पंकज जायसवाल
जेन-जी और पेपर लीक के आंदोलनों की जड़ में जाएँ, तो अंततः वहाँ एक ही सवाल दिखाई देता है वह है रोजगार का सवाल। इसी विषय पर लंबे अनुभव और अध्ययन के आधार पर मैं कुछ बातें साझा करना चाहता हूँ। मैं यूपी के एक कस्बे निचलौल से निकलकर आगे बढ़ा व्यक्ति हूँ। निचलौल से हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद इंटरमीडिएट के लिए गोरखपुर आया। फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय से बी.कॉम और उसी शहर से सीए की पढ़ाई शुरू की, जो बाद में लखनऊ होते हुए दिल्ली में पूरी हुई। इस पूरे सफर में हम घर से दूर रहे। विद्यार्थी जीवन में हॉस्टल जैसे मकानों में रहते हुए आसपास साथ रहने वाले छात्र ही वर्षों तक हमारे दोस्त, बड़े भाई, छोटे भाई, सीनियर और जूनियर थे। उनमें से अधिकांश मेडिकल, इंजीनियरिंग, आईएएस, पीसीएस, एसएससी या किसी न किसी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे होते थे। वह भी हमारा अपना जेन-जी का दौर था। हमने अपने समय के छात्र आंदोलनों को भी देखा आरक्षण आंदोलन से लेकर गोरखपुर में हुए अनेक छात्र आंदोलनों तक। कई आंदोलनों में लाठीचार्ज जैसी घटनाओं का भी सामना किया। इनमें से कई आंदोलनों का नेतृत्व आज के मुख्यमंत्री और उस समय के जेन जी योगी आदित्यनाथ ने किया था।
इसलिए आज जब जेन-जी के आंदोलनों, पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और सरकारी नौकरी की चर्चा होती है, तो मुझे लगता है कि इस पूरे विषय को केवल पेपर लीक या सरकारी नौकरी की मांग के रूप में देखना बहुत सतही दृष्टिकोण होगा। इसके पीछे एक बहुत गहरी सामाजिक और आर्थिक मानसिकता है। मैंने इस पूरे विषय को तीन प्रमुख पहलुओं से समझने की कोशिश की है। पहला पहलू छात्र-छात्राएँ नीट या जेईई जैसी परीक्षाओं को लेकर इतने गंभीर और संवेदनशील क्यों हैं? इसका एक बड़ा कारण इन परीक्षाओं में बैठने वाले बहुत से विद्यार्थी मध्यमवर्गीय, ग्रामीण और कस्बाई परिवारों से हैं। उनके सामने आर्थिक संसाधनों की एक स्पष्ट सीमा होती है। वे अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर उस आर्थिक सीमा को तोड़ना चाहते हैं।
उनकी आँखों में केवल अपना भविष्य नहीं, बल्कि पूरे परिवार का सपना होता है। उन सपनों को पूरा करने का सबसे सुलभ रास्ता सरकारी कॉलेज में प्रवेश होता है। निजी संस्थानों की फीस इतनी अधिक है कि अनेक परिवारों के लिए उसे वहन करना असंभव है। ऐसे में सरकारी संस्थान में प्रवेश केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं , बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बदलने का अवसर होता है। मैंने ऐसे बच्चों को देखा है जो 12 से 16 घंटे तक पढ़ते हैं। वर्षों तक दाल-चावल-चोखा, तहरी और सोयाबीन जैसी चीजों के सहारे रहकर वे केवल इसलिए तैयारी करते हैं कि किसी तरह वह परीक्षा निकल जाए। ऐसे में जब पेपर लीक होता है, तो केवल एक पेपर खराब नहीं होता।
उनका भरोसा टूटता है क्यूंकि उस एक पेपर के लिए एक-दो नहीं, बल्कि कई वर्ष लगाए हैं। जिनका पेपर अच्छा हुआ था, उनके सामने भी सवाल खड़ा हो जाता है कि जिस संयोग ने इस बार उनका साथ दिया, क्या अगली बार भी देगा? किसी को लगता है कि इस बार पेपर अपेक्षाकृत इस बार आसान था, अगली बार का पता नहीं। किसी का तैयार किया हुआ विषय संयोग से परीक्षा में ज्यादा आया. छात्राओं के लिए यह केवल परीक्षा का सवाल भी नहीं होता, अनेक लड़कियाँ विवाह की उम्र के करीब होती हैं। कइयों के लिए यह आखरी अवसर होता है। उनके मन में यह चिंता रहती है कि क्या विवाह के बाद उन्हें दोबारा इतनी तैयारी का अवसर मिलेगा? कई परिवारों की आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि वे अपने बच्चे को कुछ समय तक ही शहर में रखकर पढ़ा सकते हैं।
मेरा अपना उदाहरण। आज यदि किसी सीए को कहें कि आपको फिर से सीए की परीक्षा देनी है, तो मुझे लगता है कि बड़ी संख्या में सीए फिर पास नहीं कर पाएँगे। इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी बुद्धिमत्ता कम हो गई। इसका अर्थ यह है कि किसी कठिन परीक्षा को पास करने में केवल मेहनत ही काम नहीं करती, तैयारी, समय, मानसिक स्थिति, पारिवारिक परिस्थितियाँ, परीक्षा का स्वरूप और अनेक छोटे-बड़े संयोग भी भूमिका निभाते हैं।
अब दूसरा सवाल लोग अपने बच्चों को सरकारी नौकरी ही क्यों दिलाना चाहते हैं? मैंने अध्ययन और अनुभव में इसका एक बड़ा कारण पाया भारत का व्यापक निजी समाज जो अभी तक एक अच्छा नियोक्ता नहीं बन पाया । हमने अपने यहाँ लोगों को काम पर तो रक्खा, लेकिन उन्हें सम्मानजनक वेतन, नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, स्पष्ट कार्य-संस्कृति और दीर्घकालिक भरोसा देना बड़े पैमाने पर नहीं सीखा। एक अच्छे नियोक्ता की पहली जिम्मेदारी है कि वह ऐसा पारिश्रमिक दे जिससे कर्मचारी और उसके परिवार का जीवन सम्मानजनक ढंग से चल सके। यहीं से सरकारी नौकरी का आकर्षण पैदा होता है।
लोग जानते हैं कि सरकार वेतन के वचन का पालन करती है। संस्थागत रोजगार में नियम और प्रक्रियाएँ होती हैं। ईमानदारी से काम करने वाले कर्मचारी को केवल मालिक की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर नौकरी से निकाल देना अपेक्षाकृत कठिन होता है। दूसरे शब्दों में, सरकारी या मजबूत संस्थागत नौकरी परिवार को तीन महत्वपूर्ण चीजें देती हुई दिखाई देती है आय की स्थिरता, नौकरी का भरोसा और सामाजिक सुरक्षा। दुर्भाग्य से, भारत का व्यापक निजी क्षेत्र अभी तक इन तीनों का भरोसा समान रूप से पैदा नहीं कर पाया । यह मानसिकता केवल सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण नहीं है। यह निजी रोजगार व्यवस्था के प्रति अविश्वास का परिणाम भी है।
तीसरा पहलू और भी महत्वपूर्ण है। भारत में परिवार और समाज नौकरी करने वाले व्यक्ति को अक्सर स्वरोजगार या उद्यम करने वाले व्यक्ति से अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा देते हैं। परिवार में गर्व से कहा जाता है “मेरा बेटा फलाँ कंपनी में नौकरी करता है, इतना पैकेज है, सरकारी है आदि आदि. लेकिन यदि कोई स्वरोजगार करता है या कोई छोटा उद्यम करता है, तो उसे अक्सर वही सामाजिक सम्मान नहीं मिलता। यहाँ तक कि कई बार कोई व्यक्ति नौकरी करने वाले व्यक्ति से अधिक कमाता है, अधिक लोगों को रोजगार देता है फिर भी परिवार और समाज की नजर में उसकी स्थिति उतनी प्रतिष्ठित नहीं होती। नौकरी करने वाले व्यक्ति के समय का भी परिवार अलग तरीके से सम्मान करता है। अगर उसे ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली, परिवार उसे स्वीकार करता है, लेकिन यदि स्वरोजगार करने वाला व्यक्ति कहे कि “मुझे काम है”, तो अक्सर उसे काम नहीं बल्कि उसकी अपनी पसंद समझा जाता है।
यह मानसिकता बदलनी होगी। दरअसल असली समस्या नौकरी की नहीं, अच्छे नियोक्ता की है. इन तीनों पहलुओं को जोड़कर देखें तो एक बहुत महत्वपूर्ण बात आती है। हमारे यहाँ रोजगार को लेकर जो व्यापक समझ बनी है, उसकी जड़ें कहीं न कहीं औपनिवेशिक मानसिकता में है। औपनिवेशिक व्यवस्था में शासन का उद्देश्य बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को तैयार करना था जो व्यवस्था में कर्मचारी बनकर काम करें। आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक सोच का बड़ा हिस्सा उसी मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। हम अपने बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि वे “अच्छी नौकरी” कर सकें लेकिन इसलिए नहीं पढ़ाते कि वे अच्छे नियोक्ता बनें। और यही सबसे बड़ा अंतर है, यही वह मानसिकता है जिसे बदलने की आवश्यकता है।
हमें एक ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ उद्यमी बनना भी उतना ही सम्मानजनक हो जितना किसी प्रतिष्ठित नौकरी में जाना। इसके लिए केवल युवाओं की मानसिकता बदलना पर्याप्त नहीं है। सरकार को भी अपनी नीति का केंद्र बदलना होगा। रोजगार सृजन नहीं, नियोक्ता सृजन की बात करनी होगी। समस्या केवल नौकरी की कमी की नहीं है। समस्या अच्छे नियोक्ताओं की कमी की है। और जिस दिन भारत ने अच्छे नियोक्ता पैदा करने की अपनी क्षमता विकसित कर ली, उस दिन रोजगार की समस्या का समाधान केवल सरकार नहीं करेगी समाज स्वयं उसका समाधान करने लगेगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
