गौतम चौधरी
धर्म मनुष्य को जोड़ता है। यह आपस के समन्वय का सबसे शक्तिशाली मानवीय व्यवस्थाओं में से एक रहा है लेकिन जब धर्म तक पहुंचने का माध्यम बदलता है, तो उसके प्रभाव भी बदल जाते हैं। कभी धार्मिक ज्ञान परिवार, शिक्षक, गुरुकुल, मदरसा, मस्जिद, मंदिर, पुस्तक और विद्वानों के माध्यम से धीरे-धीरे व्यक्ति तक पहुंचता था। आज वही ज्ञान कुछ सेकंड की रील, वायरल वीडियो, व्हाट्सऐप संदेश, टेलीग्राम चौनल और सोशल मीडिया एल्गोरिद्म के रास्ते लाखों युवाओं तक पहुंच रहा है।
इस बदलाव को केवल तकनीकी परिवर्तन मानना भूल होगी। सवाल यह है, ’’जब धार्मिक शिक्षा का मध्यस्थ शिक्षक और पुस्तक से हटकर एल्गोरिद्म बन जाए, तब धार्मिक चेतना का स्वरूप क्या होगा?’’
समस्या सोशल मीडिया पर धर्म की मौजूदगी नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब धर्म का गहरा, ऐतिहासिक और नैतिक विमर्श कुछ उत्तेजक वाक्यों, अधूरे संदर्भों और भावनात्मक वीडियो में सिमटने लगता है। धार्मिक ज्ञान की जगह धार्मिक प्रतिक्रिया लेने लगती है और संवाद की जगह डिजिटल उत्तेजना।
यही वह बिंदु है, जहां मुस्लिम युवाओं के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी होती है। हालांकि यह समस्या आज सभी समाज में व्याप्त है लेकिन इसका सबसे ज्यादा प्रभाव इस्लाम पर ही पड़ता दिख रहा है।
सोशल मीडिया का अपना एक व्यावसायिक तर्क है। जिस सामग्री पर अधिक क्लिक, लाइक, कमेंट और शेयर मिलते हैं, एल्गोरिद्म उसे और अधिक लोगों तक पहुंचाता है। इस व्यवस्था में शांत, जटिल और संदर्भपूर्ण व्याख्या की तुलना में उत्तेजक और भावनात्मक सामग्री को स्वाभाविक बढ़त मिल सकती है।
धर्म स्वभावतः जटिल है। उसमें दर्शन है, नैतिकता है, कानून है, इतिहास है, आध्यात्मिकता है और व्याख्या की लंबी परंपरा है लेकिन डिजिटल माध्यम अक्सर इस जटिलता को कुछ सेकंड के निष्कर्ष में बदल देता है-यह सही है, वह गलत है; यह अपना है, वह पराया है; यह ईमान है, वह कुफ्र है।
यहीं धार्मिक आस्था और कट्टर मानसिकता के बीच की दूरी कम होने लगती है। तकफीर-अर्थात किसी दूसरे मुसलमान को काफिर घोषित करने की प्रवृत्ति, इस खतरे का एक ऐतिहासिक उदाहरण है। इस्लामी इतिहास में खारिजियों का प्रसंग यह बताता है कि जब कोई समूह अपने धार्मिक सत्य को अंतिम मानकर दूसरों की धार्मिक वैधता ही समाप्त कर देता है, तो मतभेद आसानी से शत्रुता में बदल सकता है।
इतिहास का यह संदर्भ आज के किसी समुदाय या संप्रदाय को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि एक मानसिक प्रवृत्ति के खतरे को समझने के लिए है। कट्टरता का कोई एक चेहरा, एक संप्रदाय या एक राजनीतिक पहचान नहीं होती। उसका मूल आग्रह होता है-’’अपने विचार को अंतिम सत्य मानना और असहमति के अधिकार को अस्वीकार करना।’’
इस संदर्भ में इस्लामी परंपरा के भीतर मौजूद प्रतिरोधी नैतिकता को समझना जरूरी है। इमाम अली और इमाम हुसैन की शिक्षाओं तथा कर्बला की स्मृति को यदि केवल राजनीतिक संघर्ष या सांप्रदायिक पहचान तक सीमित कर दिया जाए, तो उसके नैतिक संदेश का बड़ा हिस्सा खो जाता है।
कर्बला का संदेश अन्याय के सामने नैतिक साहस का है लेकिन नैतिक साहस और हिंसक उन्माद एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। यदि कर्बला की स्मृति युवा मन में न्याय, आत्मसम्मान, सत्य, संयम और अन्याय के प्रतिरोध की चेतना पैदा करती है तो वह समाज को मजबूत करती है। वहीं दूसरी ओर, यदि उसी स्मृति को वर्तमान के किसी समुदाय के प्रति घृणा या हिंसा को उचित ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो इतिहास की नैतिक शक्ति को ही उलट दिया जाता है।
धार्मिक प्रतीकों की भावनात्मक शक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, उस शक्ति को किस दिशा में ले जाया जा रहा है-न्याय और आत्मसंयम की ओर या घृणा व प्रतिशोध की ओर।
यहां मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं और विद्वानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है। यदि युवा सोशल मीडिया पर है तो धार्मिक संवाद भी वहीं होना चाहिए। यह मान लेना कि नई पीढ़ी केवल मस्जिद, मदरसे या पारंपरिक संस्थाओं के माध्यम से धार्मिक ज्ञान हासिल करेगी, अब पर्याप्त नहीं है।
इधर डिजिटल आउटरीच का अर्थ केवल पुराने भाषणों को इंटरनेट पर डाल देना भी नहीं है। आज आवश्यकता ऐसे धार्मिक संचार की है जो युवाओं की भाषा समझे, उनके सवाल सुने और उनके संदेहों का उत्तर दे। ऐसा संवाद जो विज्ञान और आधुनिकता से भागे नहीं, धार्मिक मतभेदों को समझाए, दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान पैदा करे और असहमति तथा नफरत के बीच की बुनियादी रेखा स्पष्ट करे।
धार्मिक विद्वान की भूमिका केवल ‘सही उत्तर’ देने की नहीं हो सकती। उसे युवा को सवाल पूछने की संस्कृति भी देनी होगी। क्योंकि जिस युवा को सवाल पूछने से रोका जाएगा, वह उत्तर कहीं और खोजेगा और डिजिटल दुनिया में उसे उत्तर देने वालों की कोई कमी नहीं है।
कट्टरता से मुकाबला केवल सरकार, पुलिस या गुप्तचर संस्थाओं का काम नहीं हो सकता। परिवार, विद्यालय, विश्वविद्यालय और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई युवा किसी उत्तेजक धार्मिक या राजनीतिक सामग्री से प्रभावित होता दिखाई दे तो पहला कदम संवाद होना चाहिए, तत्काल सामाजिक बहिष्कार या अपराधीकरण नहीं। संवाद के दरवाजे बंद होते हैं तो कट्टर विचारों की स्वीकार्यता बढ़ने लगती है।
युवाओं को डिजिटल साक्षरता भी सिखानी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि वायरल होना सत्य होने का प्रमाण नहीं है। किसी वक्ता का धार्मिक लिबास उसकी विद्वता की गारंटी नहीं है। किसी वीडियो में पवित्र कुरान की आयत या हदीस का उल्लेख होना भी उसकी व्याख्या के सही होने का प्रमाण नहीं है। धार्मिक ज्ञान के साथ स्रोत की जांच, संदर्भ की समझ और आलोचनात्मक विवेक भी जरूरी है।
कट्टरता के विरुद्ध सबसे प्रभावी लड़ाई समुदाय के भीतर से आती है। मुस्लिम समाज के भीतर ऐसे विद्वानों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है जो धार्मिक आस्था को कमजोर किए बिना कट्टरता का विरोध कर सकें। यह काम किसी बाहरी शक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
यदि हर आलोचना को ‘इस्लाम पर हमला’ मान लिया जाएगा तो आत्म-सुधार का रास्ता बंद हो जाएगा लेकिन दूसरी ओर यदि हर धार्मिक व्यक्ति को संभावित कट्टरपंथी मान लिया जाएगा तो संवाद का रास्ता भी बंद हो जाएगा। दोनों प्रकार का अतिवाद खतरनाक हैं।
इसलिए आवश्यकता धर्म के विरुद्ध अभियान की नहीं, बल्कि धार्मिक व्याख्याओं की विवेकपूर्ण समीक्षा की है। आस्था का सम्मान और विचार की आलोचनात्मक जांच एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
इस मामले में राज्य की भूमिका क्या होनी चाहिए? निःसंदेह राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऑनलाइन हिंसा के लिए उकसावे, चरमपंथी प्रचार और आतंकवादी नेटवर्क से जुड़े डिजिटल अभियानों के खिलाफ कानून का प्रभावी इस्तेमाल होना चाहिए
यहां लोकतांत्रिक सावधानी भी उतनी ही आवश्यक है। कट्टरपंथ से लड़ाई को किसी पूरे धार्मिक समुदाय की निगरानी में बदल देना न केवल नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए खतरा होगा, बल्कि इससे वही अविश्वास पैदा होगा जिसका लाभ कट्टरपंथी प्रचारक उठाते हैं। अपराधी की पहचान उसके कृत्य से होनी चाहिए, उसकी धार्मिक पहचान से नहीं।
सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन इसलिए आवश्यक है क्योंकि आतंकवाद या कट्टरपंथ से लड़ते हुए यदि समाज के किसी बड़े हिस्से में यह भावना पैदा हो जाए कि राज्य उसे संदेह की निगाह से देखता है, तो सामाजिक दूरी बढ़ेगी और संवाद कमजोर होगा। प्रकारारांतर में इसका प्रभाव नकारात्मक होगा।
आज मुस्लिम युवाओं के सामने प्रश्न केवल यह नहीं है कि वे क्या पढ़ें। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि वे किस पर विश्वास करें। एल्गोरिद्म किसी धर्म का विद्वान नहीं है। वह सत्य और असत्य का निर्णायक भी नहीं है। उसका उद्देश्य उपयोगकर्ता की रुचि और प्रतिक्रिया को अधिकतम करना है। यदि कोई युवा लगातार उत्तेजक धार्मिक सामग्री देखता है, तो डिजिटल व्यवस्था उसे उसी तरह की और सामग्री दिखाती जाती है।
धीरे-धीरे एक ऐसी आभासी दुनिया बन सकती है जिसमें व्यक्ति को लगने लगे कि केवल वही सही सोचता है और बाकी पूरी दुनिया गलत है। यह मानसिकता किसी भी विचारधारा को कट्टर बना सकती है। इसलिए समाधान धर्म से दूरी नहीं है। समाधान है-’’धर्म को अधिक गहराई से समझना’’ है।
कुरान पढ़ना है तो संदर्भ के साथ पढ़ना होगा। हदीस पढ़नी है तो उसकी प्रामाणिकता और व्याख्या को समझना होगा। इतिहास पढ़ना है तो अनेक स्रोतों से पढ़ना होगा और दूसरे धर्म या समुदाय के बारे में राय बनानी है तो उसके बारे में उसी समुदाय के प्रामाणिक विद्वानों और साहित्य को पढ़ना होगा। अज्ञान कट्टरता की जमीन तैयार करता है और ज्ञान उसके सामने सबसे मजबूत दीवार खड़ी करता है।
आज आवश्यकता ऐसे मुस्लिम डिजिटल नेतृत्व की है जो नई पीढ़ी को केवल धार्मिक पहचान का बोध न कराए, बल्कि न्याय, करुणा, विवेक, आत्मसंयम और मानव गरिमा का अर्थ भी समझाए। कर्बला का नैतिक संदेश हो या इस्लामी परंपरा में ज्ञान की प्रतिष्ठा-इन सबको आधुनिक डिजिटल भाषा में युवाओं तक पहुंचाया जा सकता है। बल्कि पहुंचाया जाना चाहिए।
हमारे युग का सवाल यह नहीं है कि युवा मोबाइल पर क्या देख रहा है। सवाल यह है कि ’’मोबाइल उसके भीतर कौन-सी दुनिया बना रहा है।’’ उस दुनिया का निर्माण केवल एल्गोरिद्म के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। क्योंकि जब दीन की तालीम किताब, शिक्षक और संवाद से हटकर केवल एल्गोरिद्म से मिलने लगे, तब समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती धार्मिक आस्था की रक्षा नहीं, बल्कि ’’धार्मिक विवेक की रक्षा’’ की होती है।
