिक घटना बन जाता है।

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। उसकी वास्तविक शक्ति उन संस्थाओं में होती है जो किसी व्यक्ति के आने-जाने से विचलित न हों। यदि किसी नेता की अनुपस्थिति राजनीतिक शून्य और उसकी वापसी राजनीतिक संकट पैदा कर दे, तो समझना चाहिए कि संस्थाएं अभी पर्याप्त मजबूत नहीं हुई हैं।

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश और म्यांमार केवल पड़ोसी देश नहीं हैं। उनकी राजनीतिक स्थिरता भारत की सीमा सुरक्षा, पूर्वाेत्तर की स्थिति, व्यापार, संपर्क परियोजनाओं, शरणार्थी समस्या, मादक पदार्थों की तस्करी और बंगाल की खाड़ी की सामरिक परिस्थितियों से सीधे जुड़ी है।

इसलिए भारत को यह तय करने की भूल नहीं करनी चाहिए कि उसका हित किसी एक नेता के भविष्य में है। सू ची लौटेंगी या नहीं, हसीना सत्ता में वापस आएंगी या नहींकृये प्रश्न महत्वपूर्ण अवश्य हैं, लेकिन दीर्घकालिक भारतीय हित इससे कहीं बड़ा है।

’’भारत को व्यक्तियों के बजाय संस्थाओं के साथ संबंध मजबूत करने होंगे।’’ म्यांमार में सैन्य शासन के दौरान भी भारत ने संवाद बनाए रखा और लोकतांत्रिक संक्रमण के दौरान भी संपर्क जारी रखा। बांग्लादेश में भी बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भारत के लिए राष्ट्रीय हितों पर आधारित निरंतरता आवश्यक है। पड़ोसी नीति किसी एक सरकार या व्यक्ति के साथ संबंधों पर निर्भर नहीं हो सकती।

दक्षिण एशिया के सामने अब असली प्रश्न सत्ता की वापसी का नहीं, राजनीतिक संस्थाओं की परिपक्वता का है। म्यांमार और बांग्लादेश यदि व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीति से संस्थागत लोकतंत्र की ओर नहीं बढ़ते, तो हर सत्ता परिवर्तन अधूरा रहेगा और हर राजनीतिक निर्वासन संभावित वापसी की भूमिका बन जाएगा।

भारत के लिए भी इसका सबक स्पष्ट है। पड़ोसी देश में कौन सत्ता में है, यह महत्वपूर्ण है लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि ’’सत्ता बदलने के बाद व्यवस्था कितनी स्थिर रहती है।’’

दक्षिण एशिया को नेताओं के युग से संस्थाओं के युग की ओर बढ़ना होगा। वरना इतिहास बार-बार यही दृश्य दोहराएगाकृ’’एक चेहरा गायब होगा, राजनीति शांत होगी; वही चेहरा फिर दिखाई देगा और पूरा राजनीतिक परिदृश्य फिर बदल जाएगा।’’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »